Who is Mount Everest Climber Rustam Nabiev : इंसानी जज्बा जब आसमान छूने की जिद पर अड़ जाए, तो कुदरत के कड़े नियम भी छोटे पड़ जाते हैं। रशियन हवाई दल के एक पूर्व पैराट्रूपर ने दुनिया के सबसे ऊंचे और खतरनाक पर्वत शिखर 'माउंट एवरेस्ट' पर सफलता का ऐसा परचम लहराया है, जिसने इतिहास की किताबों को फिर से लिखने पर मजबूर कर दिया है। दोनों पैर न होने के बावजूद, केवल अपने हाथों की ताकत और अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर एवरेस्ट फतह करने वाले इस जांबाज का नाम है— रुस्तम नाबिएव। यह न केवल पर्वतारोहण के इतिहास की पहली और सबसे सनसनीखेज घटना है, बल्कि यह हार न मानने की मानवीय जिजीविषा का सबसे बड़ा प्रमाण भी है।

आधी रात का वह खौफनाक मंजर: जब मलबे में दफन हुईं खुशियां :

रुस्तम नाबिएव की यह अविश्वसनीय यात्रा किसी चमत्कार से कम नहीं है। इस ऐतिहासिक कामयाबी की पटकथा आज से ठीक एक दशक पहले एक बेहद दर्दनाक हादसे के साथ शुरू हुई थी। साइबेरिया में पोस्टिंग के दौरान, 12 जुलाई 2015 की वो काली रात रुस्तम के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। रात के सन्नाटे में, जब सैन्य प्रशिक्षण शिविर के बैरक में सभी सैनिक गहरी नींद में सो रहे थे, तभी अचानक पूरी इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गई।

मलबे के उस ढेर में कई सैनिक दफन हो गए, जिनमें रुस्तम नाबिएव भी शामिल थे। जब उन्हें मलबे से बाहर निकाला गया, तो उनकी हालत बेहद नाजुक थी। रुस्तम मौत के मुहाने पर खड़े थे और उनके बचने की उम्मीदें न के बराबर थीं।

१६ सर्जरी और पैरों का कटना: जीवन की नई शुरुआत

डॉक्टरों के अथक प्रयासों के बाद रुस्तम को वेंटिलेटर पर रखा गया। उनके शरीर को बचाने के लिए डॉक्टरों को एक के बाद एक कुल 16 जटिल सर्जरी (शस्त्रक्रियाएं) करनी पड़ीं। हालांकि, उनकी जान तो बच गई, लेकिन नियति ने उनसे उनके दोनों पैर हमेशा के लिए छीन लिए। डॉक्टरों को मजबूरन उनके दोनों पैरों को काटना पड़ा।

उस वक्त समाज, करीबियों और दुनिया की नजरों में रुस्तम का करियर और जीवन पूरी तरह समाप्त हो चुका था। बैसाखी और व्हीलचेयर के सहारे बची जिंदगी को लोग महज एक बोझ मान रहे थे। लेकिन रुस्तम के भीतर का सैनिक हार मानने को तैयार नहीं था। जहां दुनिया उनके जीवन का अंत देख रही थी, वहीं से रुस्तम के लिए एक नए और अभूतपूर्व जीवन की शुरुआत हो रही थी।

हाथों के दम पर रचा इतिहास : एवरेस्ट पर फतह

रुस्तम ने कृत्रिम पैरों या दूसरों की मदद पर निर्भर रहने के बजाय अपने हाथों को ही अपनी ताकत बनाने का फैसला किया। उन्होंने कड़े शारीरिक प्रशिक्षण के जरिए अपने हाथों और कंधों को इतना मजबूत कर लिया कि वे पहाड़ों की चढ़ाई कर सकें। एवरेस्ट अभियान के दौरान, जहां अच्छे-भले पर्वतारोहियों के पैर कांप जाते हैं और ऑक्सीजन की कमी से दम टूटने लगता है, वहां रुस्तम नाबिएव ने बिना पैरों के, सिर्फ अपनी बाहों के दम पर बर्फ की दीवारों को चीरा और शून्य से कई डिग्री नीचे के तापमान को मात देते हुए दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर कदम रखा।

इस घटना ने वैश्विक स्तर पर दिव्यांगता को देखने का नजरिया बदल दिया है। खेल और पर्वतारोहण के क्षेत्र में इसे एक आधिकारिक और ऐतिहासिक कीर्तिमान के रूप में दर्ज किया गया है, जो आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता रहेगा कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, अगर हौसला अडिग हो तो एवरेस्ट जैसी चुनौतियां भी बौनी साबित होती हैं।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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