Arunachal Pradesh Culture : अरुणाचल प्रदेश के सुदूर उत्तर-पूर्वी छोर पर स्थित पश्चिम कामेंग जिले की शांत वादियां आज एक बार फिर अपनी प्राचीन संस्कृति के जयघोष से जीवंत हो उठी हैं। 'अका' जनजाति, जिन्हें 'ह्रसो' के नाम से भी जाना जाता है, ने अपने सबसे पावन और रंगारंग सामाजिक-धार्मिक उत्सव 'सरोक' का भव्य आयोजन किया। यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के उस आदिम और अटूट संबंध का जीवंत प्रमाण है, जो आधुनिकता की चकाचौंध के बीच भी अपनी जड़ों को मजबूती से थामे हुए है।

आस्था और प्रकृति का संगम :

उत्सव की शुरुआत गांव के केंद्र में पवित्र ध्वज फहराने के साथ हुई, जो इस बात का प्रतीक है कि समुदाय अब अपने पूर्वजों और प्राकृतिक शक्तियों के साथ एकाकार होने के लिए तैयार है। सरोक का मूल दर्शन प्रकृति की अगाध शक्ति में निहित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन अदृश्य प्राकृतिक आत्माओं द्वारा किया जाता है।

  • धार्मिक अनुष्ठान: समुदाय के मुख्य पुजारी, जिन्हें 'फुलुआ' कहा जाता है, ने विशेष मंत्रोच्चार के साथ देवताओं का आह्वान किया।
  • प्रार्थना का उद्देश्य: इस पूजा का मुख्य ध्येय धरती माता को प्रसन्न करना है ताकि फसलें लहलहाएं, पालतू पशु स्वस्थ रहें और समाज प्राकृतिक आपदाओं से मुक्त रहे।
  • परंपरागत अर्पण: देवताओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने हेतु राज्य पशु 'मिथुन' की प्रतीकात्मक बलि दी गई, जो इस उत्सव की धार्मिक गंभीरता को रेखांकित करती है।

सांस्कृतिक वैभव और वीआईपी उपस्थिति :

सरोक उत्सव के अंतिम दिन की चमक तब और बढ़ गई जब केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू बाना में आयोजित इस स्वर्ण जयंती समारोह में सम्मिलित हुए। मंत्री रिजिजू न केवल इस कार्यक्रम के साक्षी बने, बल्कि वे स्वयं स्थानीय लोगों के साथ कदम से कदम मिलाकर थिरकते हुए भी दिखाई दिए। साथ ही उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर अपनी भावनाएं साझा करते हुए कहा:

"मैं अपनी पारंपरिक आस्था और संस्कृति में गहराई से जुड़ा हुआ हूँ, जिसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है। अका मिजी सांस्कृतिक संध्या के दौरान आनंद का चरम होता है। अरुणाचल प्रदेश के बाना में आयोजित अका समुदाय के स्वर्ण जयंती समारोह, सारोक महोत्सव के अंतिम दिन में शामिल होकर मुझे बहुत खुशी हुई।"


यह उत्सव केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कलात्मक विरासत का एक महाकुंभ बन गया। मोतियों और चांदी के आभूषणों से सजे पुरुष और महिलाओं ने ढोल और बांसुरी की थाप पर सामूहिक लोक नृत्य किया। उत्सव के दौरान आयोजित सामूहिक भोज ने, जहाँ पूरा गांव एक साथ बैठकर पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद लेता है, आपसी भाईचारे और सद्भाव की एक अनुपम मिसाल पेश की।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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