सिंधु जल संधि पर भारत का कड़ा रुख: हेग अदालत का फैसला खारिज, चिनाब नदी परियोजना के काम में आई तेजी|
स्थायी मध्यस्थता न्यायालय के फैसले और भारतीय जलविद्युत परियोजनाओं के विरोध के बीच दोनों देशों के द्विपक्षीय जल समझौते में बढ़ता तनाव।

भारत-पाकिस्तान के झंडे वाले हाथों और पानी की धारा से सिंधु जल संधि विवाद दर्शाता प्रतीकात्मक चित्र।
नई दिल्ली: भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुरानी सिंधु जल संधि को लेकर भू-राजनीतिक और कूटनीतिक गतिरोध एक नए और बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गया है। हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय द्वारा जारी किए गए एक हालिया एकतरफा फैसले को भारत सरकार ने पूरी तरह से अवैध और अमान्य घोषित करते हुए सिरे से खारिज कर दिया है। सीमा पार से होने वाले रणनीतिक और सुरक्षा जोखिमों के बीच, नई दिल्ली ने जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर निर्माणाधीन किरू और क्वॉर जैसी प्रमुख जलविद्युत परियोजनाओं के काम को अभूतपूर्व गति देने का निर्णय लिया है। अंतरराष्ट्रीय दबावों की परवाह न करते हुए भारत द्वारा अपनी जल संप्रभुता को प्राथमिकता देने के इस कदम से दोनों पड़ोसी देशों के बीच तकनीकी और कूटनीतिक मतभेद बेहद गहरे हो गए हैं।
इस नए विवाद की पृष्ठभूमि जून २०२५ से जुड़ी है, जब पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि के तहत भारत द्वारा अपनाई जा रही जल संचयन की गणना प्रणालियों पर तकनीकी सवाल उठाते हुए मध्यस्थता अदालत के हस्तक्षेप की मांग की थी। भारत द्वारा इस पूरी न्यायिक कार्यवाही का निरंतर बहिष्कार किए जाने के बावजूद, अदालत ने खुद को इस मामले में सक्षम घोषित किया था। अब इस तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय ने अपने फैसले में भारत के पनबिजली संयंत्रों में जल भंडारण स्तर संबंधी अधिकारों को गंभीर रूप से सीमित करने का प्रयास किया है, साथ ही पाकिस्तान की कृषि और पर्यावरणीय आवश्यकताओं के लिए न्यूनतम जल प्रवाह बनाए रखने की अनिवार्यता लागू की है। अदालत के इस आदेश के तहत भारत के लिए योजना चरण से ही विस्तृत हाइड्रोलॉजिक डेटा, आयामी योजनाएं और ऑपरेटिंग पूल की गणना साझा करना और पाकिस्तान को आपत्तियों के लिए पर्याप्त समय देना अनिवार्य बताया गया है।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस पूरे न्यायिक घटनाक्रम पर बेहद सख्त और स्पष्ट रुख अपनाते हुए इस फैसले की वैधता को पूरी तरह नकार दिया है। विदेश मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, भारत ने इस अवैध रूप से गठित तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय की स्थापना या इसके द्वारा संचालित किसी भी कार्यवाही को कभी मान्यता नहीं दी है। कूटनीतिक प्रोटोकॉल के तहत नई दिल्ली पहले ही इस्लामाबाद को समझौते पर व्यापक पुनर्विचार करने के लिए औपचारिक नोटिस भेज चुकी है, जिस पर पाकिस्तान की ओर से अब तक कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई है। भारत सरकार का रुख साफ है कि संधि को स्थगित रखने का उसका निर्णय यथावत रहेगा और किसी भी अंतरराष्ट्रीय मंच के ऐसे फैसलों को स्वीकार नहीं किया जाएगा जो सिंधु जल संधि की मूल और सामान्य व्याख्या के प्रतिकूल हों।
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चल रही इस कानूनी जंग के समानांतर भारत ने धरातल पर अपनी रणनीतिक तैयारी और बुनियादी ढांचा विकास को तेज कर दिया है। नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन के तत्वावधान में जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में जल मोड़ने और गाद प्रबंधन की वृहद योजनाओं पर तेजी से काम शुरू हो गया है। लाहुल-स्पीति क्षेत्र में करीब २,३५२ करोड़ रुपये की लागत से ८.७ किलोमीटर लंबी चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना का निर्माण कार्य युद्धस्तर पर आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य चिनाब नदी के पानी को ब्यास नदी की ओर मोड़ना है। गाद प्रबंधन प्रणाली को बहाल करने सहित इन दोनों परियोजनाओं पर कुल २,६०० करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है। भारत के ये रणनीतिक बुनियादी ढांचागत कदम यह साफ संकेत देते हैं कि वह अपनी विकास प्राथमिकताओं और राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
