18 साल पुराने रेलवे भर्ती परीक्षा केस में राज ठाकरे को बड़ी राहत; ठाणे सत्र अदालत ने सभी आरोपों से बाइज्जत किया बरी
ठाणे की सत्र अदालत ने सबूतों के अभाव में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे को दंगा और मारपीट के आरोपों से मुक्त किया।

वर्ष 2008 में कल्याण रेलवे स्टेशन पर हुई परीक्षा विरोधी हिंसा के मामले में ठाणे की सत्र अदालत द्वारा बाइज्जत बरी किए जाने के बाद मनसे प्रमुख राज ठाकरे।
Raj Thackeray acquitted railway exam case 2026 : महाराष्ट्र की प्रांतीय राजनीति और कानूनी गलियारों से इस वक्त की सबसे सनसनीखेज और बड़ी खबर सामने आ रही है, जिसने पूरे राज्य के सियासी समीकरणों को पूरी तरह से गरमा दिया है। करीब अठारह साल पुराने और देशव्यापी स्तर पर सुर्खियां बटोरने वाले कल्याण रेलवे स्टेशन हिंसा मामले में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे को न्यायपालिका से अब तक की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक राहत मिली है। ठाणे की एक विशेष सत्र अदालत ने गुरुवार को अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए मनसे प्रमुख राज ठाकरे और उनके साथ नामजद अन्य सभी पार्टी कार्यकर्ताओं को इस बेहद संवेदनशील मामले में लगे तमाम संगीन आपराधिक आरोपों से पूरी तरह से बरी कर दिया। यह अदालती फैसला उस समय आया है जब राज्य के राजनीतिक दल नए गठबंधनों और चुनावी रणनीतियों के ताने-बाने बुन रहे हैं। ऐसे में राज ठाकरे के बेदाग बरी होने की इस खबर ने न केवल उनके समर्थकों में जश्न का माहौल पैदा कर दिया है, बल्कि उनके राजनीतिक विरोधियों के खेमे में भी खलबली मचा दी है।
इस पूरे कानूनी विवाद और खौफनाक घटनाक्रम की शुरुआत 19 अक्टूबर 2008 को हुई थी, जब अखिल भारतीय रेलवे भर्ती बोर्ड की पश्चिमी क्षेत्र के लिए आयोजित प्रवेश परीक्षा के दौरान पूरा कल्याण इलाका रणक्षेत्र में तब्दील हो गया था। उस समय उत्तर प्रदेश और बिहार सहित देश के विभिन्न हिस्सों से हजारों परीक्षार्थी परीक्षा देने के लिए मुंबई के बाहरी इलाके कल्याण में पहुंचे हुए थे। साल 2006 में 'मराठी मानुष' और स्थानीय युवाओं के रोजगार के मुद्दे पर गठित हुई मनसे के कार्यकर्ताओं ने इस परीक्षा का तीव्र और आक्रामक विरोध शुरू कर दिया। मनसे कार्यकर्ताओं का तर्क था कि इन सरकारी नौकरियों में बाहरी उम्मीदवारों की तुलना में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसी मांग को लेकर कार्यकर्ता परीक्षा केंद्रों के बाहर सड़कों को अवरुद्ध कर उग्र नारेबाजी करने लगे। देखते ही देखते विरोध प्रदर्शन ने हिंसक रूप अख्तियार कर लिया और कल्याण रेलवे स्टेशन व उसके आस-पास बाहरी राज्यों के उम्मीदवारों, विशेषकर उत्तर भारतीय छात्रों को निशाना बनाकर उनके साथ मारपीट और तोड़फोड़ की गई, जिसके बाद बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच घंटों तक भीषण हिंसक झड़पें होती रहीं।
