सृष्टि के आधार और निस्वार्थ प्रेम की प्रतिमूर्ति 'मां' को समर्पित इस दिन का जानें ऐतिहासिक महत्व और आधुनिक समाज में इसकी प्रासंगिकता।

सृष्टि के आरंभ से लेकर आधुनिक युग के विकास तक, यदि कोई एक तत्व अपरिवर्तनीय और शाश्वत रहा है, तो वह है 'मां' की ममता। मातृ दिवस केवल कैलेंडर की एक तिथि मात्र नहीं है, बल्कि यह उस सर्वोच्च शक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का दिन है जिसने इस संसार को जीवन और संबल प्रदान किया है। प्रत्येक वर्ष मई माह के दूसरे रविवार को दुनिया भर में मातृ दिवस मनाया जाता है, जो हमें यह स्मरण कराता है कि एक महिला के 'मां' बनने का सफर त्याग, तपस्या और असीम धैर्य की पराकाष्ठा है। यह दिवस आधुनिक समाज में मातृत्व के महत्व को रेखांकित करने और पारिवारिक संरचना में मां की केंद्रीय भूमिका को सम्मानित करने का एक वैश्विक मंच बन चुका है।

मातृ दिवस का इतिहास उतना ही रोचक है जितना कि इसका उद्देश्य। इस परंपरा की आधुनिक शुरुआत अमेरिका में एना जार्विस नामक महिला के प्रयासों से हुई थी, जो अपनी मां के प्रति सम्मान व्यक्त करना चाहती थीं। वर्ष 1914 में अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने इसे आधिकारिक मान्यता प्रदान की, जिसके बाद धीरे-धीरे यह परंपरा सात समंदर पार कर भारत सहित विश्व के कोने-कोने में फैल गई। भारतीय संस्कृति में तो मां को 'धात्री' और 'जननी' कहकर ईश्वर से भी ऊंचा स्थान दिया गया है। वैदिक काल से लेकर आज तक, भारतीय समाज में मां को घर की धुरी और संस्कारों की पहली पाठशाला माना जाता रहा है। आज के इस विशेष दिन पर वैश्विक स्तर पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जहाँ समाज के निर्माण में मां के योगदान को याद किया जा रहा है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मातृ दिवस की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। आज की मां केवल घर की चहारदीवारी तक सीमित नहीं है, वह पेशेवर जगत और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच एक कुशल संतुलन साध रही है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि एक बच्चे के मानसिक और भावनात्मक विकास में मां का सानिध्य सबसे महत्वपूर्ण कारक होता है। कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोण से भी, भारत सरकार ने कामकाजी माताओं के लिए मातृत्व लाभ अधिनियम जैसे कई प्रावधान किए हैं, ताकि वे बिना किसी मानसिक दबाव के अपने मातृत्व का आनंद ले सकें और राष्ट्र निर्माण में भी योगदान दे सकें। ये कानूनी ढाँचे इस बात की पुष्टि करते हैं कि समाज मातृत्व के श्रम और समर्पण को आधिकारिक तौर पर स्वीकार करता है।

जैसे-जैसे शाम ढलती है, यह उत्सव हमें एक गहरे चिंतन की ओर ले जाता है। क्या मां के प्रति हमारा सम्मान केवल एक दिन के उपहारों और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रहना चाहिए? वास्तविकता यह है कि मां का अस्तित्व किसी एक दिन का मोहताज नहीं है। वह तो वह निरंतर प्रवाहित होने वाली धारा है जो बिना किसी अपेक्षा के समाज को सींचती रहती है। आज के इस आयोजन का वास्तविक महत्व तभी सार्थक होगा जब हम वृद्ध आश्रमों में बढ़ रही माताओं की संख्या को कम करने का संकल्प लेंगे और उन्हें वह सम्मान प्रदान करेंगे जिसकी वे हकदार हैं। मातृ दिवस का यह समापन इस संदेश के साथ होना चाहिए कि मां के प्रति प्रेम और सम्मान हमारे जीवन का दैनिक संस्कार बने, न कि केवल वार्षिक औपचारिकता।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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