हावड़ा पुलिस ने गैंगस्टर को सरेआम बनियान और शॉर्ट्स में घुमाया, पुलिस की इस कार्रवाई पर भड़का सियासी संग्राम
हावड़ा में रंगदारी के आरोपी आकाश सिंह को केवल बनियान और शॉर्ट्स में अपराध स्थल पर ले जाने को लेकर मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप

चित्र में सफेद रंग की पुलिस वर्दी पहने कई सुरक्षाकर्मी एक व्यक्ति को बनियान और शॉर्ट्स में पकड़कर बाजार क्षेत्र से ले जाते हुए दिख रहे हैं।
पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में कानून व्यवस्था और आपराधिक जांच के तौर-तरीकों को लेकर एक नया प्रशासनिक और राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। हावड़ा पुलिस द्वारा एक कुख्यात वसूली गिरोह के सरगना और गैंगस्टर आकाश सिंह के खिलाफ की गई खोजी कार्रवाई के दौरान अपनाए गए आचरण ने मानवाधिकारों और पुलिस नियमावली पर गंभीर बहस छेड़ दी है। पुलिस टीम द्वारा जांच प्रक्रिया के तहत आरोपी को अत्यंत ही सीमित कपड़ों यानी केवल बनियान और शॉर्ट्स में सार्वजनिक स्थानों पर ले जाए जाने की तस्वीरें सामने आने के बाद नागरिक समाज और आलोचकों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इस पूरे घटनाक्रम ने जहां एक तरफ पुलिस की त्वरित कार्यशैली को चर्चा में ला दिया है, वहीं दूसरी तरफ कानून के दायरे में रहकर आरोपियों के मानवीय अधिकारों की रक्षा करने के संवैधानिक सिद्धांतों को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
सच्चाई का पता लगाने और आपराधिक साक्ष्यों की कड़ियों को जोड़ने के लिए हावड़ा पुलिस की एक विशेष टीम रविवार को आरोपी आकाश सिंह को लेकर शहर के विभिन्न हिस्सों में पहुंची थी। इस दौरान पुलिस ने मालिपंचघरा और गोलाबाड़ी थाना क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाले कई कथित अपराध स्थलों का दौरा किया। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, इस पूरी कवायद का प्राथमिक उद्देश्य क्राइम सीन को रीक्रिएट करना था ताकि यह सटीक रूप से समझा जा सके कि विभिन्न आपराधिक घटनाओं को किस तरह अंजाम दिया गया था, इसमें कौन-कौन से अन्य अपराधी शामिल थे और इस गिरोह का पूरा नेटवर्क किस प्रणाली के तहत संचालित हो रहा था। पुलिस का दावा है कि इस वैज्ञानिक पद्धति से लंबित मामलों की जांच को तार्किक अंजाम तक पहुंचाने में मदद मिलती है।
आरोपी आकाश सिंह पर हावड़ा और उसके आस-पास के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रंगदारी और वसूली का सिंडिकेट चलाने का पुराना आपराधिक इतिहास दर्ज है। इसके अलावा उस पर एक पुलिस अधिकारी पर जानलेवा हमला करने और गोली चलाने जैसा अत्यंत गंभीर और संवेदनशील मामला भी दर्ज है, जिसके चलते पुलिस उसे एक अत्यंत खतरनाक श्रेणी का अपराधी मानती है। इसी सुरक्षा संवेदनशीलता को देखते हुए रविवार को किए गए इस ऑपरेशन के दौरान भारी मात्रा में सशस्त्र पुलिस बल की तैनाती की गई थी। पुलिस सूत्रों का कहना है कि पुराने और लंबित मामलों को दोबारा खोलने के बाद इस नेटवर्क से जुड़े अन्य सफेदपोश और भूमिगत अपराधियों की पहचान करने के लिए आरोपी से मौके पर पूछताछ करना साक्ष्य कानून के तहत बेहद अनिवार्य कदम था।
हालांकि, इस पूरी कानूनी प्रक्रिया के दौरान जो दृश्य सड़कों पर दिखाई दिया, उसने इस कानूनी कार्रवाई को एक राजनीतिक और सामाजिक विवाद में तब्दील कर दिया। आरोपी को अत्यधिक सुरक्षा के बीच शहर की व्यस्त सड़कों और सार्वजनिक चौराहों पर केवल अंतःवस्त्रों और बनियान में पैदल चलाते हुए ले जाया गया, जिसे आलोचकों ने 'सार्वजनिक परेड' की संज्ञा दी है। कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी भी आरोपी को, चाहे उस पर कितने ही गंभीर आरोप क्यों न हों, इस तरह अर्ध-नग्न अवस्था में जनता के सामने प्रदर्शित करना सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित गाइडलाइंस और पुलिस आचरण संहिता का स्पष्ट उल्लंघन प्रतीत होता है। आलोचकों के मुताबिक, ऐसी कार्रवाइयां न्याय प्रणाली के बजाय प्रतिशोधात्मक पुलिसिंग की छवि पेश करती हैं।
दूसरी तरफ, हावड़ा पुलिस प्रशासन ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए अपनी कार्रवाई का बचाव किया है। पुलिस के उच्च पदस्थ अधिकारियों का पक्ष है कि यह पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से एक मानक आपराधिक जांच प्रक्रिया का हिस्सा थी और इसमें किसी भी नियम का उल्लंघन जानबूझकर नहीं किया गया है। पुलिस सूत्रों ने संकेत दिया कि आरोपी को इस हालत में रखने के पीछे विशिष्ट सुरक्षा कारण और लॉजिस्टिक विवशताएं थीं, ताकि हिरासत से भागने या अचानक हमला होने जैसी आकस्मिक स्थितियों को टपकाया जा सके। पुलिस के अनुसार, इस संवेदनशील ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा प्रोटोकॉल का कड़ाई से पालन किया गया था और मुख्य ध्यान केवल साक्ष्यों की मजबूती पर था।
भारतीय कानूनी प्रणाली और मानवाधिकार आयोगों के पूर्ववर्ती फैसलों के आलोक में देखें तो किसी भी बंदी या विचाराधीन कैदी की मानवीय गरिमा को बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी माना गया है। इस घटना के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है, जहां विपक्षी दलों ने राज्य पुलिस पर कानून के राज के बजाय डराने-धमकाने की संस्कृति को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। बहरहाल, हावड़ा का यह मामला इस बात का एक ज्वलंत उदाहरण बन गया है कि अपराध के खात्मे के लिए की जाने वाली पुलिसिया कार्रवाइयों और नागरिक अधिकारों के बीच की बारीक रेखा कितनी संवेदनशील होती है, और आने वाले दिनों में यह मामला अदालत या मानवाधिकार मंचों तक पहुंचने पर पुलिस अधिकारियों के लिए प्रशासनिक जवाबदेही का सबब बन सकता है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
