दिल्ली और पांच राज्यों के लिए पानी की समस्या को हमेशा के लिए दूर करने की दिशा में एक बहुत ही बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। अरसे से अटके पड़े और लगभग 86 साल पुराने यानी 1940 में परिकल्पित किए गए 'किशाऊ प्रोजेक्ट' के लिए आखिरकार एक बेहद अहम समझौते पर हस्ताक्षर कर लिए गए हैं। इस ऐतिहासिक समझौते से न केवल यमुना नदी की कोख भरेगी, बल्कि दिल्ली सहित कई राज्यों में पीने के पानी और सिंचाई की किल्लत से भी राहत मिलेगी। आइए जानते हैं कि इस पूरे प्रोजेक्ट और समझौते से जुड़ी सभी जरूरी बातें क्या हैं।

नई दिल्ली में एक महत्वपूर्ण बैठक के दौरान पांच राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली ने किशाऊ प्रोजेक्ट के लिए इस अहम समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस खास मौके पर सभी छह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री मौजूद रहे। उन्होंने केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह तथा केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में इस पर अपनी सहमति की मुहर लगाई। इस समझौते को 'ऐतिहासिक' करार देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने साफ किया कि इस प्रोजेक्ट से सबसे ज्यादा फायदा देश की राजधानी दिल्ली को होगा, क्योंकि यहां पीने के पानी की सप्लाई में भारी बढ़ोतरी दर्ज की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह परियोजना यमुना नदी के चल रहे पुनरुद्धार अभियान में एक मील का पत्थर साबित होगी। केंद्र और यमुना बेसिन के सभी छह राज्य इस प्रोजेक्ट को तय समय सीमा के भीतर जल्द से जल्द पूरा करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं।

अब सवाल यह उठता है कि आखिर यह किशाऊ प्रोजेक्ट क्या है और इससे क्या-क्या फायदे होने वाले हैं? यह एक बहुत बड़ी बहुउद्देश्यीय परियोजना है, जिसे यमुना नदी की सबसे प्रमुख सहायक नदी 'टोंस' पर बनाया जाना प्रस्तावित है। टोंस नदी हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर बहती है। इस प्रोजेक्ट के तहत टोंस नदी पर लगभग 232 मीटर ऊंचा एक विशाल कंक्रीट ग्रेविटी बांध और एक पनबिजली परियोजना का निर्माण किया जाएगा। किशाऊ जलाशय की पानी जमा करने की क्षमता करीब 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर है। इस विशाल जलाशय के बनने से यमुना बेसिन के एक बहुत बड़े इलाके में पानी की उपलब्धता को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकेगा। इसके अलावा, नदी के निचले इलाकों में पानी का बहाव लगातार बना रहेगा, जिससे दिल्ली के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान—इन सभी को किसी न किसी रूप में बड़ा लाभ मिलेगा। पीने के पानी की सप्लाई बेहतर होने के साथ-साथ यह बहुउद्देश्यीय परियोजना संबंधित राज्यों में लगभग 97,000 हेक्टेयर उपजाऊ जमीन के लिए सिंचाई का पानी भी उपलब्ध कराएगी। इसके अलावा, इस प्रोजेक्ट से करीब 1,476 मिलियन यूनिट पनबिजली का उत्पादन भी किया जाएगा, जिससे बिजली की जरूरतों को पूरा करने में भी मदद मिलेगी।

इस प्रोजेक्ट के वित्तीय पहलुओं पर बात करते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने बताया कि केंद्र सरकार ने किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना को एक 'राष्ट्रीय परियोजना' घोषित किया है। इसका मतलब यह है कि इस प्रोजेक्ट पर आने वाले कुल खर्च का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा अकेले केंद्र सरकार उठाएगी। वहीं, बचा हुआ 10 प्रतिशत वित्तीय बोझ साल 1994 के आपसी समझौते के नियमों के अनुसार इसमें शामिल राज्यों द्वारा उठाया जाएगा। अमित शाह ने इस बात पर भी संतोष जताया कि साल 2018 से लेकर 2026 तक के इस दौर को ऐसे समय के रूप में याद किया जाएगा जब देश में पानी से जुड़े दशकों पुराने बड़े-बड़े विवादों को आपसी बातचीत से सुलझा लिया गया। उन्होंने बताया कि इन सभी फैसलों की मूल नींव राज्यों की जोनल काउंसिल की बैठकों में रखी गई थी और केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने इन सभी समझौतों को बहुत ही कुशलता और तेजी के साथ आगे बढ़ाया है।

अमित शाह ने अपने संबोधन में यह भी याद दिलाया कि पिछले कुछ वर्षों में पानी के बंटवारे और विकास से जुड़े कौन-कौन से बड़े विवाद सफलतापूर्वक सुलझाए जा चुके हैं। उन्होंने बताया कि अगस्त 2018 में लखवार बहुउद्देश्यीय परियोजना से जुड़ा पुराना विवाद सुलझा लिया गया था। उसी महीने पंजाब और जम्मू-कश्मीर से जुड़ा शाहपुर कंडी डैम प्रोजेक्ट का विवाद भी हल कर लिया गया था। इसके बाद, साल 2019 में अपर यमुना बेसिन में आने वाले रेणुकाजी मल्टीपर्पस डैम प्रोजेक्ट के रास्ते की रुकावटें भी दूर कर ली गईं। इतना ही नहीं, साल 2021 में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच बहुप्रतीक्षित केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट पर ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिससे बुंदेलखंड जैसे पानी की भयंकर कमी से जूझने वाले इलाके को बहुत बड़ा फायदा हुआ है। अब किशाऊ प्रोजेक्ट पर बनी यह सहमति इस कड़ी में एक और नया और शानदार अध्याय जोड़ती है।

इस पूरी परियोजना के केंद्र में मौजूद 'टोंस नदी' के बारे में जानना भी बहुत दिलचस्प है। टोंस नदी वास्तव में यमुना की सबसे बड़ी सहायक नदी है। हैरानी की बात यह है कि इसमें खुद मुख्य यमुना नदी से भी अधिक जलप्रवाह रहता है। टोंस नदी का उद्गम उत्तराखंड के ऊंचे बंदरपूंछ पर्वत के रुइंसारा क्षेत्र से होता है। यह मुख्य रूप से रूपिन और सुपिन नाम की दो सुंदर नदियों के मिलने से बनती है। आगे चलकर यह नदी उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की प्राकृतिक सीमा बनाती हुई बहती है और अंत में देहरादून के पास कालसी (उत्तराखंड) नामक स्थान पर मुख्य यमुना नदी में जाकर मिल जाती है।

इस प्रकार, किशाऊ प्रोजेक्ट के धरातल पर उतरने से न केवल कई राज्यों के बीच पानी का संकट हमेशा के लिए खत्म होगा, बल्कि यमुना नदी को भी एक नया जीवन और कुदरती ताकत मिलेगी।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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