सैकड़ों साल पुरानी प्रथा पर कानूनी प्रहार: किन्नर अब हक समझकर नहीं मांग पाएंगे बधाई, जबरदस्ती की तो होगी जेल।
लखनऊ बेंच ने जजमानी प्रथा को मौलिक अधिकार मानने से किया इनकार, कहा- जबरन धन वसूली भारतीय न्याय संहिता के तहत आपराधिक कृत्य।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय जहां किन्नर समुदाय के नेग मांगने के अधिकार से जुड़ी याचिका पर सुनवाई हुई।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने पारंपरिक प्रथाओं और आधुनिक विधिक व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण लक्ष्मण रेखा खींच दी है। न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किन्नर (ट्रांसजेंडर) समुदाय को 'नेग' या 'बधाई' मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने अपने रुख में यह भी कड़ा संदेश दिया है कि इस तरह की प्रथाओं को न तो मौलिक अधिकार के रूप में संरक्षित किया जा सकता है और न ही इन्हें कानून सम्मत आर्थिक गतिविधि माना जा सकता है। यह फैसला उस समय आया है जब समाज में अक्सर बधाई मांगने के नाम पर होने वाली जबरदस्ती और वर्चस्व की लड़ाइयों की खबरें आती रहती हैं।
न्यायालय के समक्ष यह मामला गोंडा जिले के करनैलगंज क्षेत्र की निवासी रेखा देवी नामक एक किन्नर की याचिका के माध्यम से पहुंचा था। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की थी कि उन्हें एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में 'नेग' मांगने का विशेष अधिकार प्रदान किया जाए। इसके साथ ही याचिका में यह भी अनुरोध किया गया था कि उनके क्षेत्र में अन्य समूहों के किन्नरों के प्रवेश को प्रतिबंधित किया जाए ताकि क्षेत्र को लेकर होने वाले विवादों और संभावित हिंसा को रोका जा सके। याचिकाकर्ता का तर्क था कि वे पीढ़ियों से एक तय क्षेत्र में जजमानी प्रथा के तहत बधाई मांगती आ रही हैं और कानून को उनके इस पारंपरिक अधिकार की रक्षा करनी चाहिए।
न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए विधि की मर्यादा को सर्वोपरि रखा। खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान अत्यंत तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी भी प्रकार की वित्तीय वसूली, चाहे वह कर (टैक्स) हो, शुल्क हो या पारंपरिक 'बधाई' के नाम पर लिया जाने वाला धन, वह केवल और केवल कानून के प्रावधानों के तहत ही वैध माना जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पारंपरिक जजमानी या स्वेच्छा से दिए जाने वाले उपहारों को एक ऐसे कानूनी अधिकार में नहीं बदला जा सकता जिसे न्यायालय द्वारा लागू किया जा सके।
कानूनी पहलुओं पर विस्तृत चर्चा करते हुए उच्च न्यायालय ने सचेत किया कि यदि इस तरह की प्रथाओं को वैधानिक संरक्षण दिया जाता है, तो इससे समाज में अवैध वसूली और आपराधिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि जबरन धन मांगना या दबाव बनाकर 'नेग' वसूलना भारतीय न्याय संहिता (BNS) के विभिन्न प्रावधानों के तहत एक गंभीर आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आ सकता है। क्षेत्र निर्धारण की मांग को ठुकराते हुए अदालत ने कहा कि कानून व्यवस्था को ऐसी गतिविधियों के लिए सुरक्षा प्रदान करने का आदेश नहीं दिया जा सकता जो स्वयं में विधि सम्मत न हों।
इस फैसले का दूरगामी प्रभाव पड़ने की संभावना है, क्योंकि यह पारंपरिक सामाजिक ढांचे और संवैधानिक अधिकारों के बीच की धुंधली रेखा को साफ करता है। अदालत ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया है कि परंपराएं कानून से ऊपर नहीं हो सकतीं और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि आर्थिक लेनदेन केवल विधिक ढांचे के भीतर ही हों। याचिका को खारिज करते हुए न्यायालय ने अंततः यह स्थापित कर दिया कि किसी भी समुदाय को किसी क्षेत्र विशेष में धन वसूलने का एकाधिकार नहीं दिया जा सकता।

Lalita Rajput
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