दुर्लभ खनिजों और रिफाइनरियों के 50% से अधिक हिस्से पर बीजिंग का कब्जा होने के बाद अमेरिका ने शुरू किया 'प्रोजेक्ट वॉल्ट', भारत ने भी बदली रणनीति।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इलेक्ट्रिक वाहनों और अगली पीढ़ी के उन्नत रक्षा प्रणालियों के विकास की वैश्विक होड़ के बीच एक नया भू-राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है। पूरी दुनिया का ध्यान जहां प्रयोगशालाओं और एआई सॉफ्टवेयर प्रणालियों पर केंद्रित है, वहीं पर्दे के पीछे वैश्विक तकनीकी वर्चस्व की असली लड़ाई उन बुनियादी संसाधनों को लेकर लड़ी जा रही है जिनके बिना आधुनिक हार्डवेयर का निर्माण असंभव है। चीन ने अत्यधिक आक्रामक रणनीति अपनाते हुए दुनिया भर के रणनीतिक बंदरगाहों, महत्वपूर्ण खदानों और प्रसंस्करण रिफाइनरियों पर अपना नियंत्रण स्थापित करना शुरू कर दिया है। बीजिंग की इस आर्थिक और रणनीतिक घेराबंदी ने पश्चिमी देशों सहित भारत की भी चिंताएं बढ़ा दी हैं, क्योंकि लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और रेयर अर्थ (दुर्लभ पृथ्वी खनिजों) जैसे महत्वपूर्ण संसाधनों की निर्बाध आपूर्ति पर ही पूरी दुनिया का तकनीकी भविष्य निर्भर करता है।

वाशिंगटन स्थित 'सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज' (CSIS) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण खनिज भंडारों के वैश्विक स्वामित्व का ढांचा तेजी से बदल रहा है। चीनी सरकारी और निजी कंपनियों ने भविष्य की वैश्विक मांग को पूरा करने वाली संपत्तियों को रिकॉर्ड स्तर पर हासिल किया है। आंकड़ों के मुताबिक, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के खनिज समृद्ध क्षेत्रों में चीनी कंपनियों के अधिग्रहण अपने एक दशक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं। दिसंबर 2025 में 'अफ्रीका सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक स्टडीज' द्वारा जारी विश्लेषण से पता चलता है कि बीजिंग वर्तमान में वैश्विक महत्वपूर्ण खनिजों के कुल उत्पादन के आधे से अधिक हिस्से को नियंत्रित करता है। इसमें सबसे गंभीर बात यह है कि दुर्लभ पृथ्वी खनिजों (आरईई) के उत्पादन पर चीन का 70 प्रतिशत और इन कच्चे खनिजों के वैश्विक शोधन तथा प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) पर अनुमानित 87 प्रतिशत पर अकेले चीन का एकाधिकार स्थापित हो चुका है। हालिया वर्षों में अर्जेंटीना की लिथियम खदान और बोत्सवाना की तांबे की खदानों के अरबों डॉलर के बड़े सौदों ने चीन की इस पकड़ को और मजबूत किया है।

इस पूर्ण नियंत्रण का सीधा असर यह हुआ है कि बीजिंग अब अपने प्रतिद्वंद्वी देशों की अर्थव्यवस्थाओं और विनिर्माण उद्योगों को दबाने की स्थिति में आ गया है। वैश्विक व्यापारिक तनाव के दौरान चीन ने रणनीतिक अवरोधों को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए अमेरिकी विनिर्माण इकाइयों के लिए आवश्यक दुर्लभ खनिजों की आपूर्ति को बाधित कर दिया था, जिसने पश्चिमी दुनिया को अपनी सप्लाई-चेन की कमजोरियों को समझने पर मजबूर किया। ईरान युद्ध के कारण उत्पन्न हुए ऊर्जा संकट और वैश्विक तेल की कीमतों में आए उतार-चढ़ाव ने भी भारत जैसे देशों के समक्ष यह स्पष्ट कर दिया है कि जीवाश्म ईंधन से आगे बढ़कर स्वच्छ ऊर्जा और डिजिटल तकनीक की ओर बढ़ने का विस्तार पथ पूरी तरह से महत्वपूर्ण खनिजों की निरंतर आपूर्ति पर टिका हुआ है, जिसका वैश्विक नियंत्रण वर्तमान में एक ही देश के हाथों में केंद्रित है।

