इस्लामाबाद: भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों पुरानी सिंधु जल संधि एक बार फिर गंभीर तनाव के केंद्र में आ गई है। दोनों देशों के बीच जल कूटनीति में जारी गतिरोध के बीच हिमाचल प्रदेश में भारत द्वारा शुरू किए गए एक नए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट ने पाकिस्तानी नीति-नियंताओं और राजनेताओं के बीच गहरी चिंता पैदा कर दी है। भारत सरकार द्वारा चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना के काम को तेज करने के फैसले को पाकिस्तान के भीतर एक बड़े रणनीतिक खतरे के रूप में देखा जा रहा है। यह परियोजना केवल जल प्रबंधन या बुनियादी ढांचे के विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे नदी के पानी के विवेकपूर्ण इस्तेमाल और जल-संसाधनों पर अपनी स्थिति मजबूत करने के भारत के दृढ़ संकल्प के रूप में देखा जा रहा है, जिससे इस्लामाबाद में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।

इस पूरे विवाद के केंद्र में भारत की महत्वाकांक्षी चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति क्षेत्र में प्रवाहित होने वाली चंद्र नदी के अतिरिक्त जल को एक 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग के माध्यम से मोड़कर ब्यास बेसिन में पहुंचाना है। तकनीकी रूप से, चंद्र और भागा नदियां चिनाब की ऊपरी सहायक नदियां हैं। वर्ष 1960 की सिंधु जल संधि के प्रावधानों के अनुसार, चिनाब उन तीन पश्चिमी नदियों में शामिल है जिसका नियंत्रण और पानी मुख्य रूप से पाकिस्तान के हिस्से में आवंटित किया गया था। भारत की योजना इस टनल के जरिए जहां उत्तरी भारत के पहाड़ी राज्यों में पनबिजली उत्पादन को बढ़ावा देना और सिंचाई व्यवस्था को सुदृढ़ करना है, वहीं पाकिस्तान इसे संधि की मूल आत्मा पर आघात मान रहा है।

परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक पहलू यह है कि इस सुरंग के माध्यम से मोड़ा जाने वाला पानी सीधे ब्यास नदी के बेसिन में गिरेगा। ब्यास नदी सिंधु जल संधि के तहत पूरी तरह से भारत के विशेष अधिकार क्षेत्र या पूर्वी नदियों के हिस्से में आती है। यही कारण है कि इस परियोजना का भू-राजनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है। पाकिस्तान के पूर्व सीनेटर और पंजाब प्रांत के पूर्व सिंचाई मंत्री मोहसिन लगारी ने इस मुद्दे पर अपनी गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने एक पाकिस्तानी समाचार पत्रिका में लिखे अपने विस्तृत लेख में इस बात की पुष्टि की है कि यद्यपि चिनाब नदी में वार्षिक रूप से बहने वाले 3.5 करोड़ एकड़ फीट पानी की तुलना में यह प्रस्तावित लिंक टनल केवल 10 लाख एकड़ फीट से भी कम पानी का रुख मोड़ेगी, लेकिन यह संरचनात्मक बदलाव तकनीकी और कानूनी रूप से एक बहुत बड़ा उल्लंघन है।

पाकिस्तानी राजनेता और विशेषज्ञों का तर्क है कि सिंधु जल संधि का निर्माण कभी भी पानी के आनुपातिक हिस्सों के आधार पर नहीं किया गया था, बल्कि इसका आधार 'अलगाव का सिद्धांत' था। इस सिद्धांत के तहत किसी भी परिस्थिति में एक नदी बेसिन के पानी को दूसरे बेसिन में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। मोहसिन लगारी ने दावा किया है कि यह ऐतिहासिक संधि भारत को पश्चिमी नदियों के संदर्भ में केवल चार विशिष्ट चीजों की अनुमति देती है, जिनमें नदी के पानी का घरेलू उपयोग, नौकायन जैसी गैर-उपभोग्य गतिविधियां, बेसिन के भीतर सीमित दायरे में सिंचाई और रन-ऑफ-द-रिवर आधारित पनबिजली परियोजनाएं शामिल हैं, जिनमें पानी का उपयोग करने के तुरंत बाद उसे वापस उसी नदी तंत्र में छोड़ना अनिवार्य होता है।

कानूनी और रणनीतिक दृष्टि से, पाकिस्तानी पक्ष का मानना है कि ऊपरी प्रवाह वाले देश द्वारा एकतरफा ढंग से किसी अंतरराष्ट्रीय नदी के पानी को अपने आंतरिक बेसिन की तरफ मोड़ लेना एक खतरनाक मिसाल कायम करता है। पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आशंका जताई है कि यदि इस परियोजना को नहीं रोका गया, तो निचले प्रवाह वाले देशों के लिए पानी की सुरक्षा हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगी। भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि की समीक्षा और संशोधनों को लेकर पिछले एक साल से अधिक समय से गतिरोध बना हुआ है, और ऐसे में चिनाब नदी पर बढ़ता यह नया सीमांत विवाद आने वाले समय में दक्षिण एशिया में जल-युद्ध की नई कूटनीतिक कड़ियों को जन्म दे सकता है।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

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