व्यभिचार के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सजा रद्द करते हुए महाभारत कालीन नियोग प्रथा का किया उल्लेख
जस्टिस विमल कुमार यादव ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक घोषित की जा चुकी आईपीसी की धारा 497 अब सजा का आधार नहीं बन सकती।

दिल्ली हाईकोर्ट ने IPC धारा 497 के तहत व्यभिचार मामले में निचली अदालत की सजा रद्द की।
नई दिल्ली: वैवाहिक संबंधों और आपराधिक न्याय व्यवस्था के बीच के कानूनी ताने-बाने को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कानूनी रूप से दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने एक जटिल मामले की अंतिम सुनवाई करते हुए व्यभिचार (एडल्टरी) के आरोप में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। इस मामले की न्यायिक समीक्षा के दौरान उच्च न्यायालय ने इस पूरे घटनाक्रम की तुलना प्राचीन भारतीय इतिहास और महाभारत काल में प्रचलित 'नियोग प्रथा' के आधुनिक स्वरूप से की। अदालत ने स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि देश की सर्वोच्च अदालत ने वर्षों पहले ही इस दंडात्मक कानून को निरस्त कर दिया था, जिसके चलते अब इसके आधार पर किसी भी नागरिक को सजा की परिधि में नहीं रखा जा सकता है।
न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव की एकल पीठ ने इस विशेष कानूनी अपील पर अपना ऐतिहासिक निर्णय सुरक्षित करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 'जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ' के मील का पत्थर साबित हुए ऐतिहासिक वाद में वर्ष 2018 के भीतर ही भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 497 को पूरी तरह से असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया था। देश की शीर्ष अदालत ने माना था कि विवाह के इतर शारीरिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखने वाला यह विशिष्ट कानूनी प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के तहत देश के नागरिकों को मिलने वाले मौलिक अधिकारों, समानता के सिद्धांत और जीवन के अधिकार का सीधा उल्लंघन करता है। उच्च न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि जब देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था द्वारा किसी दंडात्मक कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया जाता है, तो वह कानून देश के किसी भी नागरिक के लिए आपराधिक अभियोजन या सजा का वैधानिक आधार नहीं बन सकता।
इस आपराधिक मामले के जमीनी तथ्य और अदालती रिकॉर्ड के विवरण भी न्यायिक गलियारों में काफी असामान्य और चौंकाने वाले रहे हैं। उच्च न्यायालय के समक्ष दायर अपील में मुख्य अपीलकर्ता, जो कभी शिकायतकर्ता महिला के घर में एक किराएदार के रूप में रहता था, ने अदालत में यह दावा किया था कि महिला और उसके सगे पति की आपसी सहमति और सामाजिक समन्वय के आधार पर ही उन दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हुए थे। अपीलकर्ता ने अपनी कानूनी रक्षा में यह तर्क प्रस्तुत किया था कि महिला का पति चिकित्सा कारणों से संतानोत्पत्ति करने में पूरी तरह असमर्थ था। इसी चिकित्सकीय विवशता के चलते दंपत्ति ने अपनी पारिवारिक वंश परंपरा को आगे बढ़ाने और महिला को गर्भवती करने के उद्देश्य से उसकी स्वेच्छा से सहायता मांगी थी।
उच्च न्यायालय ने आरोपी के इस विशिष्ट तर्क और मामले की परिस्थितियों का गहराई से संज्ञान लेते हुए कहा कि यह विचित्र स्थिति प्राचीन भारतीय समाज और महाभारत काल की प्रसिद्ध 'नियोग प्रथा' के आधुनिक डिजिटल रूप जैसी ही प्रतीत होती है। प्राचीन सामाजिक व्यवस्था में नियोग प्रथा के अंतर्गत वैधानिक रूप से संतान प्राप्ति के लिए पति की लिखित या मौखिक अनुमति और सहमति से ही किसी अन्य योग्य पुरुष की शारीरिक सहायता ली जाती थी, जिसे तत्कालीन समाज में नैतिक और कानूनी स्वीकार्यता प्राप्त थी।
हालांकि, इस मामले का दूसरा पक्ष बेहद संगीन आरोपों से घिरा हुआ था। सरकारी अभियोजन पक्ष ने निचली अदालत में यह आरोप लगाया था कि आरोपी ने पीड़ित महिला को नशीला 'गाजर का हलवा' खिलाकर उसकी अचेतन अवस्था का लाभ उठाया और उसके साथ बलात्कार जैसी जघन्य वारदात को अंजाम दिया। इसके साथ ही उस पर जबरन वसूली करने का भी आरोप मढ़ा गया था। लेकिन मामले की गहन जांच और साक्ष्यों के मूल्यांकन के बाद निचली ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को बलात्कार और जबरन वसूली के इन गंभीर आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया था। इसके बावजूद, अजीबोगरीब कानूनी समझ दिखाते हुए निचली अदालत ने आरोपी को तत्कालीन धारा 497 (व्यभिचार) के तहत दोषी ठहराते हुए तीन साल के सश्रम कारावास की सजा सुना दी थी।
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस न्यायिक विरोधाभास को दूर करते हुए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि धारा 497 अब देश के आपराधिक कानून का हिस्सा ही नहीं रह गई है। अदालत ने कहा कि जोसेफ शाइन मामले में आए फैसले का प्रभाव कानूनी रूप से पिछली तारीखों से भी पूरी तरह प्रभावी माना जाता है। ऐसे में किसी गैर-कानूनी धारा के तहत दी गई सजा को किसी भी परिस्थिति में बरकरार रखना न्यायसंगत नहीं है। इसी न्यायिक व्याख्या के साथ हाईकोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से ससम्मान बरी करने का आदेश दिया और उसकी पूर्व में तय की गई जमानत संबंधी सभी पाबंदियों को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया। यह निर्णय देश की निचली अदालतों के लिए एक कड़ा संदेश है कि वे बदलते विधायी ढांचे और सर्वोच्च अदालत के निर्णयों के अनुरूप ही न्यायदान की प्रक्रिया सुनिश्चित करें।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
