1996 में हुए 30 वर्षीय समझौते की अवधि इस साल हो रही है समाप्त, ग्लोबल वार्मिंग के कारण बदलते जल स्तर के बीच ढाका ने नए सिरे से कड़े समझौते की मांग की।

नई दिल्ली और ढाका के बीच रणनीतिक और कूटनीतिक संबंध एक बार फिर बेहद संवेदनशील मोड़ पर आकर खड़े हो गए हैं। बांग्लादेश में प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने साफ कर दिया है कि भविष्य में दोनों देशों के आपसी रिश्ते पूरी तरह से गंगा जल-बंटवारा समझौते के नवीनीकरण या इसके भविष्य पर निर्भर करेंगे। ऐतिहासिक 'फरक्का दिवस' के अवसर पर आयोजित एक विशेष चर्चा के दौरान बीएनपी के शीर्ष नेतृत्व ने भारत को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट अल्टीमेटम दिया है कि कोई भी अल्पकालिक या अस्थायी समझौता अब स्वीकार्य नहीं होगा। यह बयान ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के बीच साल 1996 में हस्ताक्षरित हुई 30 वर्षीय ऐतिहासिक गंगा जल संधि अपने समापन के कगार पर है।

बीएनपी के महासचिव और स्थानीय सरकार, ग्रामीण विकास तथा सहकारिता मंत्री मिर्ज़ा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने इस मुद्दे की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि नई संधि अनिश्चित काल के लिए होनी चाहिए। उनके अनुसार, यह संधि तब तक प्रभावी रहनी चाहिए जब तक कि इसकी जगह कोई अन्य स्थायी और सर्वसम्मति वाला भविष्य का समझौता नहीं ले लेता। बांग्लादेशी राजनीति में प्रधानमंत्री तारिक रहमान के बाद दूसरे सबसे कद्दावर नेता माने जाने वाले आलमगीर ने भारत पर अंतरराष्ट्रीय जल कानूनों और संधियों की अनदेखी करने का सीधा आरोप लगाया है। उन्होंने दावा किया कि भारत ने दोनों देशों के बीच बहने वाली 54 साझा नदियों पर एकपक्षीय तरीके से कई बांधों का निर्माण किया है, जिससे नदियों का प्राकृतिक प्रवाह पूरी तरह से बाधित हो गया है। बांग्लादेश का तर्क है कि भारत द्वारा अपने हितों के लिए किया जा रहा यह एकतरफा जल दोहन अब उनके देश के वजूद के लिए एक गंभीर संकट बन चुका है और उत्तरी क्षेत्रों के बंजर भूमि में तब्दील होने के शुरुआती लक्षण दिखने लगे हैं।

इस पूरे विवाद की कानूनी और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझें तो भारत और बांग्लादेश के बीच 12 दिसंबर 1996 को इस ऐतिहासिक गंगा जल संधि पर 30 वर्षों के लिए हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते की समयावधि इसी वर्ष समाप्त होने जा रही है, लेकिन इसके बावजूद अब तक इसके संशोधन या नवीनीकरण को लेकर दोनों पक्षों के बीच कोई ठोस आधिकारिक चर्चा शुरू नहीं हो सकी है। दोनों देशों के बीच बहने वाली 54 साझा नदियों के जल प्रबंधन और विवादों को सुलझाने के लिए 'संयुक्त नदी आयोग' (Joint Rivers Commission) नामक एक द्विपक्षीय तंत्र क्रियाशील है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे हैं। इस बीच, बांग्लादेशी संसद में विपक्ष के नेता और जमात-ए-इस्लामी के अमीर शफीकुर रहमान ने भी इस मामले में तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि तीस्ता मास्टर प्लान को लेकर वर्षों से किए जा रहे राजनीतिक वादों से अब जनता थक चुकी है और अब खोखले नारों के बजाय ठोस धरातलीय कार्रवाई की आवश्यकता है। उनके अनुसार, तीस्ता मास्टर प्लान के लागू होने से उत्तरी बांग्लादेश के लगभग ढाई करोड़ लोगों के जीवन और आजीविका में व्यापक सुधार आ सकता है।

यह संपूर्ण कूटनीतिक गतिरोध मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल में स्थित फरक्का बैराज को लेकर केंद्रित है, जिसका निर्माण भारत द्वारा वर्ष 1975 में किया गया था। भारत का प्राथमिक उद्देश्य कोलकाता बंदरगाह को गाद (सिल्ट) के जमाव से बचाना और जहाजों के आवागमन को सुचारू बनाए रखने के लिए गंगा के पानी को हुगली नदी की ओर मोड़ना था। हालांकि, निचले तटीय क्षेत्र में स्थित होने के कारण बांग्लादेश (जहां गंगा नदी को 'पद्मा' नाम से जाना जाता है) का हमेशा से यह आरोप रहा है कि शुष्क मौसम के दौरान इस बैराज के कारण उनके क्षेत्र में पानी का प्रवाह काफी कम हो जाता है। इसका सीधा प्रतिकूल प्रभाव बांग्लादेश के कृषि क्षेत्र, मत्स्य पालन और पर्यावरण पर पड़ता है, विशेष रूप से सुंदरवन क्षेत्र में लवणता (खारापन) तेजी से बढ़ रही है। इसी दीर्घकालिक विवाद को संतुलित करने के उद्देश्य से 1996 की संधि के तहत प्रत्येक वर्ष 1 जनवरी से 31 मई के बीच फरक्का बैराज पर पानी की कुल उपलब्धता के आधार पर 10-10 दिनों के चक्र में पानी के बंटवारे का एक निश्चित गणितीय फॉर्मूला तय किया गया था।

परंतु, बीते तीन दशकों में वैश्विक जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण गंगा नदी के प्राकृतिक जल स्तर में शीतकाल और ग्रीष्मकाल के दौरान अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया है। जल स्तर में आई इस भारी कमी के कारण 1996 का पुराना फॉर्मूला अब दोनों देशों की वर्तमान और बदलती आवश्यकताओं को पूरा करने में पूरी तरह से अपर्याप्त साबित हो रहा है। यही कारण है कि बांग्लादेश अब भारत से अधिक पानी की स्पष्ट और सख्त कानूनी गारंटी वाली एक नई संधि की मांग पर अड़ा है। दूसरी तरफ, भारत के समक्ष अपनी आंतरिक चुनौतियां हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे भारतीय राज्यों में जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ सिंचाई और प्रमुख बिजली परियोजनाओं के लिए पानी की आंतरिक मांग में भारी इजाफा हुआ है। राज्यों की इस घरेलू मांग के दबाव के कारण केंद्र सरकार के लिए बांग्लादेश को अतिरिक्त जल आपूर्ति की गारंटी देना कूटनीतिक और राजनीतिक रूप से एक अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण कार्य बन गया है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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