राजस्थान के पाली जिले में स्थित 17वीं शताब्दी के ऐतिहासिक खेरवा किले में एक ऐसी घटना हुई है, जिसने बरसों पुरानी परंपराओं की दिशा बदल दी है। इस किले में 65 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद 'पाग का दस्तूर' रस्म का आयोजन किया गया, लेकिन यह आयोजन ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। सदियों से चली आ रही इस परंपरा में इस बार एक बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब 13 वर्षीय तेजस्वी कुमारी को उत्तराधिकारी के रूप में पाग पहनाई गई।

राजपूत समाज और राजस्थान के पूर्व राजपरिवारों में 'पाग का दस्तूर' उत्तराधिकार सौंपने की एक पवित्र रस्म है। जब परिवार के मुखिया का निधन होता है, तो शोक अवधि के पश्चात नए उत्तराधिकारी की ताजपोशी की जाती है। इस रस्म में उत्तराधिकारी के सिर पर विरासत की पारंपरिक पगड़ी (पाग) बांधी जाती है और माथे पर तिलक लगाया जाता है। यह रस्म केवल एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि अब से कुल की मान-मर्यादा, संपत्ति की रक्षा और प्रजा के प्रति जिम्मेदारी नए मुखिया के कंधों पर है।

खेरवा किले में पिछले 65 वर्षों से यह रस्म नहीं हो पाई थी, क्योंकि परिवार में पुरुष उत्तराधिकारी का अभाव था। खेरवागढ़ वंश के प्रमुख हरीश चंद्र जोधा के निधन के बाद यह स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो गई थी। हालांकि, जोधपुर-मारवाड़ के पूर्व राजपरिवार की ओर से भेजी गई पाग को जब 13 साल की तेजस्वी कुमारी के सिर पर सजाया गया, तो एक नए इतिहास का सूत्रपात हुआ। इस रस्म के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार के बीच ग्रामीणों, समाज के गणमान्य लोगों और अन्य राजपरिवारों के प्रतिनिधियों की उपस्थिति रही।

तेजस्वी कुमारी को पाग पहनाए जाने का यह निर्णय समाज में एक कड़ा संदेश भी देता है कि जिम्मेदारियां निभाने का अधिकार केवल बेटों तक सीमित नहीं है। खेरवा किला, जो अपनी विशाल प्राचीर, नक्काशीदार झरोखों और प्राचीन राजपूत वास्तुकला के लिए जाना जाता है, इस नई पहल का गवाह बना। यह घटना राजस्थान के इतिहास और सामाजिक परंपराओं के विकास के रूप में दर्ज की गई है, जहाँ पुरातन मर्यादाओं के साथ समय के अनुकूल बदलाव को भी स्थान दिया गया है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

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