controversy over marker pens in Maharashtra municipal polls : महाराष्ट्र की चुनावी राजनीति में 'मार्कर पेन' बनाम 'अमिट स्याही' का विवाद अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। हाल ही में संपन्न हुए नगर निगम चुनावों के दौरान स्याही के निशानों के आसानी से मिट जाने की शिकायतों और विपक्षी दलों के तीखे हमलों के बाद, राज्य चुनाव आयोग (SEC) ने पीछे हटने का फैसला किया है। राज्य चुनाव आयुक्त दिनेश वाघमारे ने स्पष्ट किया है कि आगामी जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों में मतदाताओं की उंगलियों पर मार्कर पेन के बजाय फिर से पारंपरिक अमिट स्याही की बोतलों का इस्तेमाल किया जाएगा।

13 साल पुराने प्रयोग पर लगा विराम :

आयोग ने वर्ष 2011 में पारंपरिक स्याही की बोतलों के स्थान पर मार्कर पेन के उपयोग की शुरुआत की थी। इसके पीछे मुख्य तर्क यह था कि कांच की बोतलों के टूटने और स्याही फैलने के डर से मुक्ति मिलेगी और मतदान प्रक्रिया अधिक सुगम होगी। हालांकि, 15 जनवरी को 29 नगर निगमों के लिए हुए मतदान ने इस 'सुविधा' पर सवालिया निशान लगा दिए।

विवाद की जड़: मतदाताओं और विपक्षी दलों ने दावा किया कि मार्कर पेन के निशान पल भर में मिट रहे थे, जिससे फर्जी मतदान की आशंका बढ़ गई थी।

आयोग का पक्ष: मतदान के दिन आयुक्त वाघमारे ने इन दावों को अफवाह बताते हुए खारिज किया था और चेतावनी दी थी कि स्याही से छेड़छाड़ एक आपराधिक अपराध है।

बड़ा फैसला: अनिश्चितता और जन-आक्रोश को देखते हुए, आयोग ने 'मैसूर पेंट्स' को 5 सीसी की 1.5 लाख और 10 सीसी की 75,000 अमिट स्याही की बोतलों का भारी-भरकम ऑर्डर दे दिया है।

राजनीतिक घमासान और जांच की मांग :

यद्यपि भाजपा ने इन स्थानीय निकाय चुनावों में बड़ी जीत दर्ज की है, लेकिन चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल अब भी बरकरार हैं। आम आदमी पार्टी के नेता विजय कुम्भार ने इस फैसले को "देर से लिया गया निर्णय" करार देते हुए सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मांग की है कि मार्कर पेन के इस्तेमाल की अनुमति देने की प्रक्रिया की गहन जांच होनी चाहिए और यह पता लगाया जाना चाहिए कि क्या इनका दुरुपयोग किया गया।

कानूनी पहलू और आगामी चुनाव :

चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि ग्रामीण स्थानीय निकायों (जिला परिषद और पंचायत समिति) के चुनाव फरवरी में आयोजित होंगे, जहां केवल पारंपरिक स्याही का ही उपयोग अनिवार्य होगा। प्रशासन ने कड़े निर्देश जारी किए हैं कि मतदान की पवित्रता बनाए रखने के लिए किसी भी प्रकार की तकनीकी कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

यह घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में 'सुविधा' से ऊपर 'शुचिता' और 'जन-विश्वास' का स्थान है। मार्कर पेन का हटाया जाना केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि चुनावी निष्पक्षता को लेकर उठते सवालों पर आयोग की एक मजबूरी और समाधान दोनों है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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