इस भीषण उपद्रव के बाद कल्याण रेलवे पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने कड़ी कार्रवाई करते हुए मनसे प्रमुख राज ठाकरे को इस पूरे बवाल का मुख्य सूत्रधार मानते हुए उनके और उनके कार्यकर्ताओं के खिलाफ लोक सेवकों पर हमला करने, दंगा भड़काने और गैरकानूनी सभा करने जैसी गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया था। हालांकि, अदालत के भीतर चली लंबी और मैराथन कानूनी जिरह के दौरान अभियोजन पक्ष का पूरा ताना-बाना ताश के पत्तों की तरह बिखर गया। इस महीने की शुरुआत में खुद राज ठाकरे ने अदालत के समक्ष पेश होकर अपने बयान दर्ज कराए थे, जिसमें उन्होंने साफ कहा था कि उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोप पूरी तरह से झूठे और राजनीति से प्रेरित हैं। उन्होंने अपने बचाव में ठोस तर्क देते हुए बताया कि जिस दिन कल्याण में यह कथित घटना हुई, उस समय वे मुंबई या कल्याण में मौजूद ही नहीं थे, बल्कि महाराष्ट्र के नासिक शहर में एक पूर्व निर्धारित कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे।
न्यायिक प्रक्रिया के तहत राज ठाकरे और मनसे कार्यकर्ताओं के बचाव पक्ष के वकीलों ने अदालत के सामने पुलिसिया जांच की कई गंभीर खामियों, विसंगतियों और तकनीकी गड़बड़ियों को उजागर कर दिया। वकीलों ने जिरह के दौरान साबित किया कि पुलिस द्वारा तैयार किए गए पंचनामा के समय में भारी गड़बड़ी थी, जो स्वतंत्र अपराध को प्रमाणित करने में पूरी तरह विफल साबित हुई। इसके अलावा, सबसे कमजोर कड़ी यह रही कि मुकदमे के दौरान अदालत में पेश हुए प्रमुख गवाहों ने मुख्य हमलावरों की पहचान करने से साफ इनकार कर दिया और अभियोजन पक्ष के पास राज ठाकरे के खिलाफ सीधे तौर पर हिंसा भड़काने का कोई भी अकाट्य दस्तावेजी सबूत या गवाह मौजूद नहीं था। इसी का संज्ञान लेते हुए ठाणे की सत्र अदालत ने सबूतों के सर्वथा अभाव में राज ठाकरे को दंगा और मारपीट सहित सभी आरोपों से बाइज्जत बरी करने का न्यायिक आदेश पारित किया, जिसका विस्तृत और लिखित आदेश जल्द ही आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा।
ऐतिहासिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से, साल 2008 के इस रेलवे भर्ती आंदोलन ने तत्कालीन समय में भारत के भीतर एक बहुत बड़े राष्ट्रीय राजनीतिक विवाद को जन्म दिया था, जिसमें उत्तर प्रदेश और बिहार के कई मुख्यमंत्रियों और दिग्गज कद्दावर नेताओं ने इच्छुक छात्रों के खिलाफ मनसे के इस आक्रामक क्षेत्रीय रुख की संसद से लेकर सड़क तक तीखी आलोचना की थी। इस अदालती फैसले के साथ ही राज ठाकरे के सिर पर मंडरा रहा कानूनी तलवार का संकट हमेशा के लिए खत्म हो गया है, जो उनके राजनीतिक कद को नए सिरे से स्थापित करने में मदद करेगा। ठाणे कोर्ट का यह ऐतिहासिक और बेदाग बरी करने का फैसला स्पष्ट करता है कि अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरने वाले संवेदनशील मामलों में भी अंतिम न्याय केवल और केवल पुख्ता कानूनी साक्ष्यों के आधार पर ही तय होता है, न कि राजनीतिक बयानों और धारणाओं के आधार पर; और इस ऐतिहासिक जीत के बाद महाराष्ट्र की धरती पर मनसे की सांगठनिक ताकत और राज ठाकरे की कड़क आवाज का सियासी प्रभाव आने वाले समय में और अधिक प्रखर होना तय है।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
