लखनऊ के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान केजीएमयू (KGMU) में कथित अवैध धर्मांतरण और 'लव जिहाद' का प्रकरण अब प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही के घेरे में आ गया है। इस मामले में स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद कई गंभीर परतें खुली हैं। रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि संस्थान के विभिन्न विभागों में एक कथित नेटवर्क सक्रिय था और समय रहते शिकायतों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

शिकायतों को नजरअंदाज करने और दबाने के आरोप

एसटीएफ की जांच रिपोर्ट के अनुसार, पैथोलॉजी, गांधी वार्ड, माइक्रोबायोलॉजी और रेडियोलॉजी जैसे कई अहम विभागों में कथित नेटवर्क के सक्रिय होने का जिक्र किया गया है। रिपोर्ट में इस बात पर भी सवाल उठाए गए हैं कि महिला डॉक्टरों द्वारा की गई शिकायतों को किस प्रकार नजरअंदाज किया गया और विभागीय स्तर पर मामलों को दबाने की कोशिश की गई।

जेल में बंद रेजिडेंट डॉक्टर रमीजुद्दीन (रमीन) के खिलाफ पहले से ही शिकायतें मिल रही थीं, लेकिन समय रहते कार्रवाई न होने के कारण अब संस्थान के उच्च अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।

कार्रवाई में देरी से बढ़ा पूरा मामला

जांच से जुड़े तथ्यों से यह बात सामने आई है कि जब पैथोलॉजी विभाग में एक महिला डॉक्टर द्वारा शिकायत दर्ज कराई गई थी, तब विभागीय स्तर पर इसकी तत्काल सूचना कुलपति को नहीं दी गई। एक वरिष्ठ प्रोफेसर के अनुसार, इस तरह की संवेदनशील शिकायतों पर विभागाध्यक्ष को तुरंत संस्थान के प्रशासन को अवगत कराना चाहिए था। जब पीड़ित महिला रेजिडेंट ने महिला आयोग का रुख किया, तब जाकर प्रशासन हरकत में आया। इस पूरी प्रक्रिया ने महिला डॉक्टरों की सुरक्षा और उनकी शिकायतों को गंभीरता से लेने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जांच के दायरे में कई डॉक्टर और कर्मचारी

एसटीएफ की रिपोर्ट में केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि कुछ अन्य डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और अन्य कर्मचारियों की संदिग्ध भूमिका का भी उल्लेख किया गया है। पैथोलॉजी, मेडिसिन और बॉयोकेमिस्ट्री जैसे विभागों से जुड़े लोगों की गतिविधियों और आपसी संबंधों की भी जांच की गई है। रिपोर्ट में कुछ डॉक्टरों के निजी मेडिकल संस्थानों में आर्थिक निवेश होने तथा कथित कट्टरपंथी गतिविधियों से जुड़े लोगों के संपर्क में होने की बात भी कही गई है। हालांकि, स्पष्ट किया गया है कि इन प्रारंभिक आरोपों के आधार पर अभी किसी को भी अंतिम रूप से दोषी नहीं ठहराया जा सकता है।

कोविड काल से जुड़ा पुराना मामला भी आया सामने

जांच रिपोर्ट में कोविड-19 महामारी के दौर से जुड़ा एक पुराना मामला भी शामिल किया गया है। आरोप है कि एक डॉक्टर के जमात से जुड़े लोगों से संपर्क थे और उसी दौरान एक संक्रमित जमाती को बिना किसी निर्धारित स्क्रीनिंग व ट्राइएन (Triage) प्रक्रिया का पालन किए सीधे ट्रॉमा सेंटर के वार्ड में भर्ती करवा दिया गया था। इस तरह के लापरवाही भरे कदम से अन्य मरीजों में भी संक्रमण फैलने का बड़ा खतरा पैदा हो गया था। जब यह मामला तूल पकड़ा था, तब शासन स्तर पर भी जांच के आदेश दिए गए थे।

परिसर में मिलीं छह अवैध मजारें

इस पूरे विवाद के बीच केजीएमयू के प्रवक्ता डॉ. केके सिंह ने एक और बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि संस्थान के परिसर के भीतर कुल छह अवैध मजारें चिह्नित की गई हैं। ये मजारें डेंटल कॉलेज के सामने, माइक्रोबायोलॉजी विभाग के सामने, रेस्पिरेटरी विभाग के सामने और ट्रॉमा सेंटर के पास स्थित हैं। प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि इन स्थलों का कोई भी आधिकारिक रिकॉर्ड या कानूनी वैधानिकता नहीं है। इन्हें परिसर से हटाने और स्थानांतरित करवाने के लिए शासन को पहले ही तीन बार पत्र भेजा जा चुका है और इस संबंध में आगे की कार्रवाई जारी है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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