यूरिया, गैस सिलेंडर और राशन पर बढ़ती सब्सिडी से बढ़ी सरकार की चिंता, थाली से खेत तक असर।
ईरान संकट के कारण वैश्विक बाजार में यूरिया और डीएपी की कीमतें बढ़ने से फर्टिलाइजर सब्सिडी का खर्च बजट अनुमान से दोगुना होने का अनुमान।

बढ़ती तेल-गैस कीमतों के बीच LPG और खाद सब्सिडी के बोझ से जूझती सरकार का प्रतीकात्मक कैरीकेचर।
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में गहराते भू-राजनीतिक तनाव और ईरान युद्ध को तीन महीने पूरे होने के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में मची उथल-पुथल का सीधा असर अब भारतीय अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी तेजी ने केंद्र सरकार के राजकोषीय गणित को पूरी तरह बिगाड़ दिया है, जिससे चालू वित्तीय वर्ष में सरकार का कुल सब्सिडी बिल बेकाबू होने के कगार पर पहुंच गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में फर्टिलाइजर्स, कुकिंग गैस और आवश्यक कमोडिटीज के दाम आसमान छू रहे हैं, जिसके कारण घरेलू स्तर पर रिटेल कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार पर सब्सिडी का वित्तीय बोझ अभूतपूर्व रूप से बढ़ गया है।
इस वित्तीय वर्ष में केवल फर्टिलाइजर सब्सिडी का बिल बढ़कर 3.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है, जो कि बजट में किए गए आवंटन का लगभग दोगुना है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2026-27 के मुख्य बजट में उर्वरक सब्सिडी के लिए 1.7 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया था, जबकि कुल सब्सिडी मद में 4.1 लाख करोड़ रुपये रखे गए थे। इसके अतिरिक्त, कुकिंग गैस के लिए आवंटित 12,085 करोड़ रुपये की बजटीय राशि भी मौजूदा संकट को देखते हुए बेहद नाकाफी साबित हो रही है, क्योंकि पिछले वर्ष ही सरकार को ऑयल रिटेलर कंपनियों को 26,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ा था। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती लागत के कारण तेल विपणन कंपनियों को प्रत्येक घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर लगभग 700 रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है, जबकि कुछ महीने पहले एक्साइज ड्यूटी में की गई कटौती से सरकारी खजाने पर पहले से ही सालाना 1 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार बना हुआ है।
फर्टिलाइजर डिपार्टमेंट द्वारा मंत्रियों के एक अनौपचारिक समूह को सौंपे गए ताजा आंकड़ों के मुताबिक, यदि वैश्विक बाजार में कच्चे माल की कीमतें इसी उच्च स्तर पर टिकी रहीं, तो देश का उर्वरक आयात और सब्सिडी प्रबंधन संकट में पड़ सकता है। ईरान संकट की शुरुआत के बाद से वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतों में 120 फीसदी से अधिक की रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई है। इसी तरह, कृषि क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP) की वैश्विक कीमत में 38 फीसदी, सल्फर की कीमत में 87 फीसदी और अमोनिया की कीमत में 84 फीसदी का जबरदस्त उछाल आया है। इस वैश्विक महंगाई के बीच अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के मूल्य में आई गिरावट ने देश के आयात बिल को 6 फीसदी तक और महंगा कर दिया है।
भारत अपनी घरेलू कृषि आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए डीएपी, पोटाश और एनपीके जैसे महत्वपूर्ण फर्टिलाइजर्स के मामले में पूरी तरह विदेशी आयात पर निर्भर है। देश के भीतर यूरिया की सालाना खपत लगभग 40 मिलियन टन है, जिसमें से 8 से 10 मिलियन टन का प्रत्यक्ष आयात करना पड़ता है। डीएपी की कुल घरेलू मांग का लगभग 60 फीसदी हिस्सा विदेशी बाजारों से आता है, जबकि पोटाश की आवश्यकताओं के लिए देश शत-प्रतिशत आयात पर ही आश्रित है। पिछले वित्तीय वर्ष में भी देश का फर्टिलाइजर सब्सिडी बिल संशोधित अनुमानों को पार करते हुए 2.2 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच गया था, लेकिन मौजूदा युद्ध जनित परिस्थितियों ने इस बार सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
यह स्थिति साल 2022-23 के उस दौर की याद दिलाती है जब लाल सागर में हूतियों के हमलों के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई थी और भारत की उर्वरक सब्सिडी 2.5 लाख करोड़ रुपये के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई थी। ऊर्जा संकट के इस दौर में खाद्य सब्सिडी (फूड सब्सिडी) के मोर्चे पर भी चुनौतियां बढ़ती दिख रही हैं। बजट में इस मद के लिए 2.3 लाख करोड़ रुपये रखे गए हैं, लेकिन भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पास गेहूं और चावल का अतिरिक्त स्टॉक जमा होने के कारण उनके सुरक्षित रखरखाव, कोल्ड स्टोरेज और लॉजिस्टिक्स की लागत में भारी वृद्धि होने की संभावना है, जो अंततः खाद्य सब्सिडी के बिल को और बढ़ा देगी।
आर्थिक विश्लेषकों और सरकारी अधिकारियों का मानना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में भू-राजनीतिक स्थिति सामान्य हो भी जाती है, तो वहां से वाणिज्यिक जहाजों का आवागमन पूरी तरह सामान्य होने में कम से कम दो से तीन महीने का समय लगेगा, जबकि तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति प्रणाली को पटरी पर लौटने में इससे भी अधिक वक्त लग सकता है। ऐसी स्थिति में केंद्र सरकार के लिए चालू वित्तीय वर्ष में राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.3% के निर्धारित लक्ष्य के भीतर रखना एक बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। हालांकि, देश के भीतर लगातार मजबूत बने हुए माल एवं सेवा कर (GST) के कलेक्शन ने सरकार को कुछ राहत जरूर दी है, लेकिन यदि पश्चिम एशिया में युद्ध लंबे समय तक खिंचता है, तो आने वाले दिनों में गैर-जरूरी सेक्टर्स में खुदरा कीमतें बढ़ने से देश की घरेलू खपत और विकास दर दोनों ही गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती हैं।

Lalita Rajput
इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
