'दिमागी नक्सल' पर देवदत्त पटनायक की पौराणिक व्याख्या, कार्तिकेय से जोड़ा नक्सल शब्द|
माइथोलॉजिस्ट देवदत्त पटनायक ने पीएम मोदी के दिमागी नक्सल बयान पर पौराणिक कथा साझा करते हुए नक्सल शब्द का संबंध उत्तर बंगाल की कांस घास और कार्तिकेय से बताया है।

कांस घास के बीच खड़े सशस्त्र व्यक्तियों और भगवान कार्तिकेय की डिजिटल रूप से तैयार की गई प्रतीकात्मक तस्वीर|
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लाल किले के प्राचीर से 'दिमागी नक्सल' का जिक्र किए जाने के बाद से देश भर में इसको लेकर एक नई राजनीतिक और वैचारिक बहस छिड़ गई है। इसी क्रम में, सोशल मीडिया पर माइथोलॉजिस्ट देवदत्त पटनायक ने एक पौराणिक और भाषाई व्याख्या प्रस्तुत की है, जिसमें उन्होंने नक्सल शब्द के अर्थ को उत्तर बंगाल की कांस घास और भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय से जोड़ा है। पटनायक के इस दावे के बाद सोशल मीडिया और बौद्धिक जगत में समर्थन और विरोध दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में स्पष्ट रूप से कहा था कि देश से हथियारबंद नक्सलवाद तो कमजोर हुआ है, लेकिन अब 'दिमागी नक्सल' मौके की तलाश में हैं और वे समाज को भ्रमित करने के विभिन्न तौर-तरीके अपना रहे हैं। पीएम के इस बयान के बाद विभिन्न हलकों में इसके भू-राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक मायने तलाशे जाने लगे। इसी बहस के बीच माइथोलॉजिस्ट देवदत्त पटनायक ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से इस शब्द की उत्पत्ति और इसके पौराणिक संदर्भों पर प्रकाश डाला।
देवदत्त पटनायक ने अपनी व्याख्या में बताया कि 'दिमागी' शब्द का तात्पर्य मनोवैज्ञानिक (साइकोलॉजिकल) स्थिति से है, जबकि 'नक्सल' शब्द की जड़ें उत्तर बंगाल में उगने वाली एक विशेष प्रकार की नदी की घास से जुड़ी हैं, जिसे कांस घास या 'कास' कहा जाता है। इस घास पर चांदी के रंग जैसे चमकदार फूल खिलते हैं। पटनायक के अनुसार, इस शब्द का पौराणिक संबंध भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय से बैठता है, जिनका जन्म इन्हीं कांस के घास के मैदानों के बीच हुआ था। पौराणिक कथा का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि देवताओं द्वारा शिव से उनका वीर्य मांगे जाने के बाद, उसे शक्ति के गर्भ में रखने के स्थान पर अग्नि देव को सौंपा गया था। अग्नि देव के सहन न कर पाने पर इसे गंगा नदी में प्रवाहित किया गया, जिससे गंगा उबलने लगी और नक्सल घास में आग लग गई। उसी राख से एक बालक की उत्पत्ति हुई, जिसे शिव का पुत्र माना गया और कृतिका नक्षत्र द्वारा पालन-पोषण होने के कारण उन्हें कार्तिकेय नाम दिया गया।
अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए पटनायक ने कहा कि नक्सली शब्द का तमिल रूप 'सरवणी' हो सकता है, जिसका अर्थ नदी की घास के जंगल में जन्म लेने वाला होता है। जन्म के तुरंत बाद कार्तिकेय ने बांस के कंधे पर लटकने वाले भार यानी कांवड़ में पानी के बर्तन उठाए और बिना उन्हें जमीन पर रखे कैलाश पर्वत तक ले गए। इसे सनातन परंपरा की पहली कांवड़ यात्रा माना गया है और उनका दावा है कि इसी परंपरा का निर्वहन आज भी किया जाता है। इसके अलावा, उन्होंने यह भी दावा किया कि कांवड़ से जुड़ी ऐसी कलाकृतियां और प्रतीक हड़प्पा सभ्यता की संस्कृति में भी देखने को मिलते हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि प्राचीन वैदिक काल या हड़प्पा के समय से बंगाल से इन क्षेत्रों तक ऐसी परंपराओं और वस्तुओं का आदान-प्रदान होता रहा होगा। पटनायक ने यह भी जोड़ा कि जिस नदी के किनारे यह कांस घास उगती है और वहां के जल से शिव की पूजा की जाती है, उन्हें 'नक्सलेश्वर महादेव' कहा जाता है।
हालांकि, देवदत्त पटनायक द्वारा प्रस्तुत इस पौराणिक और ऐतिहासिक विश्लेषण पर कई लोगों ने कड़ी आपत्ति भी जताई है। फेसबुक पर प्रतिक्रिया देते हुए निरंजन पारीक नामक एक यूजर ने लिखा कि नक्सली शब्द का भगवान कार्तिकेय या शिव से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि जो इतिहासकार हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को वैदिक संस्कृति से अलग साबित करने का प्रयास करते हैं, वे आज इस सभ्यता को शिव से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। इस तरह के विरोधाभास को उन्होंने बौद्धिक आतंकवाद करार दिया है।
इसी प्रकार, प्रसिद्ध लेखिका प्रतिभा बिष्ट अधिकारी ने भी अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि विद्वान लोगों द्वारा पौराणिक ग्रंथों की ऐसी व्याख्या करके साधारण और भोले-भाले मनुष्यों को भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांस घास भारत के अधिकांश हिस्सों में पाई जाती है और यह केवल ठंड के आगमन का संकेत होती है। उन्होंने यह भी कहा कि कांस घास को यदि 'नक्सल घास' कहा भी जाए, तो उसका सांकेतिक अर्थ विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहने की क्षमता से होना चाहिए। नक्सलबाड़ी नाम की उत्पत्ति बंगाल से जरूर जुड़ी है, लेकिन इसे पौराणिक पात्रों से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है।
प्रधानमंत्री के मूल बयान और उसके बाद सोशल मीडिया पर माइथोलॉजिस्ट तथा अन्य इतिहासकारों व लेखकों के बीच चल रहे इस वैचारिक द्वंद्व ने एक नए आयाम को जन्म दे दिया है। एक तरफ जहां इस तरह की पौराणिक कहानियों से सनातन संस्कृति के गहरे जुड़ाव को तलाशने की कोशिश हो रही है, वहीं दूसरी तरफ इतिहास और वर्तमान की राजनीतिक शब्दावली के मेल पर गंभीर सवाल भी उठाए जा रहे हैं।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
