सत्य की शक्ति बनाम नफरत की लहर—क्या आज भी गांधी के विचारों से डरता है समाज?

नई दिल्ली | 30 जनवरी 2026

आज की सुबह जब घड़ियों ने 11 बजाए, तो पूरे भारत में सायरन की आवाज के साथ जीवन की रफ्तार थम गई। दो मिनट के उस गहन मौन में देश ने अपने उस 'महात्मा' को याद किया, जिसकी लाठी के प्रहार ने बिना किसी रक्तपात के दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य को घुटनों पर ला दिया था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 78वीं पुण्यतिथि पर आज कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी। लेकिन, इस आधिकारिक श्रद्धा के बीच डिजिटल दुनिया में उभरी वैचारिक दरार ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या 21वीं सदी का भारत गांधी के 'अहिंसा' के मार्ग को भूलता जा रहा है?

राजघाट पर मौन और प्रार्थना का संगम

राजधानी दिल्ली के राजघाट पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कैबिनेट के वरिष्ठ मंत्रियों ने बापू की समाधि पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया। सर्वधर्म प्रार्थना सभा के साथ वातावरण में 'रघुपति राघव राजा राम' की धुन गूँजती रही। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में गांधीजी के सिद्धांतों—सत्य, अहिंसा और एकता—को विकसित भारत के निर्माण की आधारशिला बताया। इस अवसर पर आमिर खान जैसे फिल्मी सितारों ने भी बापू की शांति और संयम की प्रार्थना को साझा कर देशवासियों से भाईचारे की अपील की।

  • शहीद दिवस का महत्व: 30 जनवरी को भारत 'शहीद दिवस' के रूप में मनाता है, जो उन सभी ज्ञात और अज्ञात बलिदानियों को समर्पित है जिन्होंने देश की अखंडता के लिए प्राण दिए।
  • राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम: स्कूलों, सरकारी कार्यालयों और सेना की टुकड़ियों ने मौन रखकर गांधीजी के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया।

डिजिटल डिवाइड: ऑनलाइन छिड़ा कड़वाहट का संग्राम

जहाँ एक ओर सरकारी और मुख्यधारा के माध्यमों में गांधीजी के 'अहिंसा' के संदेश का जयघोष हो रहा था, वहीं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तस्वीर इसके बिल्कुल विपरीत और भयावह नजर आई। हैशटैग्स और ट्रेंड्स की दुनिया में समाज दो फाड़ दिखाई दिया।

कुछ कट्टरपंथी समूहों ने गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को 'नायक' के रूप में चित्रित करने की कोशिश की। ऑनलाइन विमर्श में गांधीजी पर देश के विभाजन और पाकिस्तान को दी गई सहायता राशि के पुराने विवादों को फिर से हवा दी गई। ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की इस प्रवृत्ति ने एक बार फिर उस ध्रुवीकरण को उजागर किया है, जो गांधी के विचारों और गोडसे की कट्टरता के बीच दशकों से चला आ रहा है। यह विरोधाभास दर्शाता है कि 78 वर्षों के बाद भी गांधी की हत्या केवल एक शारीरिक कृत्य नहीं, बल्कि आज भी एक निरंतर चलने वाला वैचारिक संघर्ष है।

विरासत और संवैधानिक महत्व

महात्मा गांधी की विरासत केवल प्रतीकों तक सीमित नहीं है। भारत के संविधान की प्रस्तावना से लेकर राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों तक में गांधीवादी दर्शन की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। मानवाधिकारों की रक्षा और न्याय की अवधारणा को बल देने वाली उनकी 'अहिंसा' (Ahimsa) आज भी वैश्विक नागरिक आंदोलनों के लिए मार्गदर्शक बनी हुई है। कानूनी रूप से, भारतीय न्याय व्यवस्था गांधी की हत्या को देश के इतिहास का सबसे जघन्य अपराध मानती है, जिसे किसी भी तर्क से सही नहीं ठहराया जा सकता।

महात्मा गांधी की 78वीं पुण्यतिथि केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए एक दर्पण है। आज का सायरन हमें याद दिलाता है कि भले ही डिजिटल युग में नफरत की गूँज तेज हो, लेकिन गांधी का सत्य और शांति का मार्ग ही भारत को एकजुट रखने का एकमात्र विकल्प है। बापू के आदर्शों की सार्थकता इस बात में नहीं है कि हम उन्हें कितनी बार नमन करते हैं, बल्कि इस बात में है कि हम उनके विचारों को अपने आचरण में कितना उतारते हैं।

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