हाथ-पैर काट दो तभी सुधरेंगे लोग, बलात्कार आरोपी छात्र परकर्नाटक हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने देश को चौंकाया|
जस्टिस आर नटराज ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि अपराधियों से कड़ाई से न निपटने के कारण देश में कानून के दांत टूट चुके हैं।

कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस आर. नटराज की सांकेतिक तस्वीर (दाएं) और बेंगलुरु स्थित कर्नाटक उच्च न्यायालय का मुख्य भवन (बाएं)।
बेंगलुरु। देश में बढ़ते अपराधों और अपराधियों के मन से कानून के डर के खत्म होने को लेकर न्यायपालिका ने एक बेहद तल्ख और गंभीर मौखिक टिप्पणी की है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक बलात्कार मामले की सुनवाई करते हुए न केवल आरोपी की जमानत याचिका को खारिज कर दिया, बल्कि न्यायिक व्यवस्था और आपराधिक समाज को लेकर एक बड़ा बयान भी दिया। मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस आर. नटराज ने तल्ख लहजे में कहा कि हमारे देश में लोकतंत्र होने के कारण लोग कानून को बहुत हल्के में लेते हैं। अदालत ने कहा कि शायद जब तक किसी का हाथ या पैर नहीं काट दिया जाएगा, तब तक लोगों को यह समझ नहीं आएगा कि कानून का पालन कैसे किया जाता है।
यह पूरा मामला गोपी रेड्डी कार्तिक रेड्डी बनाम कर्नाटक राज्य का है, जहां मणिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के एक २३ वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र पर अपनी ही पूर्व सहपाठी के साथ यौन उत्पीड़न करने का गंभीर आरोप लगा है। आरोपी छात्र की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत का गुस्सा फूट पड़ा। जस्टिस आर. नटराज ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि वर्तमान समय में अपराधियों से सख्ती से न निपटने के कारण ही कानून के दांत पूरी तरह टूट चुके हैं। कानून की धार खत्म होने से लोग बहुत ही लापरवाही से और एक रूटीन की तरह वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।
मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो आरोपी छात्र को इस साल अप्रैल महीने की शुरुआत में पुलिस ने गिरफ्तार किया था, जिसके बाद से वह न्यायिक हिरासत में जेल में बंद है। अदालत में आरोपी की ओर से पेश वकील अयंतिका मंडल ने दलील दी कि याचिकाकर्ता पिछले दो महीनों से उस अपराध के लिए जेल में है जो उसने किया ही नहीं है। बचाव पक्ष का कहना था कि यह पूरी घटना साल २०२३ की है, जो लगभग तीन साल पुरानी है। वकील ने दलील पेश की कि छात्र को लगातार हिरासत में रखने से उसके पेशेवर भविष्य और करियर पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।
बचाव पक्ष की इन दलीलों को कोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया। जस्टिस नटराज ने आरोपी को राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि अगर नमक खाया है, तो पानी भी पीना पड़ेगा। उसे कुछ दिन और जेल में रहने दिया जाए ताकि उसे जेल की आदत पड़ सके। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि आगे मामले में सजा होती है, तो आरोपी को वैसे भी वापस जेल ही जाना होगा। हाई कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए ८ जून की तारीख तय करते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है।
अभियोजन पक्ष द्वारा अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार, पीड़िता और आरोपी दोनों मणिपाल में सहपाठी थे। जुलाई २०२३ में आरोपी ने महिला से अपने प्यार का इजहार किया था, जिस पर शुरुआत में महिला ने भी सहमति जताई थी। हालांकि, बाद में आरोपी के चरित्र पर संदेह होने के कारण महिला ने उससे दूरी बना ली। आरोप है कि १२ सितंबर २०२३ को आरोपी ने रिश्ते पर बातचीत करने के बहाने महिला को अपने अपार्टमेंट में बुलाया और वहां उसकी मर्जी के खिलाफ उसका यौन उत्पीड़न किया। इस घटना के बाद पीड़िता गहरे सदमे और अवसाद में चली गई, जिसका इलाज मणिपाल के अस्पताल में चला। पीड़िता ने पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराने से पहले राष्ट्रीय महिला आयोग से संपर्क किया था, जिसके बाद उडुपी महिला पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता की धारा ३७५(ए) और ३७६ के तहत मामला दर्ज किया गया। कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी ने अब कानूनी और सामाजिक हलकों में आपराधिक न्याय प्रणाली पर एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
