नई दिल्ली: वैश्विक कृषि कमोडिटी बाजार में भारतीय सोयाबीन और उससे जुड़े उत्पादों के व्यापारिक रुख में एक बड़ा और अप्रत्याशित बदलाव देखने को मिला है। घरेलू बाजार में सोयाबीन की कीमतों में अचानक आई रिकॉर्ड तेजी और आपूर्ति की भारी कमी के कारण भारतीय निर्यातकों ने विदेशी खरीदारों के साथ किए गए अपने व्यापारिक समझौतों को रद्द करना शुरू कर दिया है। वर्ष 2021 के बाद यह पहला अवसर है जब देश के बड़े निर्यातकों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोयामील निर्यात के बड़े सौदों को निरस्त किया है। व्यापारिक सूत्रों के अनुसार, निर्यात के वादे पूरे करने में असमर्थ भारतीय कारोबारियों ने न केवल सौदे रद्द किए हैं, बल्कि घरेलू मांग की पूर्ति के लिए भारी मात्रा में तिलहन के आयात के ऑर्डर भी दे दिए हैं।

अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय निर्यातकों द्वारा मई और जून के शिपमेंट के लिए लगभग 25,000 टन सोयामील निर्यात के सौदे रद्द किए गए हैं। इसके विपरीत, बाजार की जरूरतों को पूरा करने के लिए मुख्य रूप से अफ्रीकी देशों से लगभग 80,000 टन नॉन-जेनेटिकली-मॉडिफाइड (नॉन-जीएम) सोयाबीन के आयात के सौदे सुनिश्चित किए गए हैं। सोयामील, जो सोयाबीन से तेल निकालने के बाद बचे हुए ठोस हिस्से (खली) से निर्मित होता है, वैश्विक स्तर पर पशुओं के चारे के लिए प्रोटीन का सबसे महत्वपूर्ण और अनिवार्य स्रोत माना जाता है। इस दुर्लभ व्यापारिक घटनाक्रम को बाजार की भाषा में 'वॉशआउट' कहा जा रहा है, जिसमें कीमतों के अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव के कारण दोनों पक्षों की आपसी सहमति से बिना किसी जुर्माने के सौदे रद्द किए गए हैं।

इस कारोबारी बदलाव की मुख्य वजह स्थानीय स्तर पर उत्पादन में आई भारी गिरावट को माना जा रहा है। आपूर्ति श्रृंखला बाधित होने के चलते घरेलू बाजार में स्थानीय सोयामील की कीमतें मात्र एक महीने के भीतर 41 प्रतिशत की छलांग लगाकर 66,000 रुपये प्रति टन तक पहुंच गई हैं। यह पिछले चार वर्षों में दर्ज किया गया इसका उच्चतम स्तर है। कीमतों में इस अप्रत्याशित उछाल के कारण जून महीने में लोड होने वाली भारतीय सोयामील शिपमेंट के लिए एक्सपोर्ट ऑफर्स बढ़कर लगभग 695 डॉलर प्रति टन (फ्री ऑन बोर्ड - एफओबी आधार पर) हो गए हैं, जो केवल एक महीने पहले तक लगभग 475 डॉलर प्रति टन के स्तर पर बने हुए थे। वैश्विक ट्रेड हाउसेज से जुड़े डीलरों का कहना है कि प्रति टन 200 डॉलर की इस अतिरिक्त लागत को निर्यातकों के लिए खुद वहन करना व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक नहीं था।

कृषि उत्पादों की प्रमुख निर्यातक कंपनी 'सूरज इम्पेक्स' के संस्थापक विनोद जैन ने इस स्थिति पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भारतीय बाजार में कीमतें बहुत अधिक होने के कारण वैश्विक खरीदार अब भारत को नए निर्यात ऑर्डर नहीं दे रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप भारतीय व्यापारियों ने विकल्प के तौर पर अफ्रीकी देशों से कच्चे माल का आयात बढ़ा दिया है। भारत सरकार की आयात नीति के तहत देश में केवल 'नॉन-जेनेटिकली-मॉडिफाइड' (नॉन-जीएम) सोयाबीन के आयात की ही कानूनी अनुमति प्रदान की जाती है। इस कड़े विनियामक प्रावधान के कारण भारतीय व्यापारियों के पास आयात के लिए केवल कुछ ही चुनिंदा अफ्रीकी देशों जैसे बेनिन, नाइजर, टोगो और नाइजीरिया का विकल्प बचता है, जहां पारंपरिक रूप से गैर-जीएम फसलों का उत्पादन किया जाता है। वैश्विक स्तर पर इन नॉन-जीएम किस्मों की कीमतें सामान्य जेनेटिकली-मॉडिफाइड (जीएम) किस्मों की तुलना में काफी अधिक होती हैं।

व्यापारिक आंकड़ों के अनुसार, चालू महीने के दौरान भारतीय प्रोसेसर्स ने जून और जुलाई में देश के बंदरगाहों पर पहुंचने वाली शिपमेंट के लिए अफ्रीकी देशों से 700 डॉलर से 760 डॉलर प्रति टन की कीमत पर (कॉस्ट, इंश्योरेंस और फ्रेट यानी सीआईएफ आधार पर) सोयाबीन की खरीद की है। महाराष्ट्र ऑयल एक्सट्रैक्शंस के मैनेजिंग डायरेक्टर मनोज अग्रवाल ने पुष्टि की है कि ट्रेडर्स द्वारा अब तक कम से कम 80,000 टन सोयाबीन का सौदा फाइनल किया जा चुका है और यह क्रय प्रक्रिया वर्तमान में भी लगातार जारी है।

इस घरेलू संकट के संबंध में जमीनी स्थिति स्पष्ट करते हुए महाराष्ट्र के प्रमुख सोयाबीन उत्पादक क्षेत्र लातुुर में कार्यरत सोयाबीन प्रोसेसर अशोक भुताडा ने बताया कि आगामी सितंबर और अक्टूबर के महीनों में जब तक देश में सोयाबीन की नई फसल की आवक शुरू नहीं हो जाती, तब तक स्थानीय स्तर पर इसकी कुल सप्लाई अत्यंत सीमित बने रहने की आशंका है। इसी दीर्घकालिक किल्लत के अनुमानों को देखते हुए भारतीय रिफाइनर्स और ट्रेडर्स भविष्य की व्यावसायिक अनिश्चितताओं से बचने के लिए अफ्रीकी देशों से लगातार आयात सौदे कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम का सीधा लाभ उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के सोयामील सप्लायर्स को मिलने की उम्मीद है, जो अब एशियाई खरीदारों के बाजारों पर अपनी पकड़ मजबूत कर सकेंगे।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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