देश के युवा अब खुद को कहने लगे 'कॉकरोच', सोशल मीडिया पर 22 मिलियन की डिजिटल सेना खड़ी कर दी सीधी चुनौती
बेरोजगारी और महंगाई से नाराज जेन-जी युवाओं ने कॉकरोच जनता पार्टी के जरिए पारंपरिक राजनीति को दी चुनौती|

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कॉकरोच जनता पार्टी के डिजिटल लोगो और समर्थकों के प्रदर्शन को दर्शाता एक रेखाचित्र।
भारत के डिजिटल और राजनीतिक परिदृश्य में एक अप्रत्याशित और तीव्र लहर ने दस्तक दी है, जिसने देश के स्थापित राजनीतिक दलों और रणनीतिकारों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। देश का युवा वर्ग, जिसे आधुनिक शब्दावली में 'जेन-जी' (GenZ) कहा जाता है, अपनी आर्थिक और सामाजिक कसमसाहट को व्यक्त करने के लिए एक अनूठे और प्रतीकात्मक आंदोलन के रूप में एकजुट हो रहा है। सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के रूप में उभरी यह डिजिटल सुनामी केवल एक हफ़्ते के भीतर देश की स्थापित व्यवस्था के खिलाफ युवाओं के गहरे असंतोष का जीवंत प्रतीक बन गई है। इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर करोड़ों की संख्या में फॉलोअर्स जुटाने वाली यह मुहिम अब महज एक मीम या इंटरनेट ट्रेंड नहीं रह गई है, बल्कि यह पारंपरिक राजनीति के तौर-तरीकों को सीधी चुनौती देने वाली एक संगठित डिजिटल आवाज का रूप अख्तियार कर चुकी है।
इस अभूतपूर्व डिजिटल आंदोलन की शुरुआत देश की सर्वोच्च अदालत के एक शीर्ष स्तर से आए घटनाक्रम से जुड़ी है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सूर्यकांत द्वारा 15 मई को एक अदालती मामले की सुनवाई के दौरान की गई एक विशिष्ट टिप्पणी के बाद इंटरनेट मीडिया पर प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हुआ था। यद्यपि अगले ही दिन इस संदर्भ में आधिकारिक स्पष्टीकरण भी सामने आ गया था, लेकिन बेरोजगारी, महंगाई और लचर शिक्षा व्यवस्था से जूझ रहे युवाओं के बीच इस विषय ने एक अलग ही चिंगारी सुलगने का काम किया। बोस्टन में शिक्षा प्राप्त कर रहे 30 वर्षीय भारतीय मूल के युवा अभिजीत दीपके ने इस स्थिति को एक वैचारिक मंच दिया और 'कॉकरोच जनता पार्टी' की नींव रख दी। देखते ही देखते यह अभियान देश के लाखों युवाओं के दिलों में व्यवस्था परिवर्तन की एक बड़ी आग के रूप में तब्दील हो गया।
इस नवगठित आभासी दल की डिजिटल ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसने सक्रिय होने के मात्र सात दिनों के भीतर इंस्टाग्राम पर 22 मिलियन (2.2 करोड़) से अधिक फॉलोअर्स की संख्या पार कर ली है। यह संख्यात्मक आंकड़ा भारत के दो सबसे बड़े मुख्यधारा के राजनीतिक दलों—भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आधिकारिक सोशल मीडिया फॉलोअर्स की संख्या से भी अधिक है। स्वाभाविक रूप से, इस तीव्र और अनियंत्रित वृद्धि ने पारंपरिक राजनीतिक गलियारों में भारी बेचैनी पैदा कर दी है। इंटरनेट पर इस आंदोलन को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है, जहां एक ओर सत्तापक्ष के समर्थक इसे विदेशी धरती से संचालित होने वाला एक सुनियोजित 'टूलकिट' बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई राजनीतिक विश्लेषक और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर इसे मुख्यधारा की राजनीति की ही किसी अंदरूनी 'बी-टीम' के रूप में विश्लेषित करने का प्रयास कर रहे हैं।
