बारामती/पुणे: महाराष्ट्र की राजनीति के 'पावर हाउस' और जन-जन के चहेते नेता अजीत पवार अब यादों में शेष रह गए हैं। गुरुवार को बारामती के विद्या प्रतिष्ठान मैदान में राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। एक विमान हादसे में उनके आकस्मिक निधन ने न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है। अपनी प्रशासनिक कार्यक्षमता और बेबाक अंदाज के लिए प्रसिद्ध 'अजीत दादा' की अंतिम यात्रा में श्रद्धा और सिसकियों का ऐसा संगम दिखा, जिसने साबित कर दिया कि वे सत्ता के गलियारों से अधिक लोगों के दिलों पर राज करते थे।

अंतिम यात्रा: सिसकियों के बीच गूँजे 'अमर रहे' के नारे

सुबह से ही बारामती की सड़कें समर्थकों से पट गई थीं। अपने नेता की एक अंतिम झलक पाने के लिए महाराष्ट्र के कोने-कोने से लोग पहुँचे थे।

  • जनसैलाब और नारे: जैसे ही दादा का पार्थिव शरीर उनके आवास 'कांटेवाड़ी' से विद्या प्रतिष्ठान के लिए रवाना हुआ, हवा "अजित पवार अमर रहे" और "जब तक सूरज चाँद रहेगा, दादा तेरा नाम रहेगा" जैसे नारों से गूँज उठी।
  • भावुक क्षण: अंतिम दर्शन के दौरान सुप्रिया सुले, सुनेत्रा पवार और परिवार के अन्य सदस्य फूट-फूट कर रोते नजर आए। पूरे बारामती शहर ने स्वेच्छा से बंद रखकर अपने लाडले नेता को श्रद्धांजलि दी。

मुख़ाग्नि और राजकीय सम्मान

दोपहर लगभग 11 बजे, पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू हुई।

  • अंतिम विदाई: पुलिस की टुकड़ी ने हवा में गोलियां दागकर और बिगुल बजाकर उन्हें 'गार्ड ऑफ ऑनर' दिया。
  • चिता को अग्नि: बेहद गमगीन माहौल में अजीत पवार के बेटों, पार्थ और जय पवार, ने अपने पिता की चिता को मुखाग्नि दी。 इस दौरान शरद पवार और सुप्रिया सुले सहित पूरा पवार परिवार एक साथ खड़ा नजर आया, जो राजनीति से परे पारिवारिक एकजुटता का प्रतीक बना。

दिग्गजों का जमावड़ा: दलगत राजनीति से ऊपर उठी संवेदनाएं

अजीत पवार के कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए देश के बड़े नेता बारामती पहुँचे。

  • प्रमुख उपस्थिति: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, नितिन गडकरी और शरद पवार सहित विभिन्न दलों के नेताओं ने पुष्पचक्र अर्पित कर उन्हें नमन किया。
  • प्रशासनिक क्षति: नेताओं ने उन्हें एक ऐसे 'एडमिनिस्ट्रेटर' के रूप में याद किया जो तुरंत फैसले लेने और विकास की राजनीति के लिए जाने जाते थे。

एक अपूरणीय शून्य

अजीत पवार का जाना महाराष्ट्र के लिए एक ऐसे युग का अंत है जहाँ राजनीति में अनुशासन और विकास के प्रति अटूट निष्ठा सर्वोपरि थी。 भले ही वे पंचतत्व में विलीन हो गए हों, लेकिन बारामती की आधुनिक संरचना और महाराष्ट्र के प्रशासनिक सुधारों में उनकी छाप सदैव अमिट रहेगी। उनकी कमी न केवल उनके परिवार को, बल्कि उन लाखों कार्यकर्ताओं को भी खलेगी जिनके लिए वे एक मजबूत सहारा थे।

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