विश्व अर्थव्यवस्था के समक्ष एक नई और गंभीर चुनौती उभरकर सामने आई है, जो आने वाले दो दशकों में वैश्विक उत्पादकता को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) और मार्श की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, 38 उच्च आय वाले देशों के समूह 'ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट' (OECD) में बढ़ती उम्र की आबादी वर्कफोर्स के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बन गई है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि कार्यस्थलों पर उम्र के आधार पर होने वाले भेदभाव (एजइज्म) के चलते 2040 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग 500 अरब डॉलर यानी करीब 48 लाख करोड़ रुपये की उत्पादकता का नुकसान उठाना पड़ सकता है।

आंकड़े बताते हैं कि लेबर मार्केट अब एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है जहाँ कामकाजी उम्र के लोगों की तुलना में बुजुर्गों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। वर्ष 2040 तक दुनियाभर में 65 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी 85.6 करोड़ से बढ़कर 1.3 अरब होने का अनुमान है, जो कि 50 फीसदी से अधिक की वृद्धि है। इसके विपरीत, मुख्य कामकाजी वर्ग (25 से 64 वर्ष) में केवल 13 फीसदी की वृद्धि की संभावना है। रिपोर्ट के अनुसार, 55 वर्ष या उससे अधिक उम्र के वयस्कों का युवा कर्मचारियों की तुलना में कम रोजगार पाना या बेरोजगारी का सामना करना इस भारी आर्थिक नुकसान का प्रमुख कारण है।

आर्थिक बोझ विशेष रूप से अमेरिका और फ्रांस जैसी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर अधिक होगा। अनुमान है कि 2025 से 2040 के बीच अमेरिका की GDP में 113 अरब डॉलर और फ्रांस में 106 अरब डॉलर की कमी आ सकती है। इसके अतिरिक्त, उम्र के आधार पर भेदभाव के केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी दुष्परिणाम भी हैं। यह डिप्रेशन, शारीरिक स्वास्थ्य में गिरावट और मेडिकल देखभाल तक सीमित पहुंच का कारण बनता है।

हालांकि, कई देशों ने इस स्थिति को भांपते हुए सकारात्मक कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। दक्षिण कोरिया ने 55-64 आयु वर्ग के लोगों के लिए 70 फीसदी की रोजगार दर हासिल की है, जबकि जापान और स्वीडन जैसे देशों ने भी उम्रदराज कर्मचारियों को कार्यबल में बनाए रखने के लिए लचीली नीतियां अपनाई हैं। समावेशी कार्यस्थलों का निर्माण न केवल लेबर की कमी को दूर करता है, बल्कि संगठनों को अनुभवी और युवा कर्मचारियों के समन्वय से बेहतर नवाचार का लाभ भी प्रदान करता है।

भारत के लिए यह रिपोर्ट एक महत्वपूर्ण संदेश लेकर आई है। दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देश के रूप में भारत को अपने 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' का लाभ उठाने के साथ-साथ अनुभवी कार्यबल को नजरअंदाज करने की गलती से बचना होगा। कार्यस्थल पर उम्र के आधार पर भेदभाव न केवल उत्पादकता को कम करता है, बल्कि आर्थिक विकास की गति को भी सुस्त बना सकता है। भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए अनुभव और ऊर्जा का सही संतुलन ही समावेशी आर्थिक विकास की कुंजी है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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