1140 सेकेंड में ISRO का बड़ा कमाल, ‘नॉटी बॉय’ GSLV ने EOS-05 को पहुंचाया अंतरिक्ष की तय कक्षा में|
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने श्रीहरिकोटा से GSLV-F17 रॉकेट के जरिए अत्याधुनिक अर्थ ऑब्ज़र्वेशन सैटेलाइट EOS-05 को जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में सफलताપૂર્વक स्थापित कर दिया है।

लॉन्च पैड पर खड़ा जीएसएलवी-एफ17 रॉकेट और इसरो द्वारा अंतरिक्ष में भेजा गया ईओएस-05 सैटेलाइट आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में।
नई दिल्ली: 4 सितंबर की अलसुबह जब देश का ज्यादातर हिस्सा गहरी नींद में था, तब आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र में भारत एक बड़ी उपलब्धि की ओर बढ़ रहा था। सुबह 2 बजकर 55 मिनट पर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO ने GSLV-F17 रॉकेट के जरिए EOS-05 सैटेलाइट को अंतरिक्ष की ओर रवाना किया। कुछ ही देर बाद यह मिशन सफल हो गया और भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक अहम उपलब्धि दर्ज हुई।
इस मिशन की सबसे खास बात यह रही कि GSLV-F17 ने 2,300 किलोग्राम से अधिक वजन वाले EOS-05 जियो-इमेजिंग सैटेलाइट को तय कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया। यह सैटेलाइट जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में करीब 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया गया। इस सफलता के साथ ISRO ने एक बार फिर अपनी लॉन्च क्षमता और जटिल अंतरिक्ष मिशन को पूरा करने की क्षमता का प्रदर्शन किया।
इस मिशन की सफलता का ऐलान लॉन्च के करीब 1140 सेकेंड बाद यानी सुबह लगभग 3 बजकर 14 मिनट पर किया गया। मिशन कंट्रोल रूम में जैसे ही सफलता की पुष्टि हुई, वहां मौजूद वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और अन्य कर्मचारियों के चेहरों पर खुशी साफ दिखाई दी। लंबे समय से इस मिशन की तैयारी में जुटी टीम के लिए यह पल बेहद खास था। देशभर में मौजूद ISRO के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और सपोर्ट स्टाफ ने इस मिशन को सफल बनाने के लिए काम किया।
ISRO के अध्यक्ष वी. नारायणन ने मिशन की सफलता पर खुशी जताते हुए कहा कि GSLV-F17 ने एडवांस्ड EOS-05 जियो-इमेजिंग सैटेलाइट को निर्धारित और जरूरी ऑर्बिट में सफलतापूर्वक तथा सटीक तरीके से स्थापित कर दिया है। मिशन की सफलता के बाद विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने भी ISRO की टीम को बधाई दी। उन्होंने इसे अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत के लिए एक और बड़ी उपलब्धि बताया।
EOS-05 को एक अत्याधुनिक अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट के तौर पर तैयार किया गया है। इसकी खासियत इसकी इमेजिंग क्षमता है। यह विजिबल, इंफ्रारेड, मल्टी-स्पेक्ट्रल और हाइपर-स्पेक्ट्रल बैंड में इमेजिंग करने की क्षमता से लैस बताया गया है। जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में इसकी मौजूदगी इसे पृथ्वी के बड़े हिस्से पर लगातार नजर रखने के लिए महत्वपूर्ण बनाती है।
इस मिशन को इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यह ऐसे समय में हुआ है जब ISRO के लॉन्च कार्यक्रम को हाल की कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। PSLV को लंबे समय से ISRO के सबसे भरोसेमंद लॉन्च व्हीकल्स में गिना जाता रहा है, लेकिन 2025 और जनवरी 2026 में इसके कुछ मिशनों में विफलता देखने को मिली। इसके बाद इन घटनाओं की जांच की गई और रॉकेट सिस्टम की टेस्टिंग तथा जरूरी सुधारों पर काम किया गया।
ऐसे समय में GSLV Mk II की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई। इसी रॉकेट को ISRO के भीतर और अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़े लोगों के बीच कई बार ‘नॉटी बॉय’ यानी ‘शरारती बच्चा’ कहा गया है। इसके पीछे इसकी लॉन्च हिस्ट्री को वजह माना जाता है। GSLV के सफर में कई सफलताएं रही हैं, लेकिन इसके कुछ मिशन असफल भी हुए हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 19 लॉन्च में से छह बार इसे असफलता का सामना करना पड़ा है। यही उतार-चढ़ाव इस रॉकेट को ‘नॉटी बॉय’ नाम दिए जाने की वजह बना।
हालांकि, GSLV की कहानी केवल असफलताओं की कहानी नहीं है। यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में आत्मनिर्भरता और तकनीकी क्षमता हासिल करने के लंबे संघर्ष की कहानी भी है। इसकी जड़ें 1990 के दशक में देखी जा सकती हैं, जब भारत को भारी संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने के लिए क्रायोजेनिक इंजन तकनीक की जरूरत थी।
क्रायोजेनिक इंजन बेहद जटिल तकनीक पर आधारित होते हैं। इनमें बेहद कम तापमान पर रखे गए तरल हाइड्रोजन और तरल ऑक्सीजन जैसे ईंधनों का इस्तेमाल किया जाता है। भारी पेलोड को ऊंची कक्षा में पहुंचाने के लिए इस तरह की तकनीक बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
