पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने ईरान-अमेरिका संघर्ष में ईरानी सेना के साहस की तुलना महाभारत के अभिमन्यु से की है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने हालिया ईरान-अमेरिका सैन्य संघर्ष को लेकर एक विस्तृत लेख साझा किया है। इस लेख में उन्होंने ईरान के प्रतिरोध और ईरानी सेना द्वारा दिखाए गए साहस की खुले तौर पर प्रशंसा की है। जस्टिस काटजू का मानना है कि दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में शुमार अमेरिका के खिलाफ ईरानियों ने विषम परिस्थितियों में भी जिस दृढ़ता का परिचय दिया है, वह उल्लेखनीय है। उन्होंने इस संघर्ष को एक कमजोर पक्ष द्वारा शक्तिशाली के सामने झुकने से इनकार करने के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है।

पूर्व जस्टिस ने इस संदर्भ में इतिहास और पौराणिक कथाओं के अनेक उदाहरणों का उल्लेख करते हुए अपनी बात रखी है। उन्होंने लिखा है कि इतिहास में कई ऐसे अवसर आए हैं जब सीमित संसाधनों के बावजूद मातृभूमि की रक्षा के लिए संघर्ष करने की भावना सर्वोपरि रही है। जस्टिस काटजू ने अंग्रेजी साहित्य की प्रसिद्ध कविता 'होरेटियस' का भी जिक्र किया, जो विषम परिस्थितियों में साहस बनाए रखने की प्रेरणा देती है। उन्होंने महाभारत के अभिमन्यु का उदाहरण देते हुए बताया कि किस प्रकार कौरवों से घिरे होने के बावजूद अभिमन्यु ने अंत तक वीरतापूर्वक युद्ध किया था।

जस्टिस काटजू ने अपने लेख में यह भी साझा किया है कि उन्हें ईरान के सर्वोच्च नेता आयतोल्ला मोजतबा खामेनेई की ओर से दिवंगत आयतोल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने का आमंत्रण मिला था। उन्होंने बताया कि वे इस यात्रा के माध्यम से ईरान जाना चाहते थे, हालांकि कुछ कारणों से वे ऐसा नहीं कर सके। पूर्व जस्टिस के अनुसार, हालिया संघर्ष के दौरान ईरान के लोगों ने कठिन समय में जिस धैर्य और साहस का प्रदर्शन किया, वह उनके लिए एक प्रेरणा के समान है।

अपने लेख को पुष्ट करने के लिए उन्होंने वैश्विक इतिहास से कई उदाहरण गिनाए हैं। इनमें थर्मोपाइले का युद्ध, जिसमें 300 स्पार्टन सैनिकों ने विशाल फ़ारसी सेना का मुकाबला किया था, और कर्बला का युद्ध शामिल है, जहां इमाम हुसैन और उनके साथियों ने आत्मसमर्पण करने के बजाय संघर्ष को चुना। उन्होंने चमकौर का युद्ध, रानी लक्ष्मीबाई का ब्रिटिश सेना के खिलाफ संघर्ष, सारागढ़ी का युद्ध, वियतनाम का स्वतंत्रता संग्राम, स्टालिनग्राद का युद्ध और विंस्टन चर्चिल के द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान दिए गए प्रेरक भाषण का भी उल्लेख किया है।

जस्टिस काटजू के अनुसार, इन सभी ऐतिहासिक और पौराणिक घटनाओं में एक समान तत्व है—कठिन परिस्थितियों में भी हार न मानने और अपने उद्देश्यों के लिए अंत तक लड़ने का संकल्प। उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है जहां लोगों ने आत्मसमर्पण को खारिज कर विपरीत परिस्थितियों में भी साहसपूर्वक लड़ना चुना। यह लेख सैन्य संघर्ष के एक अलग दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है, जहां सामरिक शक्ति से अधिक आत्मबल और संघर्ष की भावना को प्राथमिकता दी गई है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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