बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने युवा वकील के साथ दुर्व्यवहार के मामले में जस्टिस तरलाडा राजशेखर राव के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश से हस्तक्षेप की मांग की है।

CJI Suryakant action against HC judge : भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक ऐसा विचलित करने वाला अध्याय जुड़ गया है जिसने न्यायाधीशों के 'न्यायिक स्वभाव' और वकीलों के आत्मसम्मान के बीच की लकीर को लेकर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। देश में कानूनी पेशे की सर्वोच्च नियामक संस्था, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के जज जस्टिस तरलाडा राजशेखर राव के एक युवा वकील के प्रति कथित 'क्रूर' व्यवहार पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। बुधवार, 6 मई को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को लिखे एक पत्र में BCI ने इस घटना को न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध बताते हुए जस्टिस राव से न्यायिक कार्य छीनने या उन्हें तत्काल प्रभाव से स्थानांतरित करने की गुहार लगाई है। यह मामला केवल एक अदालती बहस का नहीं, बल्कि न्याय के मंदिर में एक युवा सदस्य के मानवाधिकारों और पेशे की गरिमा से जुड़ा है।

इस पूरे विवाद की जड़ें 4 मई को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में हुई एक सुनवाई में निहित हैं। लुक आउट सर्कुलर और पासपोर्ट जब्ती को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस तरलाडा राजशेखर राव और एक युवा वकील के बीच तीखी बहस हुई। वायरल वीडियो साक्ष्यों के अनुसार, जज ने वकील पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए उसे कड़ी फटकार लगाई और पूछा कि क्या वह खुद को कोई महान सीनियर वकील समझता है। स्थिति तब और भयावह हो गई जब न्यायाधीश ने महज एक प्रक्रियागत चूक के लिए उस युवा वकील को 24 घंटे की पुलिस हिरासत में भेजने का फरमान सुना दिया। वीडियो में वकील को हाथ जोड़कर, दर्द का हवाला देते हुए 'रहम की भीख' मांगते देखा जा सकता है, लेकिन जज का हृदय नहीं पसीजा। हालांकि, बाद में हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के तीव्र विरोध और हस्तक्षेप के बाद इस आदेश को रद्द कर दिया गया, लेकिन तब तक न्यायपालिका की छवि को गहरा आघात पहुंच चुका था।

BCI के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा द्वारा CJI को भेजी गई चिट्ठी में इस घटना की तीखी आलोचना की गई है। परिषद ने स्पष्ट किया है कि किसी भी कोर्ट की गरिमा तब नहीं बढ़ती जब किसी वकील को खुली अदालत में गिड़गिड़ाने पर मजबूर किया जाए। BCI ने अपने प्रतिवेदन में तर्क दिया है कि पेशे के युवा सदस्यों को मार्गदर्शन और सुधार की आवश्यकता होती है, न कि उन्हें पुलिस हिरासत की धमकी देकर उनके मन में न्याय प्रणाली के प्रति भय पैदा करने की। पत्र में सुप्रीम कोर्ट से इस मामले का संस्थागत संज्ञान लेने का अनुरोध किया गया है। साथ ही, यह मांग भी की गई है कि जस्टिस राव के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई की जाए और समीक्षा पूरी होने तक उन्हें न्यायिक कार्यों से दूर रखा जाए। परिषद ने न्यायाधीशों के लिए 'न्यायिक स्वभाव' और बार-बेंच संबंधों पर विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता पर भी जोर दिया है।

यह घटनाक्रम भारतीय कानूनी व्यवस्था के भीतर अनुशासन और मर्यादा के संतुलन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया का यह कड़ा रुख इस बात का स्पष्ट संकेत है कि न्यायपालिका के भीतर शक्ति का दुरुपयोग किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं होगा, चाहे वह उच्च पद पर बैठा व्यक्ति ही क्यों न हो। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के समक्ष अब यह एक बड़ी चुनौती है कि वे इस मामले में किस प्रकार का प्रशासनिक उदाहरण पेश करते हैं। इस प्रकरण का पटाक्षेप न केवल जस्टिस राव के भविष्य को तय करेगा, बल्कि यह भी सुनिश्चित करेगा कि आने वाले समय में अदालतों के भीतर वकीलों, विशेषकर युवाओं का सम्मान सुरक्षित रहे। न्याय की कुर्सी पर बैठकर दिया गया कोई भी आदेश यदि 'अन्यायपूर्ण' और 'अमानवीय' प्रतीत होने लगे, तो वह पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था के भरोसे को हिला देता है।

Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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