हिंद महासागर क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय सुरक्षा सहयोग और संयुक्त सैन्य कौशल बढ़ाने के बाद 16 मित्र देशों के नौसैनिकों के साथ स्वदेश लौटा नौसैनिक पोत।

वैश्विक सामरिक समीकरणों के बदलने और हिंद महासागर क्षेत्र में पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों के गहराने के बीच भारतीय नौसेना ने भू-राजनीतिक पटल पर एक अभूतपूर्व कूटनीतिक विजय की नई पटकथा लिखी है। गहरे समंदर के अशांत रास्तों पर कई हफ्तों तक अंतरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त सैन्य कौशल और अटूट रणनीतिक साझेदारी का लोहा मनवाने के बाद भारतीय नौसेना का बहुराष्ट्रीय 'इंडियन ओशियन शिप (आईओएस) सागर-26' अभियान पूरी तरह सफल रहा। इस ऐतिहासिक और दीर्घकालिक मिशन की कमान संभाल रहा भारतीय युद्धपोत आईएनएस सुनयना बुधवार को कोच्चि स्थित देश के प्रमुख नौसैनिक बंदरगाह पर पूरी शान के साथ स्वदेश लौट आया। स्वदेश वापसी के इस ऐतिहासिक क्षण को और अधिक गौरवमयी बनाने के लिए नौसेना द्वारा एक भव्य फ्लैग-इन समारोह का आयोजन किया गया। यह पूरी कवायद न केवल हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की लगातार सुदृढ़ होती केंद्रीय भूमिका और 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' की छवि को रेखांकित करती है, बल्कि साझा सुरक्षा के प्रति देश के अटूट राष्ट्रीय संकल्प का सबसे बड़ा जीवंत प्रतीक बनकर उभरी है।

इस बेहद जटिल और दूरगामी नौसैनिक कूटनीति की वैचारिक रूपरेखा पूरी तरह से 'वन ओशन, वन मिशन' के सिद्धांत पर आधारित थी, जिसने वैश्विक महाशक्तियों के सामने यह साबित कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र केवल व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता का जरिया नहीं, बल्कि आपसी विश्वास का सबसे बड़ा मंच बन सकता है। भारतीय नौसेना के इस अभियान की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पूरे मिशन के दौरान भारत समेत दुनिया के कुल 17 देशों के नौसैनिक प्रतिनिधि इस आधुनिक भारतीय युद्धपोत पर एक साथ सवार रहे। अलग-अलग महाद्वीपों से आए इन जांबाजों ने समुद्र की कठिन परिस्थितियों में एक साझा कमान के तहत न केवल जटिल प्रशिक्षण प्राप्त किया, बल्कि वास्तविक परिचालन गतिविधियों को भी अंजाम दिया। भारत के इस ऐतिहासिक आह्वान पर आयोजित हुई इस वैश्विक पहल में मुख्य रूप से बांग्लादेश, इंडोनेशिया, केन्या, मलेशिया, मालदीव, मॉरीशस, मोजाम्बिक, म्यांमार, सेशेल्स, सिंगापुर, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, तंजानिया, थाईलैंड, तिमोर-लेस्ते और संयुक्त अरब अमीरात की नौसेनाओं के शीर्ष अधिकारी और नाविक शामिल हुए।

सैन्य और रणनीतिक विश्लेषकों की नजर में इस बहुराष्ट्रीय अभियान का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि अलग-अलग देशों की भिन्न भाषाएं, विविध संस्कृतियां और अलग सैन्य परंपराएं होने के बावजूद, आईएनएस सुनयना पर तैनात सभी सैनिकों का एकमात्र साझा उद्देश्य हिंद महासागर को पूरी तरह सुरक्षित, स्थिर और अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों के अनुकूल बनाए रखना था। नौसेना के उच्च अधिकारियों द्वारा साझा किए गए विवरण के अनुसार, यह मिशन महज एक सामान्य सैन्य तैनाती नहीं था, बल्कि यह समंदर के सीने पर तैरता हुआ एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री सहयोग मंच बन गया था। इस दौरान विदेशी नौसैनिकों को भारतीय नौसेना की तकनीकी क्षमता, अत्याधुनिक हथियारों के संचालन, युद्ध कौशल और विषम परिस्थितियों में भारत के मानवीय दृष्टिकोण को बेहद करीब से देखने और समझने का अवसर मिला, जिससे अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारतीय नौसेना की साख को और अधिक मजबूती मिली है।

इस मिशन के व्यावहारिक क्रियान्वयन के दौरान समंदर के बीचों-बीच कई उच्च स्तरीय संयुक्त सैन्य अभ्यासों को अंजाम दिया गया, जिसमें मुख्य रूप से आधुनिक संचार समन्वय, उपग्रह आधारित समुद्री निगरानी, आपातकालीन खोज एवं बचाव अभियान, भीषण प्राकृतिक आपदा राहत संचालन और जहाजों के अपहरण विरोधी सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर कड़ा जमीनी अभ्यास किया गया। इन अत्यधिक गुप्त और रणनीतिक अभ्यासों का मुख्य कानूनी और प्रशासनिक उद्देश्य केवल सैनिकों को सामान्य ट्रेनिंग देना नहीं था, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत भविष्य में उत्पन्न होने वाली किसी भी बड़ी क्षेत्रीय चुनौती या युद्ध जैसी स्थिति के समय सभी मित्र देशों को एक एकीकृत कमान के तहत त्वरित और प्रभावी जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार करना था। यही कारण है कि फ्लैग-इन समारोह के दौरान देश की रक्षा के लिए उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले अधिकारियों और विदेशी नाविकों को विशेष रूप से सम्मानित किया गया, जहां सैन्य कमांडरों ने जोर देकर कहा कि आज का हिंद महासागर पूरे विश्व के व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक संतुलन का मुख्य केंद्र है, इसलिए क्षेत्रीय समन्वय समय की सबसे बड़ी मांग है।

आईएनएस सुनयना की इस गौरवमयी घर वापसी ने भारत सरकार के दूरदर्शी 'महासागर' (सैग)- विजन को एक नया और बेहद व्यावहारिक धरातल प्रदान किया है, जिसका मूल विधिक उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र के सभी शांतिप्रिय देशों के बीच परस्पर सुरक्षा, आर्थिक विकास और समृद्धि के लिए एक मजबूत और काबू ढांचा तैयार करना है। सामरिक विश्लेषक इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि इस तरह के जटिल बहुराष्ट्रीय मिशन भारत की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति को किताबी दावों से बाहर निकालकर वास्तविक रूप में समुद्र में लागू करते हैं, जिससे न केवल सैन्य अंतःक्रियाशीलता (इंटरऑपरेबिलिटी) बढ़ती है, बल्कि विभिन्न देशों के बीच आपसी विश्वास का निर्माण होता है। बंदरगाह पर शुरू हुए शुरुआती हार्बर प्रशिक्षण से लेकर विभिन्न मित्र देशों के पोर्ट विजिट और लाइव फायर अभ्यासों तक, इस मिशन ने यह संदेश पूरी दुनिया को दे दिया है कि समंदर सीमाओं से नहीं बल्कि आपसी सहयोग से जुड़ते हैं, और इसी रणनीतिक वजह से आईओएस सागर-26 को भारतीय नौसेना की अब तक की सबसे बड़ी सामरिक और भू-राजनीतिक जीत माना जा रहा है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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