ईरान में अमेरिका से बातचीत पर सैन्य और नागरिक नेतृत्व आमने-सामने है; IRGC कमांडर अहमद वाहिदी शांति वार्ता का विरोध कर रहे हैं।

तेहरान और वाशिंगटन के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच ईरान के भीतर सत्ता के गलियारों में एक गहरा वैचारिक मतभेद उभरकर सामने आया है। वर्तमान में ईरान के नागरिक नेतृत्व और सैन्य शक्ति के बीच अमेरिका के साथ भविष्य के संबंधों को लेकर खींचतान जारी है। इस विवाद के केंद्र में ईरान की सबसे शक्तिशाली सैन्य संस्था इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) के नवनियुक्त कमांडर-इन-चीफ मेजर जनरल अहमद वाहिदी और ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघर गालिबफ हैं। जहाँ ईरान का नागरिक नेतृत्व कूटनीति के माध्यम से दशकों पुराने तनाव और आर्थिक प्रतिबंधों के बोझ को कम करना चाहता है, वहीं सैन्य नेतृत्व किसी भी प्रकार के समझौते को विचारधारा के विरुद्ध मान रहा है।

इस्लामाबाद में प्रस्तावित दूसरे दौर की शांति वार्ता को लेकर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघर गालिबफ अमेरिका के साथ संवाद की मेज पर बैठने के पक्ष में हैं, ताकि देश की चरमराती अर्थव्यवस्था को राहत मिल सके। इसके विपरीत, जनरल अहमद वाहिदी ने स्पष्ट कर दिया है कि IRGC अमेरिका के साथ किसी भी प्रकार की बातचीत का कड़ा विरोध करेगी। तेहरान के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि वर्तमान में सत्ता का संतुलन वाहिदी के पक्ष में झुका हुआ है। इसकी मुख्य वजह उनका सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई के साथ सीधा संवाद और शासन के भीतर उनका बढ़ता कद है। वाहिदी को शासन का वह माध्यम माना जा रहा है जो सर्वोच्च नेता के संदेशों को प्रशासन के अन्य अंगों तक पहुंचाते हैं।

अहमद वाहिदी का व्यक्तित्व और उनका इतिहास इस पूरे घटनाक्रम को और भी जटिल बना देता है। 1 मार्च 2026 को IRGC की कमान संभालने वाले वाहिदी को कट्टरपंथी विचारधारा का स्तंभ माना जाता है। पूर्व कमांडर मोहम्मद पाकपुर की मृत्यु के बाद उनकी नियुक्ति ने ईरान की विदेश नीति में एक अधिक आक्रामक रुख की शुरुआत की है। वे न केवल पूर्व गृह मंत्री और रक्षा मंत्री रह चुके हैं, बल्कि कुद्स फोर्स के शुरुआती नेतृत्वकर्ताओं में से भी एक रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि एक विवादित सैन्य अधिकारी की रही है, जिनका नाम 1994 के अर्जेंटीना बम धमाकों में आने के कारण वे इंटरपोल की वांटेड सूची में भी शामिल हैं। "अमेरिका का नाश हो" जैसी कट्टरपंथी विचारधारा में अटूट विश्वास रखने वाले वाहिदी के बारे में माना जाता है कि हमास और हिज्बुल्लाह जैसे समूहों पर आज भी उनका गहरा प्रभाव है।

दूसरी ओर, जमीनी हकीकत तेजी से बदल रही है। अमेरिकी नौसेना ने ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी को अत्यंत सख्त कर दिया है। नाकेबंदी के प्रभावी होने के बाद से अब तक लगभग 27 अंतरराष्ट्रीय जहाजों को अपना मार्ग बदलने पर मजबूर होना पड़ा है। हाल ही में चीन से आ रहे एक ईरानी जहाज को अमेरिकी सेना द्वारा जब्त किए जाने की घटना ने आग में घी डालने का काम किया है, जिसमें कथित तौर पर दोहरे उपयोग वाली वस्तुएं ले जाई जा रही थीं। इस सैन्य दबाव के जवाब में ईरानी संसद एक ऐसे विधेयक पर काम कर रही है जो अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए घातक साबित हो सकता है।

ईरान द्वारा तैयार किए जा रहे इस नए कानून के तहत होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर ईरान के पूर्ण नियंत्रण को आधिकारिक मान्यता दी जाएगी। इसके लागू होने के बाद, इजरायल से जुड़े किसी भी जहाज का यहाँ से गुजरना प्रतिबंधित हो जाएगा और 'शत्रु देशों' के जहाजों को गुजरने के लिए ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद से अनुमति लेनी होगी। इतना ही नहीं, ईरान इस महत्वपूर्ण जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर टोल वसूलने की योजना भी बना रहा है। यह कदम वैश्विक तेल आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। अंततः, अमेरिका के साथ शांति या एक नए युद्ध का फैसला जनरल अहमद वाहिदी के हाथों में सिमटता दिख रहा है, जो ईरान के भविष्य की दिशा तय करेंगे।

Updated On 21 April 2026 12:37 PM IST
Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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