बार काउंसिल ऑफ दिल्ली (BCD) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत को एक आधिकारिक पत्र लिखकर जजों पर हो रहे बेबुनियाद व्यक्तिगत हमलों की कड़े शब्दों में निंदा की है। बार काउंसिल ऑफ दिल्ली ने न्यायपालिका का समर्थन करते हुए वकीलों के साथ-साथ देश के जिम्मेदार नागरिकों से संयम बरतने और निराधार अफवाहों को न फैलाने की अपील की है। यह कदम हाल के दिनों में सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों पर चल रहे उन बयानों के बाद उठाया गया है, जिनमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के इस्तीफे की मांग की गई थी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने भी सोशल मीडिया पर चल रही इस प्रकार की मांगों की कड़ी निंदा की थी और कहा था कि ऐसी बातें न्यायपालिका जैसी महत्वपूर्ण संस्था को कमजोर करने का प्रयास हैं।

एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत दिल्ली में वकीलों की वैधानिक संस्था के रूप में कार्यरत 'बार काउंसिल ऑफ दिल्ली' ने मुख्य न्यायाधीश को लिखे अपने पत्र में कहा है कि न्यायपालिका हमारे संवैधानिक लोकतंत्र का एक सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। पत्र में जोर देकर कहा गया है कि किसी भी देश में कानून का शासन तभी कायम रह सकता है और फल-फूल सकता है, जब वहां एक पूरी तरह स्वतंत्र और प्रभावी न्यायिक व्यवस्था मौजूद हो।

पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि बिना किसी ठोस सबूत के, खासकर सार्वजनिक और डिजिटल मंचों पर सनसनीखेज व बेबुनियाद आरोप लगाना पूरी तरह से अनुचित पूर्वाग्रह पैदा करता है। काउंसिल का मानना है कि इस तरह के कृत्य से न्याय प्रणाली के सामान्य कामकाज में बाधा उत्पन्न होती है और जनता की नजरों में अदालतों की गरिमा कम होती है। हालांकि, बार काउंसिल ऑफ दिल्ली ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक फैसलों की रचनात्मक और तार्किक आलोचना करना लोकतांत्रिक समाज का एक स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन बिना किसी ठोस आधार के व्यक्तिगत हमलों को कभी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और यह पूरी तरह निंदनीय है।

13 अक्टूबर, 2026 की तारीख वाला यह पत्र हाल ही में सामने आया है, जिस पर बार काउंसिल ऑफ दिल्ली के चेयरमैन नितिन अहलावत, मानद सचिव रमित सहरावत और काउंसिल की कार्यकारी समिति के चेयरमैन के हस्ताक्षर हैं। इस पत्र के माध्यम से बीसीडी ने बार के सभी सदस्यों और नागरिकों से अपील की है कि वे कानून की गरिमा बनाए रखें और ऐसी निराधार बातों को बढ़ावा देने से बचें, जो इस संस्था की अखंडता और विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाती हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बार काउंसिल ऑफ दिल्ली के इस पत्र में किसी विशिष्ट व्यक्ति, राजनीतिक पार्टी या किसी खास पद का नाम नहीं लिया गया है। यह पत्र 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) द्वारा पारित अलग-अलग प्रस्तावों के बाद जारी किया गया है। उन प्रस्तावों में भी सोशल मीडिया पर मुख्य न्यायाधीश के इस्तीफे की मांग करने वाले बयानों की निंदा की गई थी।

इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट में चार वकीलों द्वारा एक याचिका दायर की गई है, जिसमें कांग्रेस और उसके कुछ नेताओं के खिलाफ सोशल मीडिया पर पोस्ट करने को लेकर 'अदालत की अवमानना' (Contempt of Court) की कार्रवाई की मांग की गई है। हालांकि, उस याचिका में शामिल किसी भी पक्ष ने अभी तक अदालत में कोई औपचारिक जवाब नहीं दिया है और न ही किसी पोस्ट को लेकर कोर्ट की तरफ से कोई निर्णय या निष्कर्ष सामने आया है।

काउंसिल का यह पत्र केवल संस्था का एक नजरिया और सार्वजनिक बयान है, न कि वकीलों के लिए कोई औपचारिक आदेश या निर्देश। पत्र में यह भी नहीं बताया गया है कि असल में किन आरोपों की बात की जा रही है। कोई खास पोस्ट 'अदालत की अवमानना' के दायरे में आती है या नहीं, इसका निर्धारण करना पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट का काम है, जहां इससे संबंधित याचिका लंबित है।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन ने भी संयुक्त रूप से अपील की थी कि ऐसे बयान न्यायपालिका को कमजोर दिखाते हैं और न्याय प्रशासन के काम में हस्तक्षेप के समान हैं। उन्होंने अपने सदस्यों और आम जनता से अपील की है कि वे देश के सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा और मर्यादा को हर हाल में बनाए रखें।

Lalita Rajput

Lalita Rajput

इन्हें लेखन क्षेत्र में लगभग 5 वर्षों का अनुभव है। इस दौरान इन्होंने फाइनेंस, कैलेंडर और बिज़नेस न्यूज़ को गहराई से कवर किया है। इनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वित्त से जुड़ी है—इन्होंने एमबीए (फाइनेंस) किया है और वर्तमान में फाइनेंस में पीएचडी कर रही हैं। जनवरी 2026 से ये दै. प्रातःकाल में कार्यरत हैं, जहाँ बिज़नेस, फाइनेंस, मौसम और भारतीय सीमाओं से जुड़े समाचार सरल, सटीक और व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

Next Story