दिल्ली हाई कोर्ट में बुधवार को कॉकरोच जनता पार्टी के दो नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से पूछे गए तीखे और कड़े सवालों के बाद दोनों नेताओं की ओर से यह याचिका वापस ले ली गई। इस पूरे मामले की सुनवाई जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ कर रही थी। सुनवाई के दौरान नेताओं के जंतर-मंतर पर दोबारा प्रदर्शन करने, जमानत बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन और सीधे हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करने के कानूनी रास्ते पर कई गंभीर सवाल उठाए गए। अदालत में सीजेपी नेताओं की तरफ से एडवोकेट अभिक चिमनी ने पक्ष रखा, जबकि दिल्ली पुलिस की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने दलीलें पेश कीं।

अदालत ने सुनवाई के दौरान मामले से जुड़े घटनाक्रम का सिलसिलेवार तरीके से जिक्र किया। कोर्ट ने कहा कि 10 अक्टूबर को प्रदर्शन हुआ था और इसके बाद 11 अक्टूबर को जमानत बॉन्ड स्वीकार किए गए थे। इसके बावजूद जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में डीनोटिफाई किए जाने के बाद भी ये नेता वहां पहुंचे। पीठ ने इस बात पर सवाल खड़ा किया कि जब जंतर-मंतर को डीनोटिफाई करने की इस अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी थी और उस पर कोई रोक नहीं लगी थी, तो फिर नेता दोबारा वहां क्यों गए। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति खुद बॉन्ड भर कर देता है और फिर उसका उल्लंघन करता है, तो ऐसी स्थिति में अधिकारियों द्वारा जमानतदार पर जोर देने की कार्रवाई को गैरकानूनी कैसे कहा जा सकता है। कोर्ट ने इस बिंदु पर विस्तृत सुनवाई करने की बात कही।

सुनवाई के दौरान कोर्ट में दोनों याचिकाकर्ताओं की उम्र को लेकर भी चर्चा हुई। जब अदालत ने सौरव दास और आशुतोष रांका की उम्र पूछी, तो उनके वकील ने बताया कि सौरव दास की उम्र 27 साल है और आशुतोष रांका की उम्र 32 साल है। इस जानकारी पर जस्टिस प्रसाद ने पूछा कि क्या वे जेन-जी हैं और जेन-जी असल में किसे कहा जाता है। अदालत को जब यह जानकारी दी गई कि वर्ष 1997 के बाद जन्मे लोगों को आमतौर पर जेन-जी कहा जाता है, तो इस पर जज ने टिप्पणी करते हुए कहा कि तब आप जेन-जी नहीं हैं।

पीठ ने प्रदर्शन के उद्देश्य और संगठन की भूमिका को लेकर भी अहम सवाल उठाए। जस्टिस प्रसाद ने कहा कि जुलाई के महीने में छात्र प्रदर्शन हुआ था, लेकिन अब मुद्दा पूरी तरह बदल गया है। उन्होंने कहा कि लोग वही हैं, लेकिन प्रदर्शन की वजह बदल रही है। ऐसे माहौल में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि प्रदर्शनकारी कौन हैं, वे क्या काम करते हैं, किस संगठन से जुड़े हैं और उस संगठन का मूल उद्देश्य क्या है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब क्षेत्र में शांति और कानून-व्यवस्था भंग होने की आशंका पैदा होती है, तब इन सभी सवालों का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता है। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि बैरिकेड तोड़े जाने जैसी स्थिति में दूसरे लोगों के द्वारा भी सरकारी प्रतिबंधों का उल्लंघन करने की आशंका बनी रहती है।

हिरासत और जमानतदारों को खारिज किए जाने के फैसले को लेकर सीजेपी नेताओं के वकील अभिक चिमनी ने अपनी दलीलें रखीं। उन्होंने 19 अक्टूबर के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि उसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि भविष्य में तत्काल खतरे की आशंका के लिए कौन-सी नई सामग्री या तथ्य सामने आए थे। वकील ने हिरासत बढ़ाने की इस पूरी कार्रवाई को मनमाना बताया। इस पर कोर्ट ने सवाल किया कि जब आदेश को चुनौती देने के लिए रिवीजन का एक वैकल्पिक कानूनी रास्ता पहले से उपलब्ध है, तो याचिकाकर्ता सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट क्यों चले आए। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि किसी याचिका का सुनवाई योग्य होना और अदालत द्वारा उसे उसी समय सुनना, ये दो अलग-अलग बातें हैं।

जस्टिस प्रसाद ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन जब कानून के तहत वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हों, तो उन पर भी विचार किया जाना चाहिए। कोर्ट ने प्रक्रियात्मक अंतर को समझाते हुए कहा कि अपील की स्थिति में अदालत मामले के तथ्यों और उनके आकलन की समीक्षा कर सकती है, जबकि रिट याचिका के दौरान मुख्य रूप से निर्णय लेने की प्रक्रिया की ही जांच की जाती है। सुनवाई के अंत में कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को सलाह दी कि वे पहले संबंधित निचली कार्यवाही का नतीजा देखें और उसके बाद ही उपलब्ध कानूनी उपायों को अपनाने पर विचार करें। इस पर याचिकाकर्ता के वकील ने यह आशंका व्यक्त की कि यदि जमानतदारों को दोबारा खारिज कर दिया गया तो उन्हें फिर से अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि जमानतदारों को लेकर उनकी आपत्ति पूरी तरह से कानूनी आधार पर टिकी हुई है।

इस पूरे विवाद की शुरुआत 13 अक्टूबर को हुई थी, जब जंतर-मंतर पर निजी परिसर के जरिए प्रवेश करने और पुलिसकर्मियों को उनकी ड्यूटी करने से रोकने के आरोप में 14 लोगों को हिरासत में लिया गया था। हिरासत में लिए गए लोगों में सौरव दास और आशुतोष रांका के अलावा सीजेपी के एक अन्य सदस्य अजिंक्य शिंदे भी शामिल थे। कॉकरोच जनता पार्टी के सदस्य उस समय मतदाता सूची के एसआईआर में कथित अनियमितताओं के खिलाफ अपना विरोध-प्रदर्शन दर्ज करा रहे थे और उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारेबाजी भी की थी।

दिल्ली पुलिस ने इन नेताओं की हिरासत जारी रखने के फैसले को सही ठहराया। पुलिस की ओर से दलील दी गई कि इन लोगों ने बार-बार कानून का उल्लंघन किया है। पुलिस ने यह आशंका भी जताई कि यदि इन्हें इस समय रिहा कर दिया गया, तो वे फिर से कानून तोड़ सकते हैं और अन्य लोगों को भी कानून का उल्लंघन करने के लिए उकसा सकते हैं। इन सभी दलीलों और कोर्ट के कड़े रुख को देखते हुए याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका वापस ले ली।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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