दिल्ली सरकार द्वारा पीपीएसी दरों में की गई बढ़ोतरी के कारण उद्यमियों पर वित्तीय बोझ बढ़ा, जिससे फैक्ट्रियों को उत्तर प्रदेश और हरियाणा स्थानांतरित करने की चेतावनी दी गई।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्रों पर एक नया आर्थिक संकट मंडराने लगा है। दिल्ली सरकार द्वारा बिजली के बिलों में पावर परचेज एडजस्टमेंट कॉस्ट यानी पीपीएसी (PPAC) दरों में की गई हालिया बढ़ोतरी ने स्थानीय व्यापारियों, दुकानदारों और फैक्ट्री मालिकों की चिंताओं को अत्यधिक बढ़ा दिया है। इस नियामक बदलाव के कारण न केवल घरेलू उपभोक्ताओं की जेब पर असर पड़ेगा, बल्कि दिल्ली के औद्योगिक विकास की रफ्तार भी धीमी होने की आशंका है। राजधानी के कई प्रमुख व्यापारिक संगठनों का दावा है कि यदि उत्पादन लागत में इसी तरह वृद्धि होती रही, तो दिल्ली की सैकड़ों विनिर्माण इकाइयां पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश और हरियाणा की ओर रुख करने पर मजबूर हो जाएंगी।

इस गंभीर विषय को लेकर व्यापारियों की शीर्ष संस्था चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) ने नव नियुक्त मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को एक औपचारिक पत्र भेजकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन के चेयरमैन बृजेश गोयल ने स्पष्ट किया है कि दिल्ली में कमर्शियल और इंडस्ट्रियल श्रेणी के उपभोक्ताओं के लिए बिजली की दरें पहले से ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अन्य राज्यों की तुलना में काफी ऊंची बनी हुई हैं। अब इस अतिरिक्त नियामक कर के जुड़ जाने से दिल्ली के भीतर उत्पादन की कुल लागत इतनी बढ़ जाएगी कि बाजार में प्रतिस्पर्धी बने रहना कठिन हो जाएगा। दिल्ली की तुलना में उत्तर प्रदेश और हरियाणा में न केवल बिजली सस्ती है, बल्कि वहां न्यूनतम मजदूरी की दरें भी कम होने के कारण उद्यमियों को विनिर्माण में भारी वित्तीय राहत मिलती है।

औद्योगिक संगठनों का यह भी तर्क है कि दिल्ली सरकार द्वारा आवासीय क्षेत्रों में दी जाने वाली बिजली सब्सिडी का लाभ व्यावसायिक और औद्योगिक इकाइयों को नहीं मिलता है। सब्सिडी के अभाव में ये नई दरें सीधे तौर पर उत्पादन की लागत को प्रभावित करेंगी, जिससे अंततः बाजार में आवश्यक वस्तुओं के दाम बढ़ने की पूरी संभावना है। विनिर्माण इकाइयों के दिल्ली से बाहर स्थानांतरित होने की स्थिति में राजधानी को बड़े पैमाने पर राजस्व का नुकसान उठाना पड़ सकता है और साथ ही स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों में भी भारी गिरावट आ सकती है। नई दरें जून के महीने से प्रभावी की जा चुकी हैं, जिसका सीधा प्रभाव अगले महीने आने वाले बिलों पर दिखाई देगा।

दूसरी ओर, सरकार ने इस कदम को नियमों के तहत एक आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रिया बताया है। दिल्ली के ऊर्जा मंत्री आशीष सूद ने स्पष्ट किया है कि पावर परचेज एडजस्टमेंट कॉस्ट कोई नया कर या अप्रत्याशित अधिभार नहीं है, बल्कि यह केंद्रीय बिजली कानूनों के तहत एक स्थापित और कानूनी नियामक प्रावधान है। इसके माध्यम से बिजली वितरण कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईंधन और बिजली खरीद की लागत में होने वाले उतार-चढ़ाव को संतुलित करती हैं। ऊर्जा मंत्री के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक संकट और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आए व्यवधानों के कारण पिछले एक महीने के भीतर बिजली खरीद की लागत में लगभग इकतीस प्रतिशत की अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है, जिसे समायोजित करना कंपनियों के लिए अनिवार्य हो गया था।

विद्युत नियामक व्यवस्था के अंतर्गत दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (DERC) ने इस पूरी स्थिति की समीक्षा करने के बाद औसतन केवल दो दशमलव चार प्रतिशत पीपीएसी बढ़ोतरी को ही अपनी मंजूरी प्रदान की है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इससे पहले पीपीएसी की ऊपरी सीमा साढे चौदह प्रतिशत निर्धारित थी, जिसे अब संशोधित कर सत्रह दशमलव पांच से सत्रह दशमलव नौ प्रतिशत के दायरे में लाया गया है। प्रशासनिक अधिकारियों का दावा है कि यह नीतिगत निर्णय बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिरता बनाए रखने और आम उपभोक्ताओं के दीर्घकालिक हितों के बीच एक उचित संतुलन स्थापित करने के उद्देश्य से लिया गया है, ताकि राजधानी की विद्युत आपूर्ति व्यवस्था निर्बाध रूप से कार्य करती रहे।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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