महाराष्ट्र में पांच विधान परिषद (MLC) सीटों के लिए हुए चुनाव के परिणाम सामने आ चुके हैं, जो राज्य की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए एक तरह से अलार्मिंग या आंखें खोलने वाले साबित हुए हैं। इन पांचों निर्वाचन क्षेत्रों - पुणे स्नातक, नागपुर स्नातक, छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) स्नातक, पुणे शिक्षक और अमरावती शिक्षक क्षेत्रों के लिए गत 23 अक्टूबर को मतदान कराया गया था। इस चुनाव में कुल 72.96 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था। इन क्षेत्रों के निवर्तमान सदस्यों का कार्यकाल 6 दिसंबर को समाप्त हो रहा है, जिसकी वजह से ये चुनाव आयोजित कराए गए थे। चुनाव अधिकारियों के अनुसार, इन सभी पांचों निर्वाचन क्षेत्रों में कुल 182 उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे, जिनके भाग्य का फैसला करने के लिए 2,419 मतदान केंद्रों पर कुल 10.68 लाख पंजीकृत मतदाता वोट डालने के लिए पात्र थे। चुनावी नतीजे आने के बाद महायुति गठबंधन और विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी के भीतर की स्थितियाँ काफी चर्चा में आ गई हैं।

एमएलसी प्रत्याशियों के चयन को लेकर भाजपा अपने महायुति सहयोगियों, यानी एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के साथ उलझी हुई नजर आई थी। सीटों के बंटवारे को लेकर इन दलों के बीच काफी खींचतान देखने को मिली थी और आखिरकार इन सीटों पर सहयोगियों के बीच फ्रेंडली मुकाबला हुआ। लेकिन जब चुनावी नतीजे घोषित हुए, तो भाजपा को बड़ा झटका लगा। पांच सीटों के कुल नतीजों को देखें तो भाजपा के खाते में एक भी सीट नहीं आई है। पुणे स्नातक सीट पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा और इस सीट पर शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी (एसपी) की प्रत्याशी हर्षदा देशमुख जाधव ने जीत दर्ज की। वहीं, नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी अभिजीत वंजारी ने जीत हासिल की, जिन्होंने भाजपा के उम्मीदवार सुधाकर कोहले को पराजित किया।

नागपुर की हार भाजपा के लिए सबसे अधिक शर्मनाक और रणनीतिक रूप से चिंताजनक मानी जा रही है। नागपुर की सीट का महत्व इसलिए बहुत ज्यादा है क्योंकि यह राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृह क्षेत्र है। इसके अलावा यह वरिष्ठ मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले का भी गृह नगर है और सबसे बढ़कर यहीं पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय भी स्थित है। ऐतिहासिक रूप से नागपुर स्नातक सीट पर हमेशा से भाजपा का दबदबा रहा है, यहाँ तक कि उस दौर में भी जब राज्य में कांग्रेस और एनसीपी का गठबंधन सत्ता में हुआ करता था। हालांकि, वर्ष 2020 में भी भाजपा नेता और पूर्व मेयर संदीप जोशी यह सीट हार गए थे और इस बार फिर से कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने जीत हासिल कर भाजपा के सुधाकर कोहले को हरा दिया। इस परिणाम से यह साफ जाहिर होता है कि भाजपा स्नातकों के बीच अपने इस पारंपरिक समर्थक आधार को हल्के में नहीं ले सकती। इस क्षेत्र में मतदाता जाति, समुदाय, धर्म और विचारधारा के आधार पर बंटे हुए नजर आए, जिसने इस चुनाव क्षेत्र को पार्टी की उम्मीद से कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण और प्रतिस्पर्धी बना दिया।

नागपुर में भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती खुद पार्टी के अंदर से ही खड़ी हुई थी। चुनाव के दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेता अनिल सोले ने पार्टी के कामकाज के तरीके पर खुलकर आलोचना की थी। उन्होंने यह गंभीर आरोप लगाया था कि स्थानीय नेताओं से अब कोई सलाह-मशविरा नहीं किया जाता और सारे बड़े फैसले ऊपर से ही थोपे जा रहे हैं। अनिल सोले ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने तक की धमकी दे दी थी, हालांकि बाद में आखिरी मौके पर मनाकर उन्हें अपना नामांकन वापस लेने के लिए राजी कर लिया गया था। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने पार्टी के अंदर पनप रहे भारी असंतोष को उजागर कर दिया था। पुराने वफादार नेताओं को दरकिनार किए जाने को लेकर उठ रहे सवालों की झलक चुनावी नतीजों में साफ तौर पर देखने को मिली, जहाँ अपनी भारी संगठनात्मक ताकत होने के बावजूद भाजपा को अपने ही गढ़ में पराजय झेलनी पड़ी।

