दिल्ली जामा मस्जिद अतिक्रमण पर हाई कोर्ट का बड़ा हंटर: 'इबादत के नाम पर अवैध कब्ज़ा बर्दाश्त नहीं'
दिल्ली हाई कोर्ट ने जामा मस्जिद के पास अवैध अतिक्रमण पर सख्त आदेश जारी करते हुए एमसीडी और दिल्ली पुलिस को तत्काल कार्रवाई करने को कहा है। न्यायमूर्ति मनमोहन की खंडपीठ ने सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्ज़े को लेकर प्रशासन को फटकार लगाई। जानिए कैसे यह आदेश पुरानी दिल्ली के ऐतिहासिक स्वरूप को बदलने और अतिक्रमण मुक्त करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।

नई दिल्ली। देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक केंद्र, जामा मस्जिद क्षेत्र में दशकों से पसरे अतिक्रमण के जाल पर दिल्ली हाई कोर्ट ने एक ऐसा कड़ा रुख अख्तियार किया है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। जामा मस्जिद के दक्षिणी द्वार (Gate No. 1) और उसके आसपास की सार्वजनिक भूमि पर अवैध रूप से बनी दुकानों और ढांचों को लेकर अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि आस्था और इबादत के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति का अतिक्रमण कानूनन अपराध है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन और न्यायमूर्ति मिनी पुश्करणा की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए संबंधित अधिकारियों को 'बिना किसी देरी' के कड़ी कार्रवाई करने का आदेश सुनाया है।
इस कानूनी लड़ाई की पृष्ठभूमि एक जनहित याचिका (PIL) पर आधारित है, जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि जामा मस्जिद जैसे संरक्षित हेरिटेज ज़ोन में अवैध निर्माण के कारण न केवल पर्यटकों और नमाजियों को असुविधा हो रही है, बल्कि यह ऐतिहासिक ढांचे की सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा है। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति मनमोहन ने एमसीडी (MCD) और दिल्ली पुलिस के ढुलमुल रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। अदालत ने सवाल किया कि कैसे अधिकारियों की नाक के नीचे सरकारी जमीन पर पक्की दुकानें और फर्श बन गए? जब एमसीडी के वकील ने अतिक्रमण हटाने के लिए पुलिस बल की कमी का हवाला दिया, तो खंडपीठ ने इसे महज एक बहाना करार देते हुए तत्काल समन्वय स्थापित करने का निर्देश दिया।
कानूनी और आधिकारिक पहलुओं पर चर्चा करते हुए कोर्ट ने दिल्ली नगर निगम (MCD) के आयुक्त और दिल्ली पुलिस को एक संयुक्त टास्क फोर्स बनाने का आदेश दिया है। अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अधिकारियों को भी इस प्रक्रिया में शामिल होने को कहा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अतिक्रमण हटाते समय मुख्य मस्जिद के मूल ढांचे को कोई नुकसान न पहुँचे। जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी और स्थानीय वक्फ बोर्ड के सदस्यों को भी अदालत ने सूचित किया है कि वे इस कानूनी प्रक्रिया में सहयोग करें। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि "कोई भी व्यक्ति चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है" और सार्वजनिक सड़कों को किसी भी निजी स्वार्थ के लिए बंद नहीं किया जा सकता।
इस फैसले का प्रभाव केवल जामा मस्जिद क्षेत्र तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि यह दिल्ली के अन्य भीड़भाड़ वाले ऐतिहासिक इलाकों के लिए भी एक नजीर (Precedent) पेश करेगा। इस कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य पुरानी दिल्ली की उस खोई हुई विरासत और भव्यता को वापस लाना है, जो अवैध रेहड़ी-पटरी और माफियाओं के कब्जे की भेंट चढ़ चुकी है। हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद अब दिल्ली पुलिस और एमसीडी को आगामी सुनवाई से पहले एक 'स्टेटस रिपोर्ट' दाखिल करनी होगी। अंततः, यह आदेश न केवल कानून के शासन को स्थापित करता है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि धरोहरों का संरक्षण और जनहित, किसी भी अवैध विस्तार से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।

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