भारतीय सिनेमा के 'भीष्म पितामह' दादासाहब फाल्के: एक ऐसा जुनून जिसने हिंदुस्तान को सपने देखना सिखाया
भारतीय सिनेमा के जनक दादासाहब फाल्के की 82वीं पुण्यतिथि। जानें कैसे एक व्यक्ति के जुनून ने बॉलीवुड की नींव रखी और कैसे 'राजा हरिश्चंद्र' ने भारतीय फिल्मों का इतिहास बदल दिया।

आज 16 फरवरी 2026 है और आज का दिन भारतीय कला और संस्कृति के इतिहास में एक भावुक कर देने वाला पड़ाव है। आज पूरा देश भारतीय सिनेमा के जनक, धुंडीराज गोविंद फाल्के, जिन्हें हम प्यार और सम्मान से 'दादासाहब फाल्के' कहते हैं, उनकी 82वीं पुण्यतिथि पर उन्हें याद कर रहा है।
अक्सर जब हम आज की भव्य फिल्में, वीएफएक्स (VFX) और सिनेमाघरों की चकाचौंध देखते हैं, तो हम भूल जाते हैं कि इस विशाल वटवृक्ष का बीज एक ऐसे व्यक्ति ने बोया था, जिसके पास शुरुआत में न तो पैसा था और न ही कोई कैमरा। आज देश के बड़े नेताओं, जैसे असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके साहस को नमन किया है।
एक जिद, एक सपना और पहली फिल्म
दादासाहब फाल्के का जन्म 1870 में हुआ था। उनकी कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। साल 1913 की बात है, जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था और मनोरंजन के नाम पर केवल नाटक या लोक कलाएं हुआ करती थीं। उस दौर में दादासाहब ने 'चलचित्र' यानी सिनेमा का सपना देखा।
उन्होंने साल 1913 में भारत की पहली फुल-लेंथ फीचर फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनाई। सोचिए, उस समय कैमरा खरीदना कितना मुश्किल रहा होगा। औपनिवेशिक शासन (Colonial rule) के दौरान लोग उनके इस विचार पर हंसते थे। लेकिन दादासाहब का जुनून इतना बड़ा था कि उन्होंने एक कैमरा खरीदने के लिए अपनी पत्नी के गहने तक बेच दिए। उनकी पत्नी, सरस्वती बाई ने भी इस संघर्ष में उनका पूरा साथ दिया—फिल्म की रील धोने से लेकर कलाकारों के लिए खाना बनाने तक, उन्होंने पर्दे के पीछे अहम भूमिका निभाई।
पौराणिक कथाओं को मिला पर्दा
जब 'राजा हरिश्चंद्र' मुंबई के सिनेमाघरों में लगी, तो भीड़ उमड़ पड़ी। लोग हैरान थे कि पर्दे पर मूर्तियां चल-फिर कैसे रही हैं। दादासाहब ने अपनी फिल्मों के लिए भारतीय पौराणिक कथाओं (Indian Mythology) को चुना। उन्हें पता था कि भारत की आत्मा अपनी कहानियों में बसती है।
अपने पूरे करियर में उन्होंने लगभग 95 फीचर फिल्में और 27 शॉर्ट फिल्में बनाईं। 'मोहिनी भस्मासुर', 'सत्यवान सावित्री' और 'लंका दहन' जैसी उनकी फिल्मों ने न केवल बॉलीवुड की नींव रखी, बल्कि क्षेत्रीय फिल्म उद्योगों को भी प्रेरित किया। उन्होंने दिखाया कि बिना आवाज (Silent Era) के भी भावनाओं को दर्शकों तक कैसे पहुँचाया जा सकता है।
आज के दौर में दादासाहब की प्रासंगिकता
आज के डिजिटल युग में, जहाँ फिल्में करोड़ों के बजट में बनती हैं, दादासाहब फाल्के की विरासत हमें 'दृढ़ संकल्प' की सीख देती है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने ट्वीट कर कहा कि, "दादासाहब की दृष्टि ने पीढ़ियों को प्रेरित किया है।" वहीं, देवेंद्र फडणवीस ने उन्हें महाराष्ट्र का गौरव बताते हुए कहा कि उनके साहस ने ही आज भारतीय सिनेमा को दुनिया के नक्शे पर सबसे बड़ा बनाया है।
भारत सरकार ने उनके सम्मान में सिनेमा का सर्वोच्च पुरस्कार 'दादासाहब फाल्के पुरस्कार' शुरू किया, जो आज हर फिल्मकार का सबसे बड़ा सपना होता है।
सदा अमर रहेंगे दादासाहब
दादासाहब फाल्के केवल एक निर्देशक नहीं थे; वे एक क्रांतिकारी थे। उन्होंने उस समय सिनेमा की कल्पना की जब तकनीक नाममात्र की थी। आज भारतीय फिल्म उद्योग दुनिया में सबसे अधिक फिल्में बनाने वाला उद्योग है, और इसकी हर सफलता में दादासाहब के उस पुराने कैमरे की गूँज शामिल है।
उनकी 82वीं पुण्यतिथि पर हम बस यही कह सकते हैं कि जब तक सिनेमा का पर्दा रहेगा, धुंडीराज गोविंद फाल्के का नाम सूरज की तरह चमकता रहेगा। उन्होंने हमें सिखाया कि अगर सपना सच्चा हो, तो अपनी जमा-पूंजी दांव पर लगाकर भी उसे पूरा किया जा सकता है।

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