फटे जूते, दुर्गम रास्ते और नि:स्वार्थ सेवा का वो सफर, जिसने महाराष्ट्र के डॉक्टर दंपति को बस्तर का 'भगवान' बना दिया!
अबूझमाड़ के नक्सल प्रभावित और दुर्गम अंचलों में पैदल घूमकर आदिवासियों को मुफ्त चिकित्सा सेवाएं देने वाले डॉक्टर दंपति को राष्ट्रपति ने किया सम्मानित।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से पद्मश्री पुरस्कार ग्रहण करते छत्तीसगढ़ के डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी पत्नी सुनीता गोडबोले।
छत्तीसगढ़ के सुदूर और संवेदनशील बस्तर संभाग के अबूझमाड़ जैसे अत्यंत दुर्गम क्षेत्रों में पिछले करीब चार दशकों से नि:स्वार्थ भाव से स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचा रहे डॉ. रामचंद्र गोडबोले और उनकी पत्नी सुनीता गोडबोले को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मश्री से अलंकृत किया गया है। राष्ट्रपति भवन में आयोजित गरिमामयी समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इस समर्पित दंपति को संयुक्त रूप से यह सम्मान प्रदान किया। मूल रूप से महाराष्ट्र के सतारा जिले के निवासी डॉ. गोडबोले और उनकी पत्नी ने नब्बे के दशक में बस्तर के आदिवासी समाज की सेवा के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था, जिसे अब राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी पहचान मिली है।
डॉ. रामचंद्र गोडबोले का जन्म वर्ष 1960 में हुआ था और उन्होंने आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में अपनी शिक्षा पूरी की थी। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने लगभग 12 वर्षों तक महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में काम किया, लेकिन उनके मन में सदैव समाज के सबसे पिछड़े और वंचित तबके के लिए कुछ करने की भावना थी। इसी उद्देश्य के साथ वर्ष 1990 में वह अपनी पत्नी सुनीता गोडबोले के साथ छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के बारसूर आ गए। उस दौर में बस्तर संभाग का यह क्षेत्र न केवल बुनियादी सुविधाओं से महरूम था, बल्कि घोर नक्सलवाद के प्रभाव से भी जूझ रहा था। ऐसे विपरीत हालातों में भी इस दंपति ने घने जंगलों के बीच रहने वाले आदिवासियों के इलाज का बीड़ा उठाया।
बारसूर स्थित वनवासी कल्याण आश्रम को अपना केंद्र बनाकर इस दंपति ने अबूझमाड़ के अंदरूनी गांवों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचानी शुरू कीं। यातायात के साधनों के अभाव और भौगोलिक विषमताओं के कारण डॉ. रामचंद्र गोडबोले कई-कई किलोमीटर तक पैदल सफर करके मरीजों तक पहुंचते थे। हार्डकोर नक्सल प्रभावित इलाका होने के बावजूद, उन्होंने बिना किसी डर के ग्रामीणों के बीच जाकर कुष्ठ रोग, टीबी, पीलिया और मलेरिया जैसी गंभीर बीमारियों के खिलाफ न सिर्फ जागरूकता फैलाई, बल्कि उनका सफल इलाज भी किया। स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ यह दंपति स्थानीय ग्रामीणों को शिक्षा और नशामुक्ति के प्रति भी लगातार प्रेरित कर रहा है।
समारोह के दौरान राष्ट्रपति भवन पहुंचे इस बुजुर्ग दंपति की सादगी ने वहां मौजूद सभी लोगों का दिल जीत लिया। दशकों तक बस्तर के जंगलों में खामोशी से मानवता की सेवा करने वाले इस जोड़े की सौम्यता पुरस्कार ग्रहण करते समय साफ झलक रही थी। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इस उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए गोडबोले दंपति को बधाई दी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि बस्तर के जनजातीय अंचलों में नि:स्वार्थ भाव से की गई उनकी सेवा पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गौरव और प्रेरणा का विषय है। राष्ट्रपति द्वारा गोडबोले दंपति को सम्मानित किया जाना जनसेवा, समर्पण और संवेदनशीलता के मूल्यों को मिला एक सच्चा राष्ट्रीय सम्मान है।

Lalita Rajput
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