घरेलू प्रताडना से IAS तक एक मां का वो दर्द भरा सफर ; जाने क्या है IAS Savita Pradhan की कहानी
'वह बच्चों के सामने मुझे पीटता था। एक दिन एक बाल्टी में पेशाब किया और मुझ पर फेंक दिया..' ऐसे हालत में घरेलू हिंसा और संघर्षों को मात देकर पहले ही प्रयास में कैसे हासिल किया IAS का पद? पढ़िए इस साहसी मां की प्रेरणादायी कहानी।

आईएएस अधिकारी सविता प्रधान अपने कार्यालय में विभागीय फाइलों का अवलोकन करते हुए
Who is IAS Savita Pradhan : मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव से निकलकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) तक का सफर तय करने वाली सविता प्रधान की कहानी केवल एक प्रशासनिक सफलता नहीं है, बल्कि यह उन लाखों महिलाओं के लिए उम्मीद की एक किरण है जो बंद कमरों में जुल्म सहने को मजबूर हैं। यह कहानी एक ऐसी मां की है जिसने अपनी गरिमा और बच्चों के भविष्य के लिए न केवल घरेलू हिंसा के खिलाफ विद्रोह किया, बल्कि व्यवस्था के सबसे ऊंचे शिखर पर पहुंचकर उन हाथों को जवाब दिया जिन्होंने कभी उन पर प्रहार किया था।
सविता प्रधान का जन्म मध्य प्रदेश के मंडई गांव के एक साधारण आदिवासी परिवार में हुआ था। संघर्ष की शुरुआत बचपन से ही हो गई थी, जब 10वीं की पढ़ाई के लिए उन्हें रोजाना 7 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था क्योंकि परिवार के पास बस के 2 रुपये खर्च करने की सामर्थ्य नहीं थी। वह पूरे गांव में 10वीं पास करने वाली पहली लड़की बनीं और डॉक्टर बनने का सपना लिए 11वीं में जीव विज्ञान विषय चुना। हालांकि, नियति ने उनके लिए कुछ और ही तय कर रखा था। अभी पढ़ाई पूरी भी नहीं हुई थी कि एक संपन्न परिवार से रिश्ता आया और महज 16 साल की उम्र में सविता की शादी कर दी गई।
शादी के बाद सविता की दुनिया पूरी तरह बदल गई। जिस ससुराल को उन्होंने अपना घर समझा, वहां उन्हें शारीरिक और मानसिक शोषण का सामना करना पड़ा। पति उनसे उम्र में 10 साल बड़े थे, लेकिन उनके व्यवहार में न सम्मान था और न संवेदना। घर के भीतर और बाहर सबके सामने उन्हें पीटा जाता और अपमानित किया जाता था। दो बच्चों की मां बनने के बाद भी यह सिलसिला नहीं रुका। जुल्म की इंतहा तब हुई जब एक रात उन्होंने हार मानकर फंदा लगाने की कोशिश की, लेकिन सो रहे बच्चों के मासूम चेहरों ने उन्हें रोक लिया। उस क्षण उन्होंने मरने के बजाय लड़ने का फैसला किया।
सविता ने एक बड़ा और साहसी कदम उठाते हुए महज 2700 रुपये लेकर अपने दोनों बच्चों के साथ ससुराल की दहलीज पार कर ली। उनके पास न कोई सहारा था और न रहने का ठिकाना। उन्होंने अपनी चचेरी बहन की भाभी के घर शरण ली और जीवन यापन के लिए छोटे-मोटे काम शुरू किए।
संघर्ष के दौर के मुख्य पड़ाव:
- ब्यूटी पार्लर में काम कर घर का खर्च चलाया।
- बच्चों को पालने के साथ-साथ ट्यूशन पढ़ाया।
- अभावों के बीच सिविल सेवा की तैयारी के लिए रात-रात भर पढ़ाई की।
ससुराल से भागने के बाद सविता अपनी चचेरी बहन की भाभी के घर में रहने लगी थीं। पार्लर में काम किया, ट्यूशन पढ़ाया और संघर्ष करते-करते आगे की पढ़ाई की। लेकिन अभी सब खत्म नहीं हुआ था। अलग होने के बाद भी पति कभी-कभी आता था और मारपीट करता था। उन्होंने बताया, 'वह बच्चों के सामने मुझे पीटता था। एक दिन एक बाल्टी में पेशाब किया और मुझ पर फेंक दिया। उस समय मैं एग्जाम देने जा रही थी। मैं फिर से नहाई, कपड़े बदले और अपना पेपर देने चली गई। मेरा दिल वाकई में कठोर हो गया था।'
सविता की मेहनत तब रंग लाई जब उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में मध्य प्रदेश राज्य सिविल सेवा परीक्षा (MPPSC) पास की। उनकी प्रतिभा को देखते हुए सरकार ने उन्हें 75,000 रुपये की छात्रवृत्ति प्रदान की, जिससे उनका हौसला और बढ़ा। इसके बाद उन्होंने अपना लक्ष्य और ऊंचा किया और साल 2017 की यूपीएससी परीक्षा में अपने पहले ही प्रयास में प्रीलिम्स, मेन्स और इंटरव्यू पास कर आईएएस (IAS) बनकर इतिहास रच दिया। सविता प्रधान का यह सफर साबित करता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि मन में दृढ़ संकल्प हो तो शून्य से शिखर तक का रास्ता बनाया जा सकता है। आज वह न केवल एक प्रशासनिक अधिकारी हैं, बल्कि उस अदम्य नारी शक्ति का प्रतीक हैं जिसने हिंसा की राख से उठकर सफलता का आसमान छू लिया।

Ashiti Joil
यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।
