भारतीय शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) ने 'डेडिकेटेड इथेनॉल प्लांट्स' (केवल इथेनॉल बनाने वाले संयंत्र) को लेकर बड़ी चेतावनी जारी की है। एसोसिएशन का कहना है कि भविष्य के टेंडरों में अगर इन डेडिकेटेड प्लांट्स को प्राथमिकता दी जाती रही, तो इससे पारंपरिक चीनी मिलों को भारी नुकसान हो सकता है। इससे चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति बिगड़ सकती है और इसका सीधा असर गन्ना किसानों के भुगतान पर पड़ेगा, जिससे समय पर उनका बकाया चुकाने में देरी होने का खतरा पैदा हो जाएगा।

यह पूरा मामला सरकार द्वारा उठाए गए उस कदम से जुड़ा है, जिसमें घरेलू स्तर पर चीनी की आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए कई निर्देश दिए गए हैं। सरकारी तेल कंपनियों की ओर से भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) द्वारा 16 अक्टूबर को जारी किए गए ताजा खरीद टेंडर में 2026-27 के इथेनॉल आपूर्ति वर्ष के लिए लगभग 11 अरब लीटर इथेनॉल की मांग की गई है। इस टेंडर डॉक्यूमेंट में स्पष्ट रूप से निर्देश दिए गए हैं कि 2026-27 के इथेनॉल आपूर्ति वर्ष के लिए गन्ने के रस, चीनी के सिरप और 'बी-हैवी मोलासेस' (शीरे) से बनने वाले इथेनॉल को खरीद टेंडर से पूरी तरह बाहर कर दिया जाए और इथेनॉल बनाने में चीनी के इस्तेमाल (डायवर्जन) को घटाकर शून्य कर दिया जाए। सरकार का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब 'अल नीनो' की स्थिति और मौसम की अनिश्चितता के कारण गन्ने के उत्पादन पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

ISMA ने घरेलू स्तर पर चीनी की उपलब्धता को प्राथमिकता देने और सप्लाई को सुरक्षित रखने के सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है। 19 अक्टूबर को जारी एक आधिकारिक बयान में एसोसिएशन ने कहा कि मौजूदा टेंडर के तहत 'सी-हैवी मोलासेस' से बनने वाले इथेनॉल की खरीद जारी रहेगी, जिससे चीनी मिलों को ऐसी चीनी का इस्तेमाल किए बिना इथेनॉल बनाने की अनुमति मिल जाएगी जिसे चीनी के रूप में निकाला जा सकता है। हालांकि, इसके साथ ही उद्योग संगठन ने 'डेडिकेटेड इथेनॉल प्लांट्स' (DEPs) को दी जाने वाली प्राथमिकता पर गहरी चिंता जताई है, जिनके पास 'लॉन्ग-टर्म ऑफटेक एग्रीमेंट्स' (LTOAs) मौजूद हैं।

ISMA का यह मानना है कि भले ही यह व्यवस्था केवल 2026-27 के लिए लागू की गई हो, लेकिन यदि इसे आने वाले वर्षों में भी लगातार जारी रखा गया, तो इससे पूरे चीनी उद्योग की वित्तीय स्थिति को गंभीर क्षति पहुंच सकती है। गन्ने का उत्पादन एक निश्चित चक्र (साइकिल) की तरह काम करता है, जिसमें कभी पैदावार बहुत अधिक होती है और कभी कम होती है। जब चीनी का उत्पादन देश की जरूरत से ज्यादा होता है, तो चीनी मिलें इस अतिरिक्त चीनी को खपाने के लिए इसे इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ देती हैं। इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों में होने वाली भारी गिरावट को रोकना होता है।

