परिवहन विभाग ने परमिट के लिए मराठी का ज्ञान जरूरी किया, विरोध में यूनियनों ने 4 मई से राज्यव्यापी हड़ताल की चेतावनी दी।

Maharashtra mandatory Marathi for taxi drivers : महाराष्ट्र की सड़कों पर जल्द ही भाषा और आजीविका के बीच एक बड़ा संघर्ष देखने को मिल सकता है। राज्य के परिवहन विभाग ने एक ऐतिहासिक और विवादस्पद निर्णय लेते हुए अब सभी ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य कर दिया है। सरकार के इस नए नियम के मुताबिक, नए परमिट प्राप्त करने या पुराने परमिट के नवीनीकरण के लिए चालकों को अब मराठी पढ़ने, लिखने और बोलने का कौशल सिद्ध करना होगा। इस फैसले ने राज्य के लगभग 15 लाख चालकों के सामने संकट खड़ा कर दिया है, जिनमें एक बड़ी संख्या उन प्रवासी श्रमिकों की है जो दशकों से मुंबई और पुणे जैसे शहरों की परिवहन व्यवस्था की रीढ़ रहे हैं।

इस नीतिगत बदलाव के विरोध में टैक्सी और ऑटो यूनियनों ने कमर कस ली है। यूनियनों का तर्क है कि भाषा की अनिवार्यता थोपना उन गरीब चालकों के साथ अन्याय है जो अपनी रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार इस नियम को तुरंत वापस नहीं लेती है, तो 4 मई से पूरे राज्य में चक्का जाम किया जाएगा। दूसरी ओर, स्थानीय मराठी चालकों का एक वर्ग इस फैसले का पुरजोर समर्थन कर रहा है। समर्थकों ने अपने वाहनों पर 'मुझे मराठी आती है' के स्टिकर लगाकर इस मुहिम को सांस्कृतिक अस्मिता से जोड़ दिया है। उनका कहना है कि कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी क्षेत्रीय भाषा के इसी तरह के नियम लागू हैं, जिससे स्थानीय यात्रियों को बेहतर सेवा मिलती है।

कानूनी और प्रशासनिक मोर्चे पर, परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने इस नीति का बचाव करते हुए कहा है कि यह कदम केवल भाषाई नहीं बल्कि सेवा की गुणवत्ता सुधारने का एक प्रयास है। उनका तर्क है कि महाराष्ट्र में रहने और काम करने वाले व्यक्ति को स्थानीय भाषा का बुनियादी ज्ञान होना ही चाहिए ताकि वह यात्रियों के साथ प्रभावी ढंग से संवाद कर सके। इस बढ़ते तनाव के बीच, राज्य सरकार आज एक उच्चस्तरीय बैठक कर रही है, जिसमें नियमों के प्रवर्तन और चालकों के लिए संभावित प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर चर्चा की जाएगी। सरकार के लिए चुनौती विकास और स्थानीय भावनाओं के बीच एक ऐसा संतुलन बनाने की है जो कानून की कसौटी पर भी खरा उतरे।

इस घटनाक्रम का महत्व केवल परिवहन क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह महाराष्ट्र की राजनीति और सामाजिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव डाल सकता है। यदि 4 मई की प्रस्तावित हड़ताल प्रभावी होती है, तो राज्य की आर्थिक राजधानी मुंबई सहित कई बड़े शहरों की रफ्तार थम सकती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार अपने रुख पर अडिग रहती है या आंदोलनकारी यूनियनों के दबाव में किसी समझौते का रास्ता निकालती है। यह विवाद एक बार फिर क्षेत्रीय भाषा बनाम बाहरी प्रवासियों के उस पुराने विमर्श को हवा दे रहा है, जो अक्सर चुनावी राजनीति का केंद्र रहा है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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