नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में लगातार बढ़ती महंगाई और सीएनजी (CNG) की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि के खिलाफ परिवहन ऑपरेटरों ने मोर्चा खोल दिया है। विभिन्न ऑटो, टैक्सी और कमर्शियल वाहन यूनियनों के आह्वान पर आज से तीन दिवसीय राष्ट्रव्यापी सांकेतिक हड़ताल और 'चक्का जाम' की शुरुआत हो गई है। परिवहन चालकों की मुख्य मांग है कि ईंधन की आसमान छूती कीमतों के अनुपात में उनके किराए को तत्काल संशोधित किया जाए। इस तीन दिवसीय आंदोलन के कारण दिल्ली-एनसीआर में दैनिक यात्रियों को आवागमन में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि कमर्शियल वाहनों के पहिए थमने से आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने की गंभीर आशंका पैदा हो गई है।

परिवहन क्षेत्र में उपजे इस असंतोष की मुख्य वजह पिछले कुछ समय में सीएनजी की कीमतों में हुई लगातार बढ़ोतरी है। हड़ताल का नेतृत्व कर रही 'चालक शक्ति यूनियन' के पदाधिकारियों का आरोप है कि सिटी टैक्सी स्कीम के तहत दिल्ली-एनसीआर में चलने वाली लगभग 70 हजार टैक्सियों के किराए में पिछले 15 वर्षों से कोई सकारात्मक सुधार या संशोधन नहीं किया गया है। ईंधन के दाम दोगुने से अधिक हो जाने के बावजूद पुराना किराया ढांचा लागू रहने से चालकों के सामने अपनी आजीविका चलाने का संकट खड़ा हो गया है। ओला और उबर जैसी प्रमुख ऐप-आधारित कैब सेवाओं से जुड़े संगठनों ने भी इस हड़ताल को अपना पूर्ण समर्थन देते हुए सभी ड्राइवरों से सड़कों पर गाड़ियां न निकालने और परिवहन कार्य पूरी तरह ठप रखने की अपील की है।

हालांकि, इस व्यापक आंदोलन के बीच दिल्ली की विभिन्न ऑटो-टैक्सी यूनियनों में रणनीतिक मतभेद भी खुलकर सामने आ गए हैं। 'दिल्ली ऑटो रिक्शा संघ' सहित चार से पांच अन्य प्रमुख यूनियनों ने खुद को इस तीन दिवसीय हड़ताल से पूरी तरह अलग रखा है। संघ के प्रतिनिधियों का कहना है कि वे किराए में बढ़ोतरी की मांग का पुरजोर समर्थन करते हैं, लेकिन वर्तमान समय में हड़ताल पर जाना आम जनता के लिए अनुचित होगा। इन यूनियनों ने सरकार के समक्ष अपनी मांगों का एक औपचारिक मसौदा प्रस्तुत किया है और प्रशासनिक स्तर पर किसी सकारात्मक निर्णय का इंतजार करने की नीति अपनाई है। यूनियनों के इस विभाजन के कारण दिल्ली के कुछ हिस्सों में ऑटो-टैक्सी सामान्य रूप से संचालित हो रहे हैं, जिससे हड़ताल का मिलाजुला असर देखने को मिल रहा है।

इस परिवहन संकट का दूसरा और अधिक चिंताजनक पहलू कमर्शियल और भारी वाहनों का चक्का जाम है। ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस और यूनाइटेड फ्रंट ऑफ ऑल ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस विरोध प्रदर्शन में दिल्ली में पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ECC) में की गई वृद्धि का कड़ा विरोध किया जा रहा है। ट्रांसपोर्टर्स का दावा है कि इस सांकेतिक हड़ताल को 68 से अधिक छोटी-बड़ी एसोसिएशनों का समर्थन प्राप्त है। केंद्र सरकार के प्रशासनिक अधिकारियों और ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्षों के बीच हुई उच्च स्तरीय वार्ता बेनतीजा रहने के बाद कमर्शियल वाहनों के प्रवेश को पूरी तरह प्रतिबंधित करने का प्रयास किया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप राजधानी की थोक मंडियों में फल, सब्जी और अन्य आवश्यक उपभोग्य सामग्रियों की आपूर्ति ठप होने का खतरा मंडराने लगा है।

प्रशासनिक और कानूनी धरातल पर दिल्ली सरकार और पुलिस विभाग स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। दिल्ली पुलिस ने प्रमुख चौराहों और रेलवे स्टेशनों के बाहर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है ताकि हड़ताल में शामिल न होने वाले चालकों को परेशान न किया जा सके। आपातकालीन सेवाओं, विशेषकर अस्पतालों और चिकित्सा केंद्रों के आसपास के क्षेत्रों को इस हड़ताल से मुक्त रखने का प्रयास किया गया है, जिसके चलते एम्स अस्पताल के बाहर दवाइयों की दुकानें और आपातकालीन परिवहन के कुछ साधन सुचारू रूप से कार्य कर रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह हड़ताल अनिश्चितकालीन रूप लेती है, तो आवश्यक सेवा अनुरक्षण अधिनियम (ESMA) जैसे कड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा सकती है। फिलहाल, यह आंदोलन आर्थिक दबाव और नीतिगत प्राथमिकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रशासनिक चुनौती को रेखांकित करता है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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