दिल्ली की राजनीति में भूचाल: AAP की मान्यता रद्द करने की मांग! कोर्ट रूम से आई खबर ने उड़ाई नेताओं की नींद|
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग से आम आदमी पार्टी का पंजीकरण रद्द करने और नेताओं को अयोग्य ठहराने की अपील की गई।

नई दिल्ली में स्थित दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर सुरक्षा प्रबंधों के बीच आवाजाही करते लोग।
राजधानी दिल्ली के सियासी और कानूनी गलियारों में एक बार फिर गंभीर वैधानिक टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। दिल्ली आबकारी नीति मामले से उपजे अंतहीन विवादों के बीच अब देश की एक प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी के रूप में स्थापित आम आदमी पार्टी की वैधानिक मान्यता को समाप्त करने की सीधी मांग देश की शीर्ष अदालत की चौखट तक पहुंच गई है। दिल्ली उच्च न्यायालय में दायर एक नई जनहित याचिका के माध्यम से न केवल पार्टी के पंजीकरण को रद्द करने की गुहार लगाई गई है, बल्कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी भविष्य में किसी भी प्रकार का चुनाव लड़ने से रोकने के लिए अयोग्य ठहराने की मांग की गई है। इस अप्रत्याशित वैधानिक कदम ने दिल्ली की चुनी हुई सरकार और विपक्षी खेमों के बीच जारी राजनीतिक खींचतान को एक अत्यंत जटिल और अभूतपूर्व कानूनी मोड़ दे दिया है, जिसकी गूंज केंद्रीय चुनाव आयोग तक सुनाई देने लगी है।
यह संपूर्ण वैधानिक विवाद दिल्ली आबकारी नीति मामले की न्यायिक सुनवाइयों और उससे जुड़ी अदालती प्रक्रियाओं के दौरान पार्टी नेताओं के कथित आचरण से गहराई से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता सतीश कुमार अग्रवाल ने दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल कर आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया तथा पार्टी पदाधिकारी दुर्गेश पाठक को मुख्य पक्षकार बनाया है। याचिका में अत्यंत गंभीर आरोप लगाते हुए कहा गया है कि इन पार्टी नेताओं ने दिल्ली उच्च न्यायालय की माननीय न्यायाधीश न्यायमूर्ति स्वर्णा कांता शर्मा की अदालत की कार्यवाही में शामिल होने से जानबूझकर इनकार किया और इसके समानांतर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सुनियोजित तरीके से न्यायपालिका और अदालत की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया।
कानूनी प्रावधानों के तहत याचिकाकर्ता ने यह तर्क प्रस्तुत किया है कि आम आदमी पार्टी के इन शीर्ष नेताओं का ऐसा व्यवहार सीधे तौर पर देश की उच्च न्यायपालिका के अधिकार, गरिमा और संप्रभुता को कम करने का एक जानबूझकर किया गया कृत्य है। याचिका के मुख्य मसौदे के अनुसार, यह कथित आचरण लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A के तहत भारत में पंजीकृत सभी राजनीतिक दलों के लिए निर्धारित अनिवार्य उत्तरदायित्वों और संवैधानिक प्रतिबद्धताओं का स्पष्ट और गंभीर उल्लंघन माना जाना चाहिए। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने दिल्ली उच्च न्यायालय से हस्तक्षेप करने और भारत के चुनाव आयोग को यह निर्देश जारी करने की मांग की है कि वह तत्काल प्रभाव से आम आदमी पार्टी की मान्यता को निरस्त करे और संबंधित नेताओं को चुनावी प्रक्रिया से बाहर करे।
भारतीय लोकतांत्रिक और वैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत किसी भी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या क्षेत्रीय राजनीतिक दल के पंजीकरण को रद्द करना एक अत्यंत दुर्लभ, संवेदनशील और जटिल प्रक्रिया होती है। यद्यपि भारत के मुख्य चुनाव आयोग के पास कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में राजनीतिक दलों के पंजीकरण और उनके चुनाव चिन्ह को फ्रीज या रद्द करने की निहित शक्तियां प्राप्त हैं, परंतु पूर्व के न्यायिक उदाहरणों को देखते हुए इस अधिकार का प्रयोग केवल असाधारण और अकाट्य आधार होने पर ही किया जाता है। विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, किसी राजनीतिक दल पर केवल अवमानना या आचरण से जुड़े आरोप लग जाना ही उसकी मान्यता समाप्त करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता, बल्कि इसके लिए देश के खिलाफ गंभीर संवैधानिक धोखाधड़ी या देश की संप्रभुता को सीधे तौर पर आघात पहुंचाने जैसे गंभीर संवैधानिक उल्लंघनों का अदालत में प्रमाणित होना वैधानिक रूप से अनिवार्य है।
इस जनहित याचिका के दाखिल होने मात्र से ही आम आदमी पार्टी के नेताओं की वर्तमान विधायी सदस्यता या उनके भविष्य में चुनाव लड़ने के मौलिक अधिकार पर तुरंत कोई तात्कालिक प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके लिए देश में एक बेहद लंबी और गहन अदालती प्रक्रिया निर्धारित है, जिसमें प्राथमिक स्तर पर अदालत को इन आरोपों में एक सुदृढ़ और गंभीर कानूनी आधार दिखाई देना आवश्यक होता है। याचिका में मुख्य रूप से यह मांग उठाई गई है कि आम आदमी पार्टी के नेताओं द्वारा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29A(5) के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन किया गया है या नहीं, इसकी चुनाव आयोग द्वारा विस्तृत और गहन जांच कराई जानी चाहिए। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की यह विशिष्ट धारा किसी भी राजनीतिक दल को भारत के संविधान, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के सिद्धांतों के प्रति वफादार रहने की शर्त पर ही राजनीतिक पंजीकरण प्रदान करती है।
इस समूचे वैधानिक मामले में भारतीय न्याय संहिता, 2023 के नए प्रावधानों का संदर्भ भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 169 चुनाव और निर्वाचन से संबंधित विशेष अध्याय का एक अभिन्न हिस्सा है, जो मुख्य रूप से देश की चुनावी प्रक्रियाओं को विनियमित करने के लिए उम्मीदवार और चुनावी अधिकार जैसे तकनीकी शब्दों को कानूनी रूप से परिभाषित करती है। इसके साथ ही, नई संहिता की धारा 171 चुनावों के दौरान किसी भी अनुचित प्रभाव को डालने या मतदाताओं के स्वतंत्र और निष्पक्ष अधिकारों की रक्षा करने से संबंधित अपराधों को स्पष्ट करती है। यदि दिल्ली उच्च न्यायालय इस जनहित याचिका को स्वीकार करते हुए इस पर नियमित सुनवाई की प्रक्रिया को आगे बढ़ाता है, तो यह कानूनी लड़ाई आगामी महीनों में भारतीय राजनीति के केंद्र बिंदु में आ जाएगी, जिससे आबकारी नीति मामले की कानूनी गुत्थी और अधिक उलझने की आशंका बनी हुई है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
