यरुशलम के अल-अक्सा परिसर पर इजरायल के बढ़ते नियंत्रण के बीच हाशेमी राजवंश के ऐतिहासिक कस्टोडियनशिप अधिकारों पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।

पूर्वी यरुशलम के ऐतिहासिक पुराने शहर में स्थित अल-अक्सा मस्जिद परिसर इस समय पश्चिम एशिया में एक बड़े राजनीतिक और धार्मिक भूचाल का केंद्र बिंदु बन गया है। मक्का और मदीना के बाद इस्लाम में तीसरा सबसे पवित्र स्थल माना जाने वाला यह परिसर मुस्लिम समुदाय के लिए 'अल-हरम अल-शरीफ' और यहूदी समुदाय के लिए 'टेम्पल माउंट' के रूप में श्रद्धेय है। वर्ष 1948 में इजरायल की स्थापना के बाद से ही इस धार्मिक स्थल पर संप्रभुता को लेकर टकराव जारी है, लेकिन पिछले पच्चीस वर्षों में इस परिसर के प्रशासनिक और सुरक्षा नियंत्रण को लेकर इजरायल की रणनीतियों ने एक गंभीर कूटनीतिक संकट को जन्म दे दिया है। यह स्थिति विशेष रूप से जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला द्वितीय के लिए एक बड़े राजनीतिक और व्यक्तिगत अस्तित्व का संकट बनती जा रही है, जिन्हें पैगंबर मोहम्मद का सीधा वंशज माना जाता है।

ब्रिटिश पत्रकार और लेखक पीटर ओबॉर्न द्वारा मिडिल ईस्ट आई में प्रकाशित एक हालिया विश्लेषणात्मक लेख के अनुसार, इस धार्मिक परिसर पर इजरायल के सीधे प्रशासनिक हस्तक्षेप की शुरुआत सितंबर 2000 में हुई थी। उस समय इजरायल के तत्कालीन विपक्षी नेता एरियल शेरॉन ने लगभग एक हजार पुलिस अधिकारियों के साथ अल-अक्सा परिसर में प्रवेश किया था। सैद्धांतिक और कानूनी रूप से अल-अक्सा मस्जिद की सुरक्षा, देखरेख और कस्टोडियनशिप यानी संरक्षण की जिम्मेदारी जॉर्डन के शाही परिवार के पास रही है। हालांकि, वर्ष 2000 की घटना के बाद से इजरायली अधिकारियों ने इस परिसर पर जॉर्डन के नियंत्रण को धीरे-धीरे सीमित करना शुरू कर दिया है। वर्तमान में अल-अक्सा परिसर के भीतर इजरायली सुरक्षा बलों की स्थायी उपस्थिति है और वहां एक पुलिस थाना भी स्थापित कर दिया गया है। परिसर के प्रशासनिक कर्मचारियों के अनुसार, अब वहां सामान्य मरम्मत कार्य या कार्यालयों के रंग-रोगन के लिए भी इजरायली अधिकारियों से अनुमति लेना अनिवार्य हो गया है।

इस विवाद ने तब एक नया मोड़ लिया जब मीडिया रिपोर्टों में अमेरिका और इजरायल के बीच एक कथित रणनीतिक योजना का खुलासा हुआ। इस योजना के तहत जॉर्डन के हाशेमी शाही परिवार से अल-अक्सा के ऐतिहासिक संरक्षक होने का अधिकार छीनने का प्रयास किया जा रहा है। इस प्रस्तावित रूपरेखा को अमेरिकी प्रशासन के पूर्व रणनीतिकारों और राजनयिकों द्वारा आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसमें मस्जिद के इमामों और वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति के साथ-साथ जुमे की नमाज के दौरान दिए जाने वाले उपदेशों की समीक्षा का अधिकार भी इजरायल को सौंपने की बात शामिल है। अब तक जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला द्वितीय ने इस क्षेत्र में इजरायल के प्रशासनिक हस्तक्षेपों पर कूटनीतिक संयम बनाए रखा है, लेकिन इस नई नीति के लागू होने की स्थिति में उनके सामने कड़ा रुख अपनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

जॉर्डन के राजनीतिक विश्लेषकों और सलाहकारों के बीच इस विषय पर दो स्पष्ट वैचारिक मत उभर कर सामने आए हैं। एक पक्ष का मानना है कि जॉर्डन अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और पानी जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए काफी हद तक इजरायल और अमेरिका पर निर्भर है, इसलिए सीधे टकराव का परिणाम पूरे देश के लिए विनाशकारी हो सकता है। इसके विपरीत, जॉर्डन सरकार द्वारा पूर्व में जारी श्वेत पत्र के ऐतिहासिक साक्ष्य राजा को कड़े प्रतिरोध के लिए प्रेरित करते हैं। इस आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार, वर्ष 1916 के महान अरब विद्रोह के समय से ही हाशेमी शासकों ने फिलिस्तीन और यरुशलम के पवित्र स्थलों की रक्षा की है। इस संरक्षण की अवधि के दौरान पवित्र परिसर की 14 हेक्टेयर भूमि में से एक इंच जमीन पर भी इजरायल को कब्जा नहीं करने दिया गया। श्वेत पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अल-अक्सा की रक्षा करना दुनिया के प्रत्येक मुस्लिम का व्यक्तिगत दायित्व है और इसके संरक्षण के लिए केवल हाशेमी वंश के राजा ही आह्वान करने के लिए अधिकृत हैं।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जानकारों के अनुसार, किंग अब्दुल्ला पूर्व में भी अमेरिकी और इजरायली दबाव के खिलाफ दृढ़ रुख अपना चुके हैं। फरवरी 2025 में यह तथ्य सामने आया था कि जॉर्डन ने वाशिंगटन और तेल अवीव को स्पष्ट संदेश भेजा था कि यदि फिलिस्तीनी आबादी को जबरन जॉर्डन की सीमा में धकेलने का प्रयास किया गया, तो इसे युद्ध की घोषणा माना जाएगा। वर्तमान समय में गाजा, वेस्ट बैंक और लेबनान में जारी सैन्य संघर्षों के कारण जॉर्डन की पूरी आबादी और वहां रह रहे चौबीस लाख फिलिस्तीनी शरणार्थियों में इजरायल के प्रति भारी असंतोष देखा जा रहा है।

इस ऐतिहासिक और धार्मिक संकट के बीच जॉर्डन के राजा के पास अब केवल दो ही मार्ग शेष बचे हैं। वे या तो अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे घुटने टेक दें और अपने ऐतिहासिक अधिकारों का परित्याग कर दें, या फिर अपने हाशेमी राजवंश के अस्तित्व और धार्मिक साख को बचाने के लिए कड़ा कूटनीतिक अथवा सैन्य प्रतिरोध दर्ज कराएं। किंग अब्दुल्ला द्वारा लिया जाने वाला यह अंतिम निर्णय न केवल उनके अपने राजवंश के भविष्य को निर्धारित करेगा, बल्कि आने वाले समय में संपूर्ण पश्चिम एशिया की राजनीतिक और भू-सामरिक दिशा को भी पूरी तरह से बदल कर रख देगा।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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