भारत के फैसले से नेपाल को नई उम्मीद! चीनी कंपनियों पर बदले रुख के बीच हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को मिल सकती है राहत|
भारत द्वारा चुनिंदा चीनी कंपनियों को छूट दिए जाने के बाद नेपाल अपनी पनबिजली परियोजनाओं के लिए कूटनीतिक दबाव बनाने की तैयारी में है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाल के दृष्टिकोण को बिजली ट्रांसमिशन लाइनों के संदर्भ में दर्शाया गया है|
भारत सरकार द्वारा चीन से जुड़ी चार कंपनियों को भारतीय बिजली ट्रांसमिशन परियोजनाओं में सीमित समय के लिए निवेश की अनुमति दिए जाने के निर्णय ने नेपाल के ऊर्जा गलियारे में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। भारत के वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग द्वारा जारी इस आदेश के बाद, नेपाल के नीति-निर्धारकों का मानना है कि यह काठमांडू के लिए अपनी उन पनबिजली परियोजनाओं को लेकर कूटनीतिक दबाव बनाने का एक महत्वपूर्ण अवसर है, जिनमें चीनी भागीदारी या निवेश शामिल है। नेपाल की सरकार अब इन पुराने प्रतिबंधों को शिथिल करने की मांग करने की दिशा में सक्रिय हो गई है, जो लंबे समय से दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग में बाधा बने हुए हैं।
हाल के वर्षों में, गलवान घाटी की घटना के बाद भारत ने सीमा साझा करने वाले देशों की कंपनियों के लिए सरकारी खरीद प्रक्रियाओं में कड़े नियम लागू किए थे। इसके तहत चीनी कंपनियों या चीन के साथ कारोबारी संबंध रखने वाली कंपनियों को सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स में शामिल होने के लिए पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य हो गया था। अब भारत ने जिन चार कंपनियों—टीबीईए एनर्जी इंडिया, नानजिंग इलेक्ट्रिक इंडिया, न्यू नॉर्थईस्ट इलेक्ट्रिक इंडिया और ताइकाई इलेक्ट्रिक (इंडिया)—को दो साल की छूट दी है, उनके बाद नेपाल को उम्मीद है कि भारत इसी तरह का उदार रुख उसके जलविद्युत क्षेत्र के लिए भी अपनाएगा।
नेपाल में कई महत्वपूर्ण पनबिजली परियोजनाएं, जैसे अपर तामाकोशी प्रोजेक्ट, में चीनी कंपनियों की हिस्सेदारी है। भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण, इन प्रोजेक्ट्स से उत्पादित बिजली को भारतीय बाजार में निर्यात करने या उनके ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में अक्सर तकनीकी बाधाएं आती रही हैं। नेपाल के पावर डेवलपर्स का आरोप है कि उन्हें बिजली निर्यात की मंजूरी पाने और निर्माण कार्यों के लिए आवश्यक विस्फोटक सामग्री के आयात परमिट (एनओसी) के लिए भारतीय दूतावास से लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। अब काठमांडू का तर्क है कि जब भारत खुद चीनी कंपनियों को अपने यहां इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में शामिल होने की अनुमति दे रहा है, तो नेपाल के उन प्रोजेक्ट्स को भी मंजूरी मिलनी चाहिए जो क्षेत्रीय बिजली व्यापार को बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं।
पोखरा में आयोजित 'संयुक्त संचालन समिति' की बैठकों के माध्यम से नेपाल इस मुद्दे को लगातार भारतीय अधिकारियों के समक्ष उठा रहा है। नेपाल सरकार अब भारत से यह अपेक्षा कर रही है कि वह अपनी सीमा पार ऊर्जा व्यापार नीति में संशोधन करे और चीनी भागीदारी वाले उन प्रोजेक्ट्स को भी स्वीकृति दे, जो नेपाल के ग्रिड को भारतीय बाजार से जोड़ने के लिए तैयार हैं। नेपाल के लिए यह केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा क्षमता को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कोशिश है। भारत का यह निर्णय न केवल इन कंपनियों के लिए नई संभावनाएं खोलता है, बल्कि यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले समय में नई दिल्ली काठमांडू की इन मांगों को किस दृष्टिकोण से देखती है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
