खेतों में दफन हो चुकी नदी में अचानक बह निकली जलधारा, जानिए कौन है यह 'आधुनिक भागीरथ' आईएएस!
'एक जिला-एक नदी' योजना के तहत बिना सरकारी बजट के ग्रामीणों के सहयोग से हटवाए गए अवैध कब्जे, 45 किलोमीटर तक बह निकली पानी की धार।

शाहजहांपुर के जिलाधिकारी कार्यालय में बैठे आईएएस धर्मेंद्र प्रताप सिंह (बाएं) और पुनर्जीवित हुई भैंसी नदी के किनारे निरीक्षण करते अधिकारी व स्थानीय ग्रामीण (दाएं)।
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले में सामुदायिक सहभागिता और प्रशासनिक नेतृत्व की एक ऐसी मिसाल सामने आई है, जिसने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक नया इतिहास रच दिया है। कभी खेतों, अवैध कब्जों और समय की मार के बीच पूरी तरह से गायब हो चुकी ऐतिहासिक भैंसी नदी एक बार फिर से जीवंत हो उठी है। दशकों से सूखी पड़ी इस नदी के धरातल पर दोबारा पानी की अविरल धारा को बहता देखकर स्थानीय ग्रामीणों की आँखें खुशी से छलक उठी हैं। शाहजहांपुर के जिलाधिकारी धर्मेंद्र प्रताप सिंह इस पूरे भगीरथ प्रयास के मुख्य सूत्रधार बनकर उभरे हैं, जिनके कुशल मार्गदर्शन और स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों तथा पर्यावरण प्रेमियों के साझा संकल्प ने इस मृतप्राय नदी को करीब 45 किलोमीटर तक दोबारा प्रवाहित कर दिया है। अब इस जलधारा को इसके अंतिम पड़ाव यानी गोमती नदी के संगम तक पहुंचाने के प्रयास युद्धस्तर पर जारी हैं।
भौगोलिक दृष्टि से भैंसी नदी का उद्गम पड़ोसी जिले पीलीभीत के भैंसार तालाब से माना जाता है। वहां से प्राकृतिक ढलान के साथ आगे बढ़ते हुए यह नदी शाहजहांपुर जिले की सीमा में प्रवेश करती है। बंडा ब्लॉक के गहलोइया गांव से निकलने वाली एक अन्य प्राकृतिक जलधारा भी आगे चलकर इसमें समाहित हो जाती है। इसके बाद ये दोनों धाराएं दलेलापुर के समीप एक रूप धारण कर लेती हैं और करीब 56 किलोमीटर का लंबा सफर तय करते हुए पन्नघाट नामक स्थान पर पवित्र गोमती नदी में मिल जाती हैं। स्थानीय बुजुर्गों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, करीब 30 से 35 साल पहले तक इस नदी में सालभर स्वच्छ जल प्रवाहित होता था, जो न केवल कृषि बल्कि वन्यजीवों और भूजल पुनर्भरण का मुख्य आधार था।
नदी के विलुप्त होने की कहानी मानवीय हस्तक्षेप और लापरवाही का एक क्लासिक उदाहरण है। धीरे-धीरे नदी के बहाव क्षेत्र और किनारों की जमीनों पर अवैध रूप से खेती शुरू हो गई, जिससे इसका प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध होता चला गया। जल स्रोतों और फीडर तालाबों पर अवैध कब्जों के कारण पानी की आवक पूरी तरह से बंद हो गई, जिसके परिणामस्वरूप नदी धीरे-धीरे एक सूखे मैदान और फिर खेतों में तब्दील हो गई। इस प्राकृतिक आपदा को भांपते हुए कोविड काल के दौरान इसे बचाने की एक सुगबुगाहट शुरू हुई, जिसने देखते ही देखते जन आंदोलन का रूप ले लिया। 'एक हजार हाथ भैंसी के साथ' के गगनभेदी नारे के साथ ग्रामीण, सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरण प्रेमी एक मंच पर आए। प्रभावित गांवों में लगातार चौपालें और बैठकें आयोजित की गईं, जहां लोगों ने इस नदी को पुनर्जीवित करने का सामूहिक संकल्प लिया।