इस आंदोलन को दबाने या इसके विस्तार को रोकने के लिए डिजिटल स्तर पर भी कई प्रशासनिक और तकनीकी प्रयास किए जा चुके हैं। संस्थापक अभिजीत दीपके का आरोप है कि 'कॉकरोच जनता पार्टी' का मुख्य ट्विटर (एक्स) अकाउंट निलंबित किया जा चुका है, उनकी मूल वेबसाइट को ब्लॉक कर दिया गया था और यहां तक कि उनके इंस्टाग्राम पेज को भी हैक करने की कोशिश की गई। इसके बावजूद, इस मुहिम की लोकप्रियता पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा और इसके नए डिजिटल खातों से अल्पावधि में ही लाखों की संख्या में नए समर्थक जुड़ते चले गए। आलोचकों का तर्क है कि दीपके का अतीत आम आदमी पार्टी से जुड़ा रहा है, जिसके कारण इस आंदोलन की तटस्थता पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं, परंतु धरातल पर युवाओं का जुड़ाव किसी पार्टी विशेष से इतर व्यवस्था के प्रति उनके गहरे आक्रोश को दर्शाता है।
युवाओं के इस असाधारण गुस्से के पीछे देश के भीतर लंबे समय से जमा हो रहे कई आर्थिक और सामाजिक कारण उत्तरदायी हैं। देश का शिक्षित कार्यबल एक लंबे अरसे से व्यापक बेरोजगारी, कमरतोड़ महंगाई, महंगी और निजीकृत होती शिक्षा व्यवस्था तथा बदहाल सरकारी स्वास्थ्य ढांचे जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रहा है। हाल ही में राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली नीट (NEET) परीक्षा के पेपर लीक होने और उसके बाद परीक्षा को निरस्त किए जाने जैसी घटनाओं ने युवाओं के धैर्य का बांध तोड़ दिया। ऐसे नाजुक समय में आई इस विशिष्ट टिप्पणी ने बारूद के ढेर में घी डालने का काम किया। इस आंदोलन के समर्थकों का तर्क है कि जिस प्रकार दीमक पूरे तंत्र को खोखला कर देती है, उसी तरह कॉकरोच के रूप में देश का युवा इस भ्रष्ट व्यवस्था की दीमक को साफ करने का काम करेगा।
इस पूरे विवाद का एक अत्यंत महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय और नीतिगत पहलू भी है। वर्तमान में भारत की औसत आयु लगभग 27 वर्ष है, जो इसे वैश्विक स्तर पर सबसे युवा देशों की श्रेणी में खड़ा करती है, जबकि इसके विपरीत चीन की औसत आयु 42 वर्ष और अमेरिका की 40 वर्ष है। इसके बावजूद, देश के नीति-निर्धारण और विधायी निकायों में युवाओं का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में नगण्य है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की हालिया रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि मौजूदा केंद्रीय मंत्रिपरिषद में केवल 24 प्रतिशत मंत्री ही 31 से 50 वर्ष की आयु सीमा के अंतर्गत आते हैं, जिसका अर्थ है कि तीन-चौथाई से अधिक नीति-निर्माता 50 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं। भारत जैसे गतिशील देश में जहां संचार क्रांति और सोशल मीडिया ने सूचना के प्रवाह को बदल दिया है, वहां युवाओं की राजनीतिक हिस्सेदारी को नजरअंदाज करना आत्मघाती साबित हो सकता है।
इस डिजिटल मुहिम के अंतर्गत प्रस्तुत किए गए वैचारिक और नीतिगत बिंदु भले ही व्यावहारिक रूप से असंभव प्रतीत होते हों, लेकिन वे बेहद क्रांतिकारी हैं और इसी कारण युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, इनके घोषणापत्र में यह प्रस्ताव शामिल है कि दल बदलने वाले किसी भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को अगले 20 वर्षों के लिए चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए, या किसी वैध मतदाता का नाम मतदाता सूची से जानबूझकर हटाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के खिलाफ सख्त यूएपीए (UAPA) कानून के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दक्षिण एशियाई पड़ोसियों जैसे नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका में आए अप्रत्याशित और उग्र राजनीतिक बदलावों के पीछे भी इसी तरह का युवा आक्रोश था। अतः, भारत की मुख्यधारा की राजनीति को इस नवोदित डिजिटल आंदोलन की गहराई और युवाओं के अंतर्निहित संदेश को समय रहते गंभीरता से समझने की नितांत आवश्यकता है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
