महापरिनिर्वाण दिवस 2025 : डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन का अंतिम दिन, 5 दिसंबर 1956, इतिहास के पन्नों में माईसाहेब सावित्रीबाई आंबेडकर द्वारा लिखित मार्मिक स्मृतियों के रूप में दर्ज है। यह दिन न केवल बाबासाहेब के जीवन का आख़िरी अध्याय था, बल्कि भारतीय समाज, राजनीति और बौद्ध धम्म के भविष्य को भी मौन संकेत दे गया।

सुबह ठीक साढ़े आठ बजे बाबासाहेब उठे। माईसाहेब चाय की ट्रे लेकर कमरे में पहुँचीं और उन्हें धीरे से जगाया। दोनों ने साथ चाय पी। उसी दौरान नानकचंद रत्तू, जो दफ्तर जाने की तैयारी में थे, कमरे में आए और बाबासाहेब के साथ चाय पीकर निकल गए। इसके बाद माईसाहेब ने रोज़मर्रा की सुबह की तैयारियों में बाबासाहेब की मदद की और उन्हें नाश्ते की मेज़ तक ले आईं।

नाश्ता बाबासाहेब, माईसाहेब और प्रसिद्ध फ़िज़ियोथेरेपिस्ट डॉक्टर माधव मालवनकर ने साथ किया। डॉक्टर मालवनकर गिरगांव, मुंबई के प्रतिष्ठित चिकित्सक थे और बाबासाहेब के न केवल डॉक्टर, बल्कि वर्षों पुराने मित्र भी। मेडिकल पढ़ाई के दौरान ही माईसाहेब डॉक्टर मालवनकर की सहायक बनी थीं, और वही समय था जब उनकी पहली मुलाकात बाबासाहेब से हुई।

नाश्ते के बाद बाबासाहेब ने अख़बार पढ़े। माईसाहेब ने उन्हें दवाएं और इंजेक्शन दिए और रसोई के कामों में लग गईं। बरामदे में बाबासाहेब और डॉक्टर मालवनकर देर तक बातचीत करते रहे।

दोपहर साढ़े बारह बजे माईसाहेब ने बाबासाहेब को भोजन के लिए बुलाया। उस समय वह अपनी लाइब्रेरी में बैठकर अपनी महान कृति “द बुद्धा ऐंड हिज़ धम्मा” की प्रस्तावना लिख रहे थे। भोजन के बाद वे विश्राम के लिए चले गए। दैनिक गृहस्थी की ज़िम्मेदारियों को स्वयं निभाने वाली माईसाहेब इस दौरान बाज़ार चली गईं। डॉक्टर मालवनकर, जिन्हें उसी रात मुंबई के लिए विमान पकड़ना था, भी कुछ सामान लेने के लिए उनके साथ शामिल हुए।

दोनों दोपहर ढाई बजे घर से निकले और शाम साढ़े पाँच बजे लौटे। लेकिन घर लौटते ही उन्हें एक अप्रत्याशित दृश्य मिला—बाबासाहेब क्रोधित अवस्था में थे। माईसाहेब की अनुपस्थिति और डॉक्टर मालवनकर के बिना बताए बाहर जाने को लेकर उनकी चिंता और बेचैनी साफ झलक रही थी। यह वही शाम थी, जिसकी रात ने भारत को उसका सबसे बड़ा सामाजिक न्याय-योद्धा हमेशा के लिए छीन लिया।

डॉ. आंबेडकर के अंतिम 24 घंटे न केवल एक महान व्यक्तित्व के निजी जीवन की झलक देते हैं, बल्कि यह भी दर्शाते हैं कि उनके अंतिम क्षणों में उनके सबसे निकट कौन थे—माईसाहेब, डॉक्टर मालवनकर और वह अपूर्ण साहित्य, जो बाद में करोड़ों लोगों की विचारधारा को दिशा देने वाला था।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

Next Story