भारत के संदर्भ में यह रणनीतिक निर्भरता एक गंभीर आर्थिक चुनौती पेश करती है क्योंकि भारत अपनी घरेलू आवश्यकताओं के लिए लगभग 82 प्रतिशत महत्वपूर्ण खनिजों का सीधे आयात करता है। देश के सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रिक वाहन बैटरी उद्योग के लिए अनिवार्य लिथियम, कोबाल्ट और निकेल का आयात मूल्य तेजी से बढ़ रहा है। विधिक और व्यापारिक दस्तावेजों के अनुसार, भारत ने अपनी विनिर्माण इकाइयों के लिए हजारों टन दुर्लभ पृथ्वी चुंबक (रेयर अर्थ मैग्नेट) का आयात किया है, जिसमें से लगभग 93 प्रतिशत हिस्सा सीधे चीन से आता है। इस अत्यधिक निर्भरता के कारण भारतीय बाजार अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक झटकों और कीमतों के उतार-चढ़ाव के प्रति बेहद संवेदनशील हो गए हैं।

चीन के इस बढ़ते एकाधिकार और आपूर्ति श्रृंखला के खतरों का मुकाबला करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा रणनीतिक गठबंधन आकार ले रहा है। रॉयटर्स की आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन ने बीजिंग की इस मजबूत पकड़ को ढीला करने के लिए सहयोगी देशों को एक तरजीही व्यापार ब्लॉक में संगठित करने की एक व्यापक योजना तैयार की है। इसके तहत 'प्रोजेक्ट वॉल्ट' नामक एक सार्वजनिक-निजी भागीदारी परियोजना की शुरुआत की गई है, जिसे अमेरिकी निर्यात-आयात बैंक (EXIM) से 10 अरब डॉलर के ऋण और निजी क्षेत्र से लगभग 2 अरब डॉलर की पूंजी से वित्त पोषित किया जा रहा है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य नागरिक और औद्योगिक उपयोग के लिए भौतिक खनिजों का एक विशाल सुरक्षित भंडार तैयार करना है, ताकि निजी क्षेत्र को किसी भी संभावित आपूर्ति व्यवधान से सुरक्षा प्रदान की जा सके। इस रणनीतिक पहल और उच्च स्तरीय बैठकों में भारत और जापान सहित दुनिया के 55 प्रमुख देश एक साथ मिलकर नीतिगत उपायों पर काम कर रहे हैं।

इस वैश्विक संकट के बीच भारत सरकार ने भी अपनी दीर्घकालिक आर्थिक और तकनीकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई सुधारात्मक विधिक और कूटनीतिक उपाय तेज कर दिए हैं। भारत ने अमेरिका और ब्रिटेन के साथ महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षा को लेकर विशेष द्विपक्षीय समझौते किए हैं। इसके अतिरिक्त, आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने के उद्देश्य से ऑस्ट्रेलिया, चिली, कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और यूरोपीय संघ के साथ रणनीतिक साझेदारियां स्थापित की जा रही हैं। ये सभी प्रयास भारत सरकार की महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज परियोजना पर केंद्रित हैं, जिसके तहत घरेलू निष्कर्षण, खनन और प्रसंस्करण क्षमताओं में सुधार के लिए भारी निवेश का प्रावधान किया गया है। अधिकारियों को उम्मीद है कि इन रणनीतिक उपायों के सफल क्रियान्वयन से आगामी वर्षों में क्रिटिकल मिनरल्स के आयात पर भारत की निर्भरता वर्तमान के अत्यधिक उच्च स्तर से घटकर लगभग आधी रह जाएगी, जो देश को अगली तकनीकी दौड़ में एक स्वतंत्र और मजबूत वैश्विक खिलाड़ी के रूप में स्थापित करने के लिए अनिवार्य है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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