‘चिता आंदोलन’ से गरमाया छतरपुर, Ken-Betwa Link Project के खिलाफ महिलाओं का बड़ा विरोध
विस्थापन और डूब क्षेत्र की समस्या को लेकर छतरपुर के ग्रामीणों का अनूठा प्रदर्शन; महिलाओं ने चिता पर लेटकर पुनर्वास और न्याय की मांग की।

छतरपुर में केन बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में प्रदर्शनकारी महिलाएं लकड़ी के ढांचों पर लेटकर अपना रोष प्रकट कर रही हैं।
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ जन आक्रोश अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। परियोजना के कारण विस्थापन और डूब क्षेत्र की समस्या से जूझ रहे ग्रामीणों ने विरोध प्रदर्शन के लिए एक ऐसा मार्ग चुना है जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। कई गांवों के निवासियों ने मिलकर 'चिता आंदोलन' की शुरुआत की है, जहां प्रदर्शनकारी महिलाएं स्वयं चिता पर लेटकर प्रशासन से न्याय की गुहार लगा रही हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि या तो सरकार उन्हें सम्मानजनक नया गांव और पुनर्वास प्रदान करे, अन्यथा उन्हें इसी भूमि पर जल जाने दिया जाए। यह आंदोलन पिछले कई महीनों से चल रहा है, लेकिन हालिया विरोध ने इसे और अधिक गहरा और भावुक बना दिया है।
केन बेतवा लिंक परियोजना भारत की पहली नदी जोड़ो परियोजना है, जिसका उद्देश्य बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाकों में सिंचाई और पेयजल उपलब्ध कराना है। हालांकि, इस परियोजना के कार्यान्वयन के लिए छतरपुर और पन्ना जिलों के कई गांवों को खाली कराया जाना है, जिससे हजारों परिवार प्रभावित हो रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें दी जाने वाली मुआवजे की राशि और पुनर्वास की योजनाएं उनके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। विस्थापन के डर और अपनी पुश्तैनी जमीन छिनने की पीड़ा ने इन लोगों को कड़ा रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है।
प्रदर्शन के दौरान जो दृश्य सामने आ रहे हैं, वे प्रशासनिक उदासीनता और मानवीय संघर्ष की एक गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। महिलाएं, जो आमतौर पर घर की धुरी होती हैं, अब सड़कों और चिताओं पर हैं। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि बिना किसी ठोस वैकल्पिक व्यवस्था के उन्हें बेदखल करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। स्थानीय संगठनों का समर्थन मिलने के बाद यह आंदोलन और भी संगठित हो गया है। ग्रामीणों की मांग है कि उन्हें केवल कागजों पर नहीं, बल्कि धरातल पर एक ऐसा स्थान दिया जाए जहां वे अपना जीवन गरिमा के साथ फिर से शुरू कर सकें।
विधिक और आधिकारिक दृष्टिकोण से देखें तो बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत मुआवजे और पुनर्वास के कड़े नियम हैं। हालांकि, प्रदर्शनकारियों का दावा है कि इन नियमों का जमीनी स्तर पर सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है। जिला प्रशासन ने अब तक बातचीत के माध्यम से गतिरोध सुलझाने की कोशिश की है, लेकिन ग्रामीणों की मांगों और सरकारी प्रस्तावों के बीच का अंतर अभी भी बरकरार है। यह विवाद अब केवल जमीन का नहीं, बल्कि पहचान और अस्तित्व की लड़ाई बन गया है।
केन बेतवा लिंक परियोजना का यह विरोध प्रदर्शन इस बात का प्रतीक है कि विकास की बड़ी योजनाओं और स्थानीय समुदायों के हितों के बीच संतुलन बिठाना कितना चुनौतीपूर्ण है। चिता पर लेटी इन महिलाओं की आवाज सत्ता के गलियारों तक पहुंच रही है, लेकिन इसका समाधान कब और कैसे निकलेगा, यह अभी भी अनिश्चित है। यदि समय रहते पुनर्वास की समस्याओं का निवारण नहीं किया गया, तो यह आंदोलन न केवल परियोजना की समयसीमा को प्रभावित करेगा, बल्कि सामाजिक असंतोष को भी और गहरा कर सकता है।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
