Ambedkar Second Wife Controversy Hindi : डॉ. भीमराव अंबेडकर के निधन के बाद जो विवाद सबसे तीव्र रूप से उभरा, वह उनकी दूसरी पत्नी डॉ. सविता अंबेडकर को लेकर था। अपनी पुस्तक “द बुद्धा एंड हिज धम्मा” की भूमिका में अंबेडकर ने लिखा था कि सविता ने उनकी उम्र “कम से कम दस वर्ष बढ़ा दी।” यह वही महिला थीं जिन पर बाद में अंबेडकर के कुछ परिजन और उनके कुछ अनुयायी सबसे गंभीर आरोप लगाने लगे—यहां तक कि उनके निधन को “हत्या” बताकर निशाने पर उन्हीं को रखा गया। यह आरोप न केवल व्यक्तिगत थे, बल्कि जातिगत असहमति और सामाजिक मान्यताओं की जटिलता से भी गहराई से जुड़े थे।

डॉ. सविता अंबेडकर महाराष्ट्र के एक शिक्षित और कुलीन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्मी थीं। उस दौर में महिलाओं का मेडिकल शिक्षा प्राप्त करना विरला था, लेकिन उन्होंने ग्रांट मेडिकल कॉलेज, मुंबई से एमबीबीएस किया। उनकी पहली मुलाकात डॉ. अंबेडकर से मुंबई में डॉ. एस.एम. राव के घर हुई, जिसके बाद स्वास्थ्य-सम्बंधी परामर्श की अनेक मुलाकातें धीरे-धीरे निकटता में बदल गईं। 1947 में अंबेडकर की तबीयत बिगड़ने लगी, और सविता ने लंबे समय तक उनका उपचार किया। इसी दौरान अंबेडकर ने एक पत्र में लिखा कि परिस्थितियों को देखते हुए उन्हें विवाह का निर्णय लेना होगा।


15 अप्रैल 1948 को दिल्ली स्थित उनके निवास पर सविता और अंबेडकर का विवाह सिविल मैरिज अधिनियम के तहत सम्पन्न हुआ। इस विवाह में सविता के परिजन उपस्थित थे, लेकिन अंबेडकर के अपने परिवारजन अनुपस्थित। यही दूरी, आगे चलकर अनेक आरोपों का कारण बनी। कई अनुयायियों ने शिकायत की कि विवाह के बाद अंबेडकर तक पहुंच सीमित हो गई थी, और कहा गया कि डॉ. सविता ही तय करती थीं कि किसे उनसे मिलने दिया जाए।

6 दिसंबर 1956 की सुबह अंबेडकर मृत पाए गए। उससे एक रात पहले तक दिन सामान्य था। उन्होंने मुलाकातें कीं, भोजन किया, पसंदीदा गीत गुनगुनाए और एक पुस्तक पढ़ते-पढ़ते सो गए। अनुमान था कि नींद में ही भोर से पहले हृदयाघात से उनका निधन हुआ। लेकिन अंबेडकर को मानने वाले एक वर्ग ने इसे “साजिश” बताकर सविता को कटघरे में खड़ा किया। आरोपों के राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने सरकारी जांच के आदेश दिए। जांच में निष्कर्ष निकला कि मृत्यु स्वाभाविक थी और सविता पर लगाए गए आरोपों का कोई आधार नहीं मिला। उन्हें पूर्णतः क्लीन चिट मिल गई।


जांच के बाद भी विवाद शांत नहीं हुआ, परंतु सविता ने सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका नहीं अपनाई। नेहरू और बाद में इंदिरा गांधी ने उन्हें कई बार राज्यसभा सदस्यता का प्रस्ताव दिया, लेकिन उन्होंने स्वयं यह प्रस्ताव अस्वीकार किया। अपनी आत्मकथा “डॉ. अम्बेडकरच्या सहवासत” में उन्होंने लिखा कि अंबेडकर ने उन्हें सलाह दी थी कि वे सरकारी नौकरी या राजनीतिक पदों से दूरी बनाए रखें, और वे उस वचन पर कायम रहीं।

1990 में भारत सरकार ने जब डॉ. अंबेडकर को “भारत रत्न” से सम्मानित किया, तब यह सम्मान सविता ने स्वयं ग्रहण किया। वे अपने अंतिम वर्षों में सामाजिक गतिविधियों में सीमित रूप से सक्रिय रहीं और अंबेडकर के नाम से ही अपने जीवन को परिभाषित करती रहीं। 29 मई 2003 को उनका निधन मुंबई में हुआ।


डॉ. सविता अंबेडकर का जीवन न केवल व्यक्तिगत संघर्षों और आरोपों का दर्पण है, बल्कि यह भी दिखाता है कि समाज, राजनीति और जाति किन प्रकार से महापुरुषों के निजी जीवन तक हस्तक्षेप कर देती है। उनकी कहानी उस ऐतिहासिक अध्याय का महत्वपूर्ण हिस्सा है जिसमें अंबेडकर के विचार, संघर्ष और निजी जीवन—तीनों समान रूप से दर्ज हैं।

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Ashiti Joil

Ashiti Joil

यह प्रातःकाल में कंटेंट रायटर अँड एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। यह गए 3 सालों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सक्रिय हैं। इन्होंने लोकसत्ता, टाईम महाराष्ट्र, PR और हैट मीडिया में सोशल मीडिया कंटेंट रायटर के तौर पर काम किया है। इन्होंने मराठी साहित्य में मास्टर डिग्री पूर्ण कि है और अभी ये यूनिवर्सिटी के गरवारे इंस्टीट्यूड में PGDMM (Marthi Journalism) कर रही है। यह अब राजकरण, बिजनेस , टेक्नोलॉजी , मनोरंजन और क्रीड़ा इनके समाचार बनती हैं।

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