एसोसिएशन ने चेतावनी दी है कि यदि 'डेडिकेटेड इथेनॉल प्लांट्स' को लगातार प्राथमिकता मिलती रही, तो पारंपरिक चीनी मिलें कमाई के इस बेहद अहम स्रोत से पूरी तरह वंचित हो जाएंगी, फिर चाहे उस दौरान देश में चीनी का उत्पादन जरूरत से ज्यादा क्यों न हुआ हो। ISMA के महानिदेशक दीपक बल्लानी ने इस संबंध में स्पष्ट किया कि केवल इथेनॉल बनाने वाले इन संयंत्रों को लगातार प्राथमिकता देने से न केवल चीनी मिलों की वित्तीय सेहत कमजोर होगी, बल्कि इसका सीधा और बुरा असर गन्ने के किसानों पर भी पड़ेगा। उन्होंने कहा कि इससे उस इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा, जिसे मूल रूप से उद्योग की फाइनेंशियल लिक्विडिटी सुधारने और किसानों को उनके गन्ने के बकाये का समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए शुरू किया गया था।

इसके अलावा, ISMA ने 'सी-हैवी मोलासेस' से बनने वाले इथेनॉल की खरीद कीमत में बढ़ोतरी करने की भी पुरजोर मांग की है। गन्ने की कीमतों और परिचालन लागत—जैसे कि श्रम, ईंधन, रसायन और सरकारी नियमों के पालन का खर्च—में लगातार बढ़ोतरी होने के बावजूद, इथेनॉल की मौजूदा खरीद कीमत लंबे समय से 57.97 रुपये प्रति लीटर पर ही स्थिर बनी हुई है। एसोसिएशन ने सरकार से मांग की है कि इस खरीद कीमत को बढ़ाकर 62.23 रुपये प्रति लीटर किया जाए, जो मौजूदा दर से करीब 4.26 रुपये यानी लगभग 7.3 प्रतिशत की वृद्धि है।

एसोसिएशन ने यह भी मांग उठाई है कि चीनी उद्योग की तरफ से पेश किए जाने वाले 'सी-हैवी मोलासेस' आधारित इथेनॉल की शत-प्रतिशत (100%) मात्रा की खरीद की जानी चाहिए। ISMA के अनुसार, यदि उचित कीमत और पूरी खरीद की पक्की गारंटी मिल जाती है, तो इससे चीनी मिलों को अपनी मौजूदा डिस्टिलरी क्षमता का बेहतर और प्रभावी उपयोग करने में मदद मिलेगी, जिससे वे किसानों के बकाये का भुगतान करने के लिए पर्याप्त फंड जुटा सकेंगी। एसोसिएशन ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि ऐसा नहीं किया गया, तो डिस्टिलरी की बड़ी क्षमता यूं ही बेकार पड़ी रह जाएगी या उसका पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाएगा।

इन तमाम मुद्दों के समाधान के लिए ISMA ने इथेनॉल की कीमतों तय करने के लिए एक नया और पारदर्शी फॉर्मूला भी प्रस्तावित किया है। इस प्रस्तावित फॉर्मूले के तहत इथेनॉल खरीद दरों को गन्ने के 'फेयर एंड रेमुनरेटिव प्राइस' (FRP) के साथ जोड़ा जाना चाहिए, ताकि गन्ने की कीमतें बढ़ने पर इथेनॉल की कीमतें भी स्वतः रूप से एडजस्ट हो सकें। इससे चीनी मिलों और उन्हें कर्ज देने वाले वित्तीय संस्थानों के सामने बनी अनिश्चितता काफी हद तक कम हो जाएगी। अंत में, एसोसिएशन ने सरकार से यह अपील की है कि वह भविष्य के इथेनॉल आपूर्ति वर्षों के लिए बनाए गए 'प्रिफरेंशियल एलोकेशन फ्रेमवर्क' की दोबारा समीक्षा करे। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाए कि जब घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त सप्लाई उपलब्ध हो, तो चीनी मिलों के पास अतिरिक्त चीनी को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने की पूरी छूट और अनुमति होनी चाहिए।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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