चुनाव नतीजों के बाद राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई। हालांकि भाजपा के प्रवक्ता नवनाथ बान ने इस बात को पूरी तरह खारिज किया कि इन नतीजों को पार्टी के लिए कोई झटका माना जाना चाहिए। उन्होंने विपक्ष के उस दावे को भी सिरे से नकार दिया कि बैलेट पेपर से कराए गए इन चुनावों ने भाजपा की कमजोर होती चुनावी स्थिति को सबके सामने ला दिया है। इससे पहले शिवसेना (यूबीटी) के सांसद संजय राउत ने हमला बोलते हुए कहा था कि बैलेट पेपर से हुए इन चुनावों से भाजपा की असली स्थिति उजागर हो गई है। उन्होंने तर्क दिया कि अब भाजपा पहले की तरह चुनावों में एकतरफा जीत हासिल नहीं कर पा रही है।

पार्टी नेतृत्व की ओर से किए जा रहे बचाव के बावजूद खुद भाजपा के भीतर से ही कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने स्वीकार किया कि पुणे स्नातक सीट पर मिली हार के बाद पूरी चयन प्रक्रिया पर नए सिरे से विचार करने की अत्यंत आवश्यकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि पुणे, जो कि महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और शैक्षणिक राजधानी मानी जाती है, वहाँ पार्टी ने एक बाहरी व्यक्ति स्मिता जाधव को मैदान में क्यों उतारा। उन्होंने कहा कि भले ही वह उम्मीदवारी के लिए योग्य रही हों, लेकिन क्या पार्टी के कार्यकर्ताओं और उसके मूल मतदाताओं के बीच उन्हें स्वीकार किया गया था? उन्होंने यह गंभीर सवाल भी उठाया कि पार्टी किसी ऐसे कार्यकर्ताओं से जुड़े उम्मीदवार को मैदान में क्यों नहीं उतार पाई, जिसने दशकों तक संगठन के लिए काम किया हो। अगर ऐसा कोई स्थानीय उम्मीदवार उपलब्ध नहीं था, तो पार्टी को इसकी गहराई से जांच करनी चाहिए।

पुणे स्नातक सीट पर मिली इस जीत ने शरद पवार की एनसीपी को अपनी राजनीतिक जमीन वापस पाने का एक बड़ा सुनहरा अवसर दे दिया है, जहाँ हर्षदा देशमुख इस चुनावी मुकाबले से सबसे ज्यादा फायदा उठाने वाली नेता बनकर उभरी हैं। इन विधान परिषद चुनावों ने महायुति गठबंधन के अंदरूनी मतभेदों को भी सबके सामने ला दिया है। राज्य की सत्ता में भाजपा, शिवसेना और एनसीपी के एक साथ होने के बावजूद यह गठबंधन अपने प्रत्याशियों के पक्ष में संयुक्त समर्थन जुटाने में संघर्ष करता दिखा। चुनाव के दौरान शिवसेना नेता अब्दुल सत्तार ने तो खुले तौर पर यह आरोप तक लगा दिया था कि उनकी अपनी ही पार्टी के सदस्य एनसीपी (एसपी) के उम्मीदवार का समर्थन कर रहे हैं।

अन्य सीटों की बात करें तो छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) स्नातक सीट पर भी शरद पवार की एनसीपी ने जीत हासिल की और वहां से प्रतापसिंह पाटिल एमएलसी चुने गए। वहीं पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के कौस्तुभ गावडे ने चुनाव जीता। दूसरी तरफ, अमरावती शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से एकनाथ शिंदे की शिवसेना के प्रत्याशी और निवर्तमान एमएलसी किरण सरनाईक ने जीत दर्ज की, जिन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार अदिति पोहारे को हराया। चूंकि किरण सरनाईक एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना के उम्मीदवार थे, इसलिए इसे भाजपा की अपनी सीधी जीत के रूप में नहीं देखा जा रहा है। कुल मिलाकर, इन पांच सीटों के चुनावी नतीजों ने भाजपा की उम्मीदवार चयन प्रक्रिया, पार्टी के भीतर पनपते असंतोष को संभालने के तरीकों और अपने पारंपरिक गढ़ों में समर्थन बनाए रखने की क्षमता पर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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