महाप्रभु जगन्नाथ फिल्म विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने रिलीज पर रोक से किया इनकार, कहा- रचनात्मक स्वतंत्रता पर नहीं लगा सकते प्रतिबंध|
सुप्रीम कोर्ट ने एनिमेटेड फिल्म महाप्रभु जगन्नाथ पर रोक लगाने से इनकार किया और कहा कि अदालतें कला और क्रिएटिविटी के मामले में दखਲ नहीं दे सकतीं।

एनिमेटेड फिल्म महाप्रभु जगन्नाथ की रिलीज के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका खारिज करने पर विचार करते हुए मुख्य न्यायाधीश और बेंच।
महाप्रभु जगन्नाथ पर बनी एक चर्चित एनिमेटेड फिल्म को लेकर चल रहे कानूनी और वैचारिक गतिरोध के बीच देश की सर्वोच्च अदालत ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस एनिमेटेड फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग करने वाली याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में यह रेखांकित किया है कि न्यायपालिका कलात्मक और रचनात्मक स्वतंत्रता के मामलों में मध्यस्थ की भूमिका नहीं निभा सकती और न ही ऐसे विषयों पर अपने फैसले थोप सकती है। इस याचिका का विरोध मंदिर समिति द्वारा कड़े शब्दों में किया गया था, जिसके बाद यह मामला देश भर में चर्चा का विषय बन गया था।
सुनवाई के दौरान ओडिशा के एडवोकेट जनरल प्रीतांबर आचार्य ने कोर्ट के समक्ष अपनी दलील रखते हुए आपत्ति जताई थी कि भगवान जगन्नाथ को कार्टून पात्रों जैसे डोरेमोन और स्पाइडर-मैन के समकक्ष नहीं दिखाया जा सकता। उनका तर्क था कि इस प्रकार का चित्रण धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला है। हालांकि, फिल्म निर्माता का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने इन तमाम आरोपों को पूरी तरह खारिज किया और स्पष्ट किया कि देवता का कोई भी ऐसा अपमानजनक चित्रण फिल्म में नहीं किया गया है जो किसी की आस्था को ठेस पहुंचाए। उन्होंने अदालत को यह भी जानकारी दी कि इससे पहले समिति के कुछ सदस्य फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग के दौरान बीच में ही बाहर चले गए थे, जिसके बाद विवाद ने तूल पकड़ा था।
इस मामले पर सुनवाई कर रही जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने बेहद तार्किक और गंभीर टिप्पणियां कीं। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि कलाकारों को अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और अदालतों को कलात्मक रचनाओं के रास्ते में बाधा बनकर नहीं खड़ा होना चाहिए। अदालत ने दो टूक अंदाज में चेतावनी दी कि यदि देवी-देवताओं के किसी भी प्रकार के चित्रण पर रोक लगाने की इस तरह की शुरुआत कर दी गई, तो भविष्य में रामायण और महाभारत जैसे महान ग्रंथों पर आधारित कोई भी फिल्म या नाटक न तो बन पाएगा और न ही प्रदर्शित किया जा सकेगा।
न्यायालय ने अपनी बात को और विस्तार देते हुए कहा कि यदि इस तरह की संवेदनशीलता और प्रतिबंधात्मक सोच को बढ़ावा दिया गया, तो ऐसा आदेश देना पड़ जाएगा जिसके तहत भारत में हिंदू देवी-देवताओं या पौराणिक कथाओं से जुड़ी कोई भी कला, टेलीविज़न धारावाहिक, पेंटिंग, साहित्य या मूर्ति-कला शेष ही नहीं बचेगी। पीठ ने याद दिलाया कि हमारे देश में कबीर की रामायण, वाल्मीकि रामायण और स्कंद रामायण जैसी अनेक रचनाएं मौजूद हैं और देश के हर राज्य में रामायण की अपनी सांस्कृतिक परंपरा है। हर व्यक्ति और कलाकार की अपनी रचनात्मक शैली होती है, और यदि इस पर रोक लगी तो टेलीविजन पर प्रसारित होने वाली तमाम पौराणिक कथाएं और कला रूप बंद हो जाएंगे।
न्यायालय ने इस बात को भी प्रमुखता से रेखांकित किया कि जब केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को कानूनी रूप से रिलीज करने की मंजूरी दे दी है, तो अदालत के पास इसमें हस्तक्षेप करने का कोई ठोस वैधानिक कारण नहीं बचता है। अदालत का मानना था कि केवल इसलिए कि समाज का एक वर्ग किसी बात पर संवेदनशील है, न्यायपालिका यह सख्त आदेश जारी नहीं कर सकती कि देवताओं को लेकर अब कोई भी साहित्य, कला या मूर्ति-कला नहीं रची जाएगी।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि आमतौर पर एनिमेटेड फिल्में बच्चों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं और उनके मनोरंजन व शिक्षा का माध्यम होती हैं। पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं का हवाला देते हुए कोर्ट ने एक मार्मिक टिप्पणी की कि पहले के समय में हर रात यशोधाम का आयोजन होता था, जिसके लिए लोग अपनी श्रद्धा से पैसे इकट्ठा करते थे और कलाकारों को अपनी कला का प्रदर्शन करने का अवसर देते थे। अदालत ने कहा कि कलाकारों को इस तरह पाबंदियों की बेड़ियों में नहीं जकड़ा जा सकता।
उल्लेखनीय है कि इस मामले में इससे पूर्व 15 जुलाई को उड़ीसा हाईकोर्ट ने इस फिल्म की रिलीज पर अंतरिम रोक लगाई थी। इसके पश्चात, सुप्रीम कोर्ट ने 17 जुलाई को यह आदेश पारित किया था कि पुरी की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा 28 जुलाई को समाप्त होने के बाद इस फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज किया जा सकता है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अपने इसी पूर्ववर्ती आदेश में किसी भी प्रकार का बदलाव करने से साफ इनकार कर दिया और फिल्म की रिलीज का रास्ता पूरी तरह से साफ कर दिया। इस निर्णय से यह संदेश गया है कि धार्मिक आस्था के सम्मान के साथ-साथ रचनात्मक स्वतंत्रता और कलात्मक अभिव्यक्ति का दायरा भी भारतीय विधि व्यवस्था में सुरक्षित है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
