आरोपों के साये में बीता राजनीतिक सफर—क्या अधूरा रह गया ₹70,000 करोड़ के उस 'सिंचाई घोटाले' का सच?

मुंबई/बारामती: महाराष्ट्र की राजनीति के एक युग का अंत उपमुख्यमंत्री अजित पवार के निधन के साथ हो गया है। लेकिन जब भी इतिहासकार उनके राजनीतिक जीवन का विश्लेषण करेंगे, तो उनके नाम के साथ जुड़ा ₹70,000 करोड़ का कथित 'सिंचाई घोटाला' हमेशा चर्चा का केंद्र रहेगा। एक कुशल प्रशासक और बारामती के विकास पुरुष के रूप में पहचाने जाने वाले अजित पवार के दामन पर लगे भ्रष्टाचार के इन आरोपों ने न केवल उनके करियर को प्रभावित किया, बल्कि प्रदेश की सत्ता के समीकरणों को भी कई बार बदला। अब जबकि वे हमारे बीच नहीं रहे, ये आरोप भारतीय राजनीति के एक रहस्यमय और अनसुलझे अध्याय के रूप में शेष रह गए हैं।

विवाद की पृष्ठभूमि: कैसे शुरू हुआ आरोपों का सिलसिला?

अजित पवार पर भ्रष्टाचार के ये आरोप उस समय लगे थे जब वे 1999 से 2009 के बीच महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री थे। यह वह दौर था जब राज्य में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकार थी।

  • आरोपों का सार: मुख्य आरोप यह था कि विदर्भ सिंचाई विकास निगम (VIDC) के अंतर्गत आने वाली परियोजनाओं की लागत को नियमों के विरुद्ध जाकर बढ़ाया गया। आरोप लगाया गया कि मात्र तीन महीनों के भीतर 38 परियोजनाओं की लागत में ₹20,000 करोड़ से अधिक का इजाफा किया गया।
  • प्रक्रियागत चूक: विपक्ष ने आरोप लगाया कि तकनीकी स्वीकृति (Technical Sanction) के बिना ही टेंडर जारी किए गए और अपने चहेते ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए अग्रिम भुगतान (Advance Payment) के नियमों में बदलाव किया गया।
  • विजय पांढरे का खुलासा: सिंचाई विभाग के तत्कालीन मुख्य अभियंता विजय पांढरे ने जब इस अनियमितता को लेकर आवाज उठाई, तब यह मामला एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया और ₹70,000 करोड़ के इस आंकड़े ने पूरे देश को चौंका दिया।

राजनीतिक उथल-पुथल और 'क्लीन चिट' का विवाद

इन आरोपों ने अजित पवार को कई बार कानूनी और राजनीतिक संकट में डाला। 2012 में उन्हें इन आरोपों के चलते एक बार इस्तीफा तक देना पड़ा था। हालांकि, बाद में वे पुनः सरकार में शामिल हुए।

  • सत्ता का खेल और जांच: साल 2014 के चुनावों में भाजपा ने इसी घोटाले को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया था। लेकिन राजनीति का चक्र ऐसा घूमा कि 2019 में जब उन्होंने भाजपा के साथ मिलकर अल्पकालिक सरकार बनाई, तो भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने उन्हें कई मामलों में 'क्लीन चिट' दे दी।
  • अनसुलझे सवाल: इस 'क्लीन चिट' पर हमेशा सवाल उठते रहे। विपक्ष और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप था कि यह राहत कानूनी कम और राजनीतिक अधिक थी। उनके निधन तक, कुछ मामलों में जांच की आंच अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुई थी।

आधिकारिक रुख और कानूनी स्थिति

अजित पवार ने अपने अंतिम समय तक इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया। उनका कहना था कि लागत में वृद्धि केवल महंगाई और भूमि अधिग्रहण में हुई देरी के कारण हुई थी। आधिकारिक रूप से, कई तकनीकी समितियों ने विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार के सुझाव दिए थे, लेकिन किसी भी अदालत ने उन्हें इन आरोपों में दोषी करार नहीं दिया था।

एक अधूरा अध्याय

अजित पवार का निधन उन सभी विवादों पर पूर्णविराम लगा देता है, जो उनके जीवित रहते हुए सुर्खियां बना करते थे। वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने आरोपों के दबाव में भी अपनी सांगठनिक शक्ति को कभी कम नहीं होने दिया। आज जब वे नहीं रहे, तो यह सवाल हमेशा के लिए अधूरा रह गया कि क्या वे वास्तव में उस तंत्र का हिस्सा थे जहां भ्रष्टाचार हुआ, या वे केवल राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार बने। महाराष्ट्र की राजनीति उन्हें एक ऐसे योद्धा के रूप में याद रखेगी जिसने आरोपों की आंधी के बीच भी अपनी सियासी जमीन को कभी दरकने नहीं दिया।

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