भारत ने इस तकनीक को हासिल करने के लिए रूस से सहयोग मांगा था। उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तकनीक के हस्तांतरण को लेकर कई तरह की पाबंदियां और दबाव मौजूद थे। भारत को क्रायोजेनिक इंजन से जुड़ी सीमित मदद मिली, लेकिन पूरी तकनीक का हस्तांतरण नहीं हुआ। इसके बाद भारत के वैज्ञानिकों के सामने बड़ी चुनौती थी कि वह इस जटिल तकनीक को खुद विकसित करे।
ISRO के वैज्ञानिकों ने इस चुनौती को स्वीकार किया। इस तकनीक को विकसित करने में भारत को कई वर्षों तक मेहनत करनी पड़ी। इस दौरान परीक्षण हुए, चुनौतियां आईं और कई बार असफलताओं का सामना भी करना पड़ा। लेकिन वैज्ञानिकों ने अपना प्रयास जारी रखा। इसी लंबे प्रयास ने भारत को क्रायोजेनिक इंजन तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ाया।
GSLV के सफर में अगस्त 2021 की एक घटना भी महत्वपूर्ण रही। उस समय ISRO ने GSLV-F10 के जरिए GISAT-1 को लॉन्च करने की कोशिश की थी। इस मिशन का उद्देश्य ऊंची कक्षा से पृथ्वी की निगरानी करने वाले सैटेलाइट को स्थापित करना था। लेकिन मिशन के दौरान स्वदेशी क्रायोजेनिक अपर स्टेज में तकनीकी समस्या आई और रॉकेट सैटेलाइट को निर्धारित कक्षा तक नहीं पहुंचा सका। इसके चलते मिशन सफल नहीं हो पाया।
EOS-05 मिशन की सफलता को उस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के तौर पर देखा जा रहा है। इस बार GSLV-F17 ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार काम किया और सैटेलाइट को उसकी जरूरी कक्षा में स्थापित किया। इस सफलता ने GSLV प्लेटफॉर्म पर एक बार फिर भरोसा मजबूत किया है।
EOS-05 की इमेजिंग क्षमता का इस्तेमाल पृथ्वी की निगरानी से जुड़े कई कामों में किया जा सकता है। इससे भारतीय उपमहाद्वीप और आसपास के समुद्री क्षेत्रों से जुड़ी जानकारी हासिल करने में मदद मिल सकती है। सैटेलाइट की क्षमताओं का इस्तेमाल मौसम, बाढ़, चक्रवात, जंगलों में आग, खेती, पर्यावरण में बदलाव और बुनियादी ढांचे से जुड़े क्षेत्रों की निगरानी के लिए किया जा सकता है।
पृथ्वी की निगरानी करने वाले कई सैटेलाइट अपेक्षाकृत निचली कक्षाओं में घूमते हैं और किसी क्षेत्र के ऊपर से गुजरते समय उसकी तस्वीरें लेते हैं। वहीं जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में स्थापित सैटेलाइट एक बड़े क्षेत्र पर लगातार नजर रखने में सक्षम हो सकता है। EOS-05 की यही क्षमता इसे खास बनाती है।
इस सैटेलाइट से मिलने वाली जानकारी का महत्व सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों में भी हो सकता है। बड़े इलाके की लगातार निगरानी करने की क्षमता किसी भी देश के लिए महत्वपूर्ण होती है। यही वजह है कि पृथ्वी की निगरानी करने वाले आधुनिक सैटेलाइट आज अंतरिक्ष कार्यक्रमों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं।
EOS-05 को बेंगलुरु स्थित यूआर राव सैटेलाइट सेंटर में तैयार किया गया है। इसकी आधुनिक इमेजिंग क्षमताएं भारत की अर्थ ऑब्जर्वेशन क्षमता को आगे बढ़ाने में मदद कर सकती हैं। इससे अलग-अलग क्षेत्रों में पृथ्वी की सतह से जुड़ी विस्तृत जानकारी हासिल करने की क्षमता मजबूत होगी।
GSLV-F17 की सफलता का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भारत अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम में लगातार नए चरण की ओर बढ़ रहा है। ISRO के सामने आने वाले वर्षों में कई बड़े मिशन हैं। इनमें मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम गगनयान भी शामिल है। भारत का लक्ष्य भारतीय धरती से भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को भारतीय अंतरिक्ष यान के जरिए अंतरिक्ष की कक्षा में भेजना है। ऐसे मिशनों के लिए लॉन्च व्हीकल की विश्वसनीयता और तकनीकी क्षमता बेहद महत्वपूर्ण होती है।
पिछले साल GSLV परिवार ने NASA-ISRO के संयुक्त मिशन NISAR को भी सफलतापूर्वक लॉन्च किया था। NISAR पृथ्वी की सतह में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए तैयार किया गया महत्वपूर्ण अर्थ ऑब्जर्वेशन मिशन है। इसके सफल प्रक्षेपण ने भी GSLV प्लेटफॉर्म की क्षमता को सामने रखा था।
GSLV-F17 और EOS-05 की सफलता ऐसे समय में आई है जब ISRO लगातार अपने लॉन्च सिस्टम और अंतरिक्ष तकनीक को आगे बढ़ाने पर काम कर रहा है। यह मिशन केवल एक रॉकेट और एक सैटेलाइट का सफल प्रक्षेपण नहीं है, बल्कि वर्षों की मेहनत, तकनीकी विकास और लगातार सीखने की प्रक्रिया का परिणाम भी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ISRO की इस सफलता पर वैज्ञानिकों और पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इसे ISRO की एक और शानदार उपलब्धि और देश के लिए गर्व का क्षण बताया।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
