सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हिंदू कानून के आधार को लेकर चल रही भ्रांतियों पर स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू कानून को केवल ‘मनुस्मृति’ से जोड़ना एक तथ्यात्मक गलती है। उन्होंने यह बात दिल्ली में 'प्राचीन ज्ञान और कानूनी समझ' विषय पर आयोजित एक व्याख्यान के दौरान कही। सॉलिसिटर जनरल ने जोर देकर कहा कि भारत के अधिकांश हिस्सों में हिंदू कानून 'मिताक्षरा' विचारधारा पर आधारित है, न कि 'मनुस्मृति' पर।

तुषार मेहता के अनुसार, 700 ईस्वी से पहले से ही हिंदू कानून मुख्य रूप से दो विचारधाराओं में विभाजित रहा है। पहली विचारधारा 'मिताक्षरा' है और दूसरी 'दायभाग'। उन्होंने स्पष्ट किया कि विज्ञानेश्वर द्वारा विकसित 'मिताक्षरा' प्रणाली पूरी तरह से 'याज्ञवल्क्य स्मृति' पर आधारित है। यह विचारधारा बंगाल और असम को छोड़कर पूरे भारत में प्रचलित रही है। वहीं, बंगाल और असम में 'दायभाग' विचारधारा का पालन किया जाता था, जो 'मनुस्मृति' पर आधारित मानी जाती है।

कानूनी अंतर को स्पष्ट करते हुए मेहता ने बताया कि 'दायभाग' प्रणाली में विरासत का अधिकार मुख्य रूप से उस व्यक्ति को प्राप्त होता था जो पूर्वजों को 'पिंडदान' करने में सक्षम होता था। 'पिंडदान' का अर्थ श्राद्ध के दौरान पूर्वजों को समर्पित चावल के गोले (राइस केक) से है। इस प्रणाली में विरासत का दायरा अत्यंत सीमित था। इसके विपरीत, 'मिताक्षरा' विचारधारा को अधिक उदार और गतिशील माना गया है। यह 'पिंड' को डीएनए (DNA) के समान मानकर जन्म से ही उत्तराधिकार का अधिकार प्रदान करती है। यही कारण है कि आधुनिक हिंदू कानून में भी 'कोपार्सनर' (सह-उत्तराधिकारी) को जन्म से ही विरासत का अधिकार प्राप्त होता है।

गोद लेने के कानूनी प्रावधानों पर चर्चा करते हुए सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि हिंदू धर्मग्रंथों पर आधारित कानूनों की व्याख्या समकालीन संदर्भों में गतिशील तरीके से की जा सकती है। उन्होंने कहा कि स्त्री और पुरुष के बीच रिश्तों की वर्जित श्रेणियों को तय करने वाली प्राचीन समझ अत्यंत व्यवस्थित थी। उन्होंने उल्लेख किया कि 700 ईस्वी से भी पहले स्थापित इस कानूनी व्यवस्था को संसद ने हिंदू विवाह कानून को संहिताबद्ध करते समय अपनी स्वीकृति दी थी।

तुषार मेहता का यह स्पष्टीकरण इस दृष्टिकोण को पुष्ट करता है कि हिंदू कानून की जड़ें अत्यंत व्यापक और विविध हैं। केवल एक विशिष्ट ग्रंथ को इसका एकमात्र आधार मानना ऐतिहासिक और कानूनी रूप से अधूरा है। यह व्याख्या न केवल प्राचीन भारतीय कानूनी प्रणाली की जटिलता को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि कैसे ये प्राचीन सिद्धांत आधुनिक भारतीय कानून की आधारशिला बने हुए हैं।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

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