सोनम वांगचुक आंदोलन ने बढ़ाई सरकार की चुनौती, जंतर-मंतर से देशभर तक फैला छात्र आक्रोश|
शिक्षा व्यवस्था की खामियों को लेकर जंतर-मंतर पर शुरू हुआ प्रदर्शन कई शहरों में फैल गया है, जिससे केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ गया है।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा व्यवस्था की कमियों और केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए छात्र और पुलिस बल।
सोनम वांगचुक और छात्रों का आंदोलन शिक्षा व्यवस्था की खामियों को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार दबाव बढ़ा रहा है। जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह प्रदर्शन अब देश के कई अन्य शहरों तक फैल चुका है, जिससे राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। हालांकि सोनम वांगचुक ने अपनी मांगों में कुछ बदलाव किया है, लेकिन युवाओं और छात्रों से जुड़े बुनियादी सवालों के चलते इस आंदोलन के आगे भी जारी रहने की पूरी संभावना है।
पिछले तीन दिनों के दौरान केंद्र सरकार ने जंतर-मंतर पर केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और शिक्षा व्यवस्था की कमियों के खिलाफ चल रहे आंदोलन को लेकर जो रणनीति अपनाई है, उससे आने वाले समय में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है। इस पूरे घटनाक्रम की दो मुख्य तस्वीरें लोगों के जेहन में बनी हुई हैं। पहली तस्वीर 23 दिनों से अनशन कर रहे सोनम वांगचुक को 18 जुलाई को सिविल कपड़ों में पुलिस द्वारा जबरन आंदोलन स्थल से हटाए जाने की है। वहीं दूसरी तस्वीर सोमवार को छात्रों और अन्य आंदोलनकारियों की है, जो जंतर-मंतर से संसद भवन की तरफ मार्च करने के लिए जमा हुए थे और बाद में पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज तथा आंसू गैस का इस्तेमाल किया था।
सोमवार को मॉनसून सत्र के पहले दिन प्रदर्शनकारियों के मार्च और दोनों सदनों में विपक्ष द्वारा इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाने की पृष्ठभूमि में गृह मंत्री अमित शाह और धर्मेंद्र प्रधान के बीच हुई मुलाकात इस बात का संकेत है कि छात्रों के इस आंदोलन ने सरकार को कुछ हद तक असहज किया है। दरअसल, धर्मेंद्र प्रधान और शिक्षा व्यवस्था की खामियों के खिलाफ शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन अब दिल्ली तक सीमित न रहकर मुंबई, हैदराबाद और बंगलुरु जैसे प्रमुख शहरों में भी फैल चुका है। इस मुहिम को छात्रों के साथ-साथ उनके अभिभावकों का भी व्यापक समर्थन मिल रहा है।
इस आंदोलन की तुलना ऐतिहासिक अन्ना आंदोलन से भी की जाने लगी है। गत 2 जून को वांगचुक ने CJP के आंदोलन का समर्थन करने की घोषणा करते हुए इसमें शामिल होने की बात कही थी। इसके लगभग अगले दिन से ही उनकी तुलना अन्ना हजारे से की जाने लगी, जिन पर 2011 में यूपीए सरकार के खिलाफ लोकपाल आंदोलन चलाने का आरोप लगता रहा है। अन्ना आंदोलन को यूपीए सरकार के पतन के मुख्य कारणों में से एक माना जाता है। हालांकि कांग्रेस ने वांगचुक को खुलकर समर्थन नहीं दिया है, मगर उनसे अनशन तोड़ने की अपील जरूर की है। वहीं, पार्टी के भीतर एक प्रभावशाली वर्ग लगातार यह आरोप लगा रहा है कि अन्ना आंदोलन की तरह यह मुहिम भी कांग्रेस को कमजोर करने का एक प्रयास है। इस वर्ग का तर्क है कि CJP के अस्तित्व में आने से बहुत पहले से कांग्रेस राज्यों में पेपर लीक और शिक्षा से जुड़े अन्य मुद्दे उठाती रही है और इस पर राहुल गांधी को जनता का अच्छा समर्थन भी मिल रहा है। इस वर्ग का यह भी मानना है कि सरकार ने CJP प्रमुख अभिजीत दीपके को पिछले महीने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की अनुमति लगभग एक आमंत्रण की तरह दी थी।
दूसरी ओर, जहां वांगचुक को आम आदमी पार्टी, टीएमसी, एनसीपी (शरद पवार), समाजवादी पार्टी और वाम दलों का समर्थन प्राप्त है, वहीं कांग्रेस समर्थक इस बात पर जोर दे रहे हैं कि मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित इस शिक्षाविद ने यू-टर्न लिया है। वांगचुक ने अपना अनशन मुख्य रूप से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के साथ शुरू किया था, लेकिन सोमवार को यह मांग सूची में शामिल नहीं थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अनशन तोड़ने के लिए तैयार हैं, बशर्ते सरकार शिक्षा व्यवस्था में अपनी विफलताओं की जिम्मेदारी ले या फिर नेता और सांसद उन्हें यह भरोसा दें कि उनके मुद्दों को संसद के सत्र में प्रमुखता से उठाया जाएगा।
गत दो दिनों में वांगचुक के रुख में नरमी आई है, तो वहीं दीपके ने अपना दो दिन पुराना अनशन सोमवार को समाप्त कर दिया। इसके अलावा, वांगचुक के साथ अनशन पर बैठे तीनों छात्रों—नेहा, मनीष और आमीन—ने भी अपना अनशन खत्म कर दिया है। दीपके के अनशन समाप्त करने के साथ ही आंदोलनकारियों के प्रतिनिधियों के साथ केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने बातचीत शुरू कर दी है। हालांकि दीपके के प्रतिनिधि अभी भी प्रधान के इस्तीफे की मांग पर अड़े हुए हैं। इसके बावजूद, वांगचुक के नरम रुख के बावजूद इस आंदोलन के किसी न किसी रूप में जिंदा रहने की पूरी उम्मीद है, क्योंकि शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दे देश के युवा वर्ग को बड़े पैमाने पर प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि किसी सुनियोजित रणनीति के अभाव के बावजूद समाज की अलग-अलग वैचारिक धाराओं से इसे समर्थन मिल रहा है।
सोमवार को भी प्रदर्शन के दौरान इन विभिन्न धाराओं का अनूठा संगम देखने को मिला। एक तरफ जहां वामपंथी छात्र फैज़ अहमद फैज़ की प्रसिद्ध नज़्म 'हम देखेंगे...' गा रहे थे, वहीं दूसरी तरफ 'भारत माता की जय' और 'जय भीम' जैसे नारे भी गूंज रहे थे। विपक्षी दलों के बीच इस आंदोलन का फायदा उठाने की होड़ सी मची हुई है, चाहे वह राहुल गांधी हों, अरविंद केजरीवाल हों या फिर अखिलेश यादव। यही कारण है कि यह पूरा घटनाक्रम सरकार के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है, क्योंकि सत्तर के दशक के पूर्वार्ध में इंदिरा गांधी के खिलाफ जेपी आंदोलन भी गुजरात के छात्र संघर्ष के रूप में ही शुरू हुआ था, जिसने बाद में विकराल रूप ले लिया था।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