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इस नदी का पुनर्जीवन बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों और वरिष्ठ वैज्ञानिक दया श्रीवास्तव के अनुसार, किसी भी नदी का प्राकृतिक मार्ग बाधित होने से उसका संपूर्ण स्थानीय जल चक्र पूरी तरह टूट जाता है। भूगर्भ जल विभाग के इंजीनियर गणेश नेगी ने इस संदर्भ में तकनीकी स्पष्टीकरण देते हुए बताया कि नदियों के तल के नीचे विशेष प्राकृतिक जल स्रोत मौजूद होते हैं, जिन्हें 'आार्टिशियन वेल' कहा जाता है। ये स्रोत न केवल नदी को निरंतर पानी प्रदान करते हैं बल्कि नदी में पानी रहने से खुद भी रिचार्ज होते रहते हैं। भैंसी नदी के दोबारा जीवित होने से नेवादा डाह, रसूलापुर, देवकली, मीरपुर और जेवां सहित सैकड़ों गांवों का गिरता भूजल स्तर सुधरने लगा है।
इस पूरे महाअभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें किसी भी प्रकार के सरकारी धन का इस्तेमाल नहीं किया गया, बल्कि यह पूरी तरह से जन सहयोग पर आधारित था। नदी की सुरक्षा और निगरानी के लिए ग्रामीणों ने स्वयं जिम्मेदारी संभालते हुए एक-एक किलोमीटर का क्षेत्र आपस में बांट लिया। नदी के तटबंधों पर लगाए गए हजारों पौधों की देखरेख के लिए 'पेड़ पालक' नियुक्त किए गए। हालांकि प्रतिकूल मौसम और आवारा पशुओं के कारण शुरुआत में कई पौधे नष्ट हुए, लेकिन स्थानीय लोगों की कड़ी मेहनत के कारण आज हजारों पौधे विशाल वृक्षों में तब्दील हो चुके हैं। राधेश्याम वर्मा, ज्ञानेंद्र वर्मा, हरिओम, विजय पाठक, नीरज सिंह, संजय त्रिपाठी, आलोक मिश्रा, देवेश गंगवार और नन्हे लाल जैसे समर्पित ग्रामीणों ने इस अभियान की अलख को घर-घर तक पहुँचाया।
प्रशासनिक स्तर पर 14 सितंबर 2024 को शाहजहांपुर के जिला मजिस्ट्रेट के रूप में पदभार संभालने वाले आईएएस धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने इस अभियान को 'एक जिला-एक नदी' योजना के तहत शामिल कर नई ऊर्जा प्रदान की। उनके नेतृत्व में अब तक नदी मार्ग के आसपास के करीब 80 तालाबों को पूरी तरह से भू-माफियाओं के चंगुल से कब्जामुक्त कराया जा चुका है और नदी के किनारों पर 40 हजार से अधिक फलदार और छायादार पेड़ लगाए गए हैं। उल्लेखनीय है कि धर्मेंद्र प्रताप सिंह 1996 बैच के पीसीएस अधिकारी हैं, जिन्हें साल 2013 में आईएएस कैडर में पदोन्नत किया गया था। वह मात्र 21 वर्ष की आयु में एसडीएम बन गए थे और नई दिल्ली नगरपालिका परिषद में निदेशक सतर्कता के रूप में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें प्रधानमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण में ओएसडी रहते हुए उन्होंने मेट्रो परियोजना और उत्तर प्रदेश की सबसे लंबी एलिवेटेड रोड को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनकी धर्मपत्नी डॉ. एकता सिंह नोएडा की एक बेहद प्रतिष्ठित स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं। शाहजहांपुर में उनके द्वारा शुरू किया गया यह नदी पुनर्जीवन कार्य देश के अन्य हिस्सों के लिए जल संरक्षण का एक अनुकरणीय मॉडल बन